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मुक्तबाजारी जायनी संघी हिंदू राष्ट्र के बुनियादी काम तो आडवाणी जी ने ही किये

इंफ्रास्ट्रक्चर अश्वमेध धूम और शंबूक हत्या साथ साथ
अब आपकी सरकार का केसरिया एनजीओ नेटवर्क,
पलाश विश्वास
पद्मप्रलय के धुरंधर समय में वैज्ञानिक दृष्टि का हाल यह है कि गामा किरणों के जरिये मंहगाई और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण की मृगमरीचिका भी तैयार। अवतारतंत्र मुकम्मल है। मिथकों और किंवदंतियों का इतिहास गढ़ने का अकादमिक नेटवर्क तैयार हो गया है। इतिहास के अंत की घोषणा करने वाले मुक्त बाजार की धर्मेन्मादी नींव मजबूत करने के लिए इतिहास नये सिरे से रच रहे हैं। चूंकि सारे आंदोलन अब एनजीओ चला रहे हैं और पिछले आमचुनाव में केसरिया जनादेश को रोकने की सबसे गंभीर प्रयास भी एनजीओ उपक्रम ही था। अब आपकी सरकार से आपके निरंतर अबाध संजोग के जरिये तकनीकी और संचार क्रांति बतर्ज संघ परिवार का नया एनजीओ नेटवर्क भी तैयार होने लगा है।

इस अवतारी राजकाज पर नजर रखें। सही आकलन के लिए बाजार पर उसका असर भी देखें। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इंश्योरेंस सेक्टर में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने की मंजूरी दे दी है। साथ ही, पिरामिड स्कीम्स पर अंकुश लगाने के लिए मार्केट रेगुलेटर सेबी को अधिकार देने वाले बिल को भी इसने हरी झंडी दिखाई है। मोदी सरकार के इस कदम को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि वह रेलवे सेक्टर को विदेशी निवेश के लिए खोलने और डिफेंस सेक्टर में एफडीआई बढ़ाने पर भी जल्द फैसला करेगी।

सुषमा स्वराज की नेपाल यात्रा के मार्फत नेपाल में अमेरिका इजराइल समर्थित हिंदू राष्ट्र की बहाली का अभियान भी तेज होने वाले है। हिंदू राष्ट्र समर्थकों को पहले से ही भारतीय सत्ता वर्ग का निरंतर समर्थन चीन के खिलाफ जारी अविराम अभियान के मध्य तरह तरह व्यक्त होता रहा है।

इस आलोक में समझें कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपनी तीन दिन की नेपाल यात्रा को बेहद सफल बताते हुए कहा है कि दोनों देशों ने आपसी संबंध मजबूत करने के लिए कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया है। सुषमा ने नई दिल्ली के लिए रवाना होने से पहले त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि यह बेहद सफल यात्रा रही। इसके परिणाम मेरी उम्मीद से कहीं अधिक रहे हैं। सुषमा ने राष्ट्रपति राम बरन यादव और प्रधानमंत्री सुशील कोईराला सहित नेपाल के शीर्ष नेताओं के साथ मुलाकात की। उन्होंने विपक्ष के नेता व यूनाइटेड कम्यूनिस्ट पार्टी आफ नेपाल-माओवादी के प्रमुख प्रचंड से भी मुलाकात की।

सुषमा ने माओवाद असान उपरांते 23 साल बाद हुई भारत-नेपाल संयुक्त आयोग की बैठक की सह अध्यक्षता की। उनकी इस यात्रा का एक मकसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 3 अगस्त से दो दिन की नेपाल यात्रा की तैयारी भी था। कोई भारतीय प्रधानमंत्री 17 साल में पहली नेपाल यात्रा करने वाला है। दिवंगत प्रधानमंत्री आईके गुजराल 1997 में नेपाल यात्रा पर आए थे।

यह बेहद महत्वपूर्ण है कि नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहाली के बिना इस पूरे महादेश को अखंड हिंदू राष्ट्र बनाया ही नहीं जा सकता।  इसे न भूले कि संघ परिवार का एजेंडा खंडित हिंदू राष्ट्र नहीं, पूरा का पूरा अंखड हिंदू भारत महादेश है।

संभव हो तो इसमें गांधार, समरकंद, कंपुचिया और सुमात्रा जावा तक को समाहित करना है। जो भारत के महान हिंदू साम्राज्यों के अधीन उपनिवेश रहे हैं, जिसे इस्लाम और ईसाई शासनकाल में हिंदुत्व ने खो दिया।

राममंदिर अभियान दरअसल उसी हिंदुत्व के पुनर्जागरण का आवाहन है और इसी लिए फिर पुष्यमित्र शुंग का राज्याभिषेक।

भूटान की पहली राजकीय यात्रा में इसके यथेष्ट संकेत मिले हैं।

रामायण और महाकाव्यों के मिथकों को इतिहास बनाने का कार्यक्रम डिस्कवरी आफ इंडिया के मार्फत स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरु ने शुरु किया था, तब से अनार्य सिंधु घाटी की विभाजित सभ्यता का हिंदूकरण अकादमिक कार्यक्रम है। सूचना क्रांति के जरिये घर घर रामायण और महाभारत है जो महज अब धर्म नहीं है। मनुस्मृति की तरह बाजार को जोधा अकबर है।

मिथकीय राममंदिर के तार यरूशलम दखल अभियान के साथ गहराई से जुड़े हैं और धर्मयोद्धाओं की यह सत्ता संयुक्त राष्ट्र की राजनयिक रणनीति में चाहे जो करें अमेरिकी अमुमोदन के साथ, इजराइल के विरुद्ध रामराजनिषेध जैसा कोई कदम उठा ही नहीं सकता।

इसी तरह इसका भी तात्पर्य सही परिप्रेक्ष्य में ही समझा जाना चाहिए कि अमेरिका ने शनिवार को वैश्विक व्यापार सुविधा नियमों में सुधारों को लेकर भारत के रुख के प्रति निराशा व्यक्त करते हुए कहा है कि प्रतिबद्धताओं से पीछे हटने की वजह से विश्व व्यापार संगठन (WTO) संकट के कगार पहुंच गया है। जिनीवा में शुक्रवार को विश्व व्यापार संगठन के 160 सदस्यों की बैठक में भारत ने खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्यान्न के सार्वजनिक भंडारण की समस्या का स्थायी समाधान होने तक व्यापार सुविधा की समयसारिणी पर रोक लगाने की मांग की है। इस बैठक में पिछले साल दिसंबर में बाली में हुए व्यापार सुविधा (टीएफ) समझौते को लेकर बनी सहमति को अंतिम रूप दिया जाना था।

खुदरा बाजार, बीमा, प्रतिरक्षा जैसे तमाम सेक्टरों, शिक्षा और चिकित्सा जैसी सेवाओ को विदेशी कंपनियों के हवाले करने पर थोड़ा विश्व व्यापार संगठन का विरोध भी नहीं करेंगे तो बुरबक बनाओइंग कार्यक्रम आखिर चलेगा कैसे।

इतिहास, ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टि से बेदखल तकनीकी दक्ष जमात का केसरियाकरण आईटी उपक्रम इसीलिए ईद पर रिलीज सलमान खान की फिल्म है। दूसरी ओर, एकता कपूर का महासोप अब श्याम बेनेगल के भारत आविस्कार के प्रकरण समाप्ते भारत का नव्यअद्यतन आर्य इतिहास सनातन है।

इसी अभिप्राय से गैरसरकारी गैर रानीतिक स्वयंसेवी आंतरजातिक नेटवर्क के कायाकल्प का नया एजंडा केसरिया।

गैरकांग्रेसवाद के नाम पर जो वामपंथ- समाजवादी- स्वतंत्र सिंडिकेट- संघी रसायन अमेरिका परस्त बना, उसकी सबसे गंभीरतम उपलब्धि मीडिया कायाकल्प है, जिसे लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने अंजाम दिया।

लौह पुरुष सरदार पटेल के आवाहन से अपने असली विशुद्ध सौ टका खरा केसरिया लौहपुरुष के इस अवदान को इस केसरिया समय भूल भले ही रहे हों संघी, लेकिन मुक्तबाजारी जायनी संघी हिंदू राष्ट्र के बुनियादी काम तो आडवाणी जी ने ही किये।

मसलन बायोमेट्रिक डिजिटल नागरिकता और देश के लिए नागरिकता पहचान पत्र और नागरिकता संशोदन कानून जनसंहारी सुधारों के साथ साथ बेदखली का सर्वोत्तम तंत्र मंत्र यंत्र है और इसके प्रवर्तक आडवाणी ही हैं।

भले ही सत्ता के समांतर केंद्र बतौर अपने मौलिक लौहपुरुष को गांधी के लौहपुरुष में समाहित कर देने में कोई कसर नहीं छोड़े नमोमहाराज, भले ही राष्ट्रीय पताका और तोपों की सलामी का अंतिम सम्मान मिलने से वंचित हो जाये आडवाणी, लेकिन कुल मिलाकर संघ परिवार अटल शौरी रोडमैप और गुरु गोवलकर के दिशानिर्देशों पर अमल के लिए आडवाणी पर चल रहा है, चलेगा।

सत्ता के दशक में खासकर आपातकाल के ब्लू स्टार नक्सलदमन परिदृश्य में स्वतंत्र मीडिया इंदिरा गांधी और उनके तरणहार संघ परिवार के साथ-साथ सत्ता के केंद्र में धूमकेतु जैसे उत्थान के बाद अमेरिकापरस्त गैरकांग्रेसवाद के बाद सबसे बड़ा सरदर्द का सबब रहा है।

इस मीडिया को अपना भोंपू बनाने के लिए और पाठ को सिरे से अप्रासंगिक बना देने के लिए दृश्यमाध्यमों को मजबूत बनाने की तकनीक और नेटवर्क का विस्तार लगातार होता रहा।

सूचना संचार क्रांति का बुनियादी प्रयोजन सूचना निषेध, जनमत निषेध और मस्तिष्क नियंत्रण, स्वप्न नियंत्रण, विचार नियंत्रण का जार्ज आरवेल का 1984 कथानक है जो संजोग से 1984 के सिख संहार के भारतीय प्रसंग में ही सामाजिक आर्थिक यथार्थ बना है।

सत्तर के दशक में अखबारों, साहित्यिक पत्रिकाओं और लघुपत्रिकाओं का बागी नेटवर्क सत्ता वर्ग के लिए चुनौती बना हुआ था। रोजाना पर्दाफाश का सिलसिला सत्ता के परखच्चे उड़ा रहे थे।

इंडियन एक्सप्रेस, हिंदू जैसे कुलीन अखबारों की बात अलग ही थी, 1983 में बिहार में प्रेस विधेयक के खिलाफ सरकार और राजनेताओं के बहिष्कार के अखबारी विद्रोह से लेकर जनपदीय अखबारों की भूमिका छात्र युवा आंदोलन  और जनविद्रोहों के जलजले को जारी रखने के संकेत दे रहे थे।

वह नेटवर्क सूचना, संचार व तकनीकी क्रांति के त्रिशूल से ध्वस्त कर दिया गया। तमाम जनपक्षधर तत्व या तो हाशिये पर धकेल दिये गये या उनको सत्ता वर्ग में कोआप्ट कर लिया गया।

यह कोआप्शन एमजे अकबर, एसपी सिंह, प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर जैसे मीडिया महामानवों के चरमोत्करष के मध्य हुआ तो खत्म हो गये रघुवीर सहाय, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती जैसे चामत्कारिक संपादकों का कुनबा।

देशी विदेशी पूंजी के युद्धस्थल में तब्दील दक्षिण एशिया में विदेशी पूंजी और संस्थाओं की मदद से एनजीओ का राजनीतिक सीमाओं के आर-पार एक सर्वव्यापी ग्रीनपीस नेटवर्क है।

नैपम, ग्रीनपीस और चिपको परवर्ती पर्यावरणी एनजीओ ब्रिगेड में जनपक्षधर ताकतें भी खूब हैं और एनजीओ आड़ में जनांदोलनों के राजनीति से खत्म हो जाने की परिस्थिति में निरुपाय सामाजिक शक्तियों की गोलबंदी का यही एकमात्र अंब्रेला है, जिनकी वजह ऐसे कारपरेट प्रोमोटर बिल्डर माफिया राज को बार-बार स्तंभित हो जाना पड़ता है।

अंतरराष्ट्रीय समर्थन और पूंजी के दम में पेशेवर दक्षता के मेधा नेटवर्क के कारण इंडिया इंक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इसका भारी खामियाजा उठाना पड़ता है पालतू कारपोरेट एफडीआई मुक्तबाजारी मीडिया के मार्फत जनता के विरुद्ध राष्ट्र के अविराम युद्ध को धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का मुलम्मा देने के बावजूद।

सूचना के अधिकार, खाद्य सुरक्षा कानून, आधार विरोध, परमाणु ऊर्जा विरोध, वनाधिकार कानून, नये भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून, बड़े बांधों और बहुराष्ट्रीय परियोजनाओं के जरिये अबाध विस्थापन और बेदखली, जल जमीन जंगल और आजीविका की लड़ाई में तमाम जनपक्षधर तत्व एनजीओ नेटवर्क में सक्रिय रहे हैं।

और सैन्यराष्ट्र के आक्रमण, नागरिक व मानवाधिकार हनन के विरुद्ध, हक हकूक के लिए उनका प्रतिरोध ही सबसे बड़ी चुनौती है, जिसे उनके अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के कारण आतंकवादी, उग्रवादी, माओवादी या राष्ट्रद्रोही करार कर  जनांदोलनों और जनिविद्रोहों की तरह फौरन कुचला भी नहीं जा सकता।

ऐसे लोग जेल चले भी जायें, उनका उत्पीड़न होता भी रहे तो इसी एनजीओ नेटवर्क के जरिये प्रतिरोध भी भयंकर होता है।

यूपीए सरकार ने महत्वपूर्ण सलाहकार समितियों, प्रतिष्ठानों में एनजीओ वर्ग को समाहित करके इस प्रबल असुविधा के निराकरण की कोशिशें भी कीं तो अरुणा राय जैसी शख्सियतों ने बगावत कर दी।

फिर पिछले लोकसभा चुनाव में सारे एनजीओ मिलकर सत्ता दखल करने की नाकाम कोशिश भी हो गयी।

अब भी राजधानी नई दिल्ली में असली सत्ता एनजीओ की है। इसी की काट है संघ परिवार का अपना नेटवर्क। मेधासंपन्न लोगों को ग्राउंड वर्क के प्रोजेक्ट से स्वयंसेवी कैडर बनाने का खेल है यह अति भयंकर, जिसके परिणाम भारत में अंततः लोकतंत्र, संविधान और राजनीति के निर्बाध केसरियाकरण में अभिव्यक्त होंगे।

About the author

पलाश विश्वास।लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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