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मुक्त बाजार में हम बाराती, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना

मकान कहीं कोई नहीं है दोस्तों,  हर कहीं अब दुकान ही दुकान है।
शिक्षा दुकान। दीक्षा दुकान। धर्म दुकान। राजनीति दुकान।  चिकित्सा दुकान। समाज दुकान। व्यवस्था दुकान। सरकार दुकान। घर परिवार दुकान। रिश्ते नाते दुकान।
साहित्य संस्कृति सभ्यता लोक और मातृभाषा तक दुकानें।
इन दुकानों में कारोबार है। मनुष्यता लेकिन कहीं नहीं है।
2007- 2008 में अपने मोहल्ले में सात लाख के बदले मुझे तीन कमरे का फ्लैट मिल रहा था और हम सोदपुर में बस जाने का मंसूबा बांध रहे थे।
पीएफ और बैंक लोन के सहारे हम घर सजाने का ख्वाब भी देखने लगे थे।  लेकिन प्रोमोटर ने कह दिया कि एक लाख बिना हिसाब यानी कालाधन चाहिए।
हमारे पास कालाधन नहीं था।
हमने सफेद में ही आठ लाख का बंदोबस्त कर देने का वायदा किया लेकिन प्रोमोटर बाबू पसीजे नहीं।
हमारे मोहल्ले में अब भी बारासात रोड के हिंदी भाषी मजदूरों की बची खुची बस्ती है। जिससे सविता की खूब बतकही होती रहती है और वे लोग मुझे भी जानते हैं और बिना नाम की परवाह किये वे तमाम लोग मुझे हिंदी भाषी कहते समझते हैं।
सोदपुर के अनेक बांग्लाभाषी वाशिंदो के नजरिये से हम हिंदुस्तानी हैं, बंगाली नहीं हैं।
इन्हीं हिंदी भाषी मजदूर बस्तियों को उखाड़कर तेजी से फ्लैट अपने मोहल्ले में भी बन रहे हैं।
सड़क पार भद्र मोहल्लों में फ्लैट के भाव पचास लाख पार है तो इस पार पैंतीस लाख।
अब हम सपने में भी सोदपुर में अपना घर नहीं बना सकते हैं।
सोदपुर मे डेढ़ सौ शरणार्थी कालोनियां हैं और इनके नेता डा.संपत घोष अब भी अपने चैंबर में रोज मरीज देखते हुए करीब नब्वे साल की उम्र में नागरिक मानवाधिकारों की बंगाल भर में सबसे बुलंद आवाज हैं।
ये कालोनियां अभी भी पंजीकृत नहीं हो पायी हैं और बांगाल (पूर्वी बंगाल मूल के) सोदपुर के अनेक लोग केसरिया परिभाषा के मुताबिक बेनागरिक हैं और उनकी बस्तियां भी तेजी से बिल्डर प्रोमोटर राज में तब्दील हैं।
उनके लिए सबसे बेहतर स्थिति है कि उनके बच्चे इन्हीं प्रोमोटरों बिल्डरों के कारिंदे बन जायें और अपने मकान के एवज में किसी बहुमंजिली मकान में रहने के लिए एक अदद फ्लैट या रोजी रोटी के लिए एक अदद दुकान उन्हें मिल जाये।
अब शापिंग माल सोदपुर में सबसे ज्यादा हैं, जहां पहले कल कारखाने हुआ करते थे, वहां तमाम बहुमंजिसली आवासीय परिसर हैं या फिर शापिंग माल या कांप्लेक्स और कोलकता जैसे यही ठहर कर यक ब यक संपन्न हो गया है।
खरीददारी मे तो सारे उपनगरों में सोदपुर सबसे आगे हैं और नौकरीपेशा फ्लैटवालों की महिमा से बाजार के भाव भी सोदपुर में सबसे तेज है।
पानीहाटी नगरपालिका में चैतन्य महाप्रभु,  महात्मा गांधी और रवींद्र नाथ टैगोर की स्मृतियां भी हैं।
फुटबाल के अच्छे खिलाड़ी भी पानीहाटी सोदपुर के गर्व हैं, सुब्रत पाल से लेकर आईसीएल फाइनल जिताने वाले मुसलमान खिलाड़ी भी सोदपुर के ही हैं।
बाकी सोदपुर हाईस्कूल 1857 से पहले बना है।
यहां मुक्त बाजार का तांडव समझने के लिए सबसे अनुकूल माहौल है।
सत्तादल में कलाकार अनेक हैं।
जाहिर है कि सत्ता दल के कब्जे में पानीहाटी मेले में स्थानीय कलाकारों को इस बार कोई मौका नहीं है।
ममता दीदी और गिरफ्तार मदन मित्र को छोड़कर सारे मंत्री संत्री यहां काफिला समेत पधार चुके हैं और रोज-रोज बालीवुड टालीवुड का धमाका है।
देर रात तक नाच गाना तो रिहाइशी इलाकों में बार रेस्त्रां की नई फसल रोजगार छिनने के साथ उगते रहने से दस्तूर बन चुका है लेकिन पानीहाटी मेले में मुक्त बाजार का उत्सव है।
और बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना है।
इस मुहावरे में शादी भी एक खास लफ्ज है।
बंगाल में इन दिनों जात पांत शादी व्याह में कमसकम है नहीं और न दहेज उत्पीड़न है तो विधर्मियों के साथ शादी तो आम है।
पढ़े लिखे दलित स्त्री पुरुष तो या ब्राह्मणों की गृहवधू हैं या फिर घर जमाई। यह सारा करिश्मा वाम शासन का है।
अब शादी रजिस्टर्ड कराने का भी रिवाज चल निकला है और प्रेम विवाह हो या नहीं, लोग रजिस्टर्ड कर रहे हैं विवाह। लेकिन सामाजिक अनुष्ठान में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाती।
बाराती घराती दोनों पक्ष के लिए भोज का खूब इंतजाम होता है जैसे महाभोज का भी। देर रात तक लोग दावतें खाकर घर वापस लौटते रहते हैं और इन दावतों के चलते बेरोजगार पढ़े लिखों का कैटरिंग रोजगार भी चालू आहे।
हमारे गुरुजी जगतविख्यात सहकर्मी जयनारायण कुंवारे हैं। अब्दुल्ला दीवाना तो वे कतई हैं ही नहीं हैं। क्योंकि वे किसी शादी व्याह के मामले से सौ हाथ दूर रहते हैं और शादी व्याह के सख्त खिलाफ हैं। उनकी मानें तो शादी व्याह ही सारे फसाद की जड़ है। सारी समस्यायें शादी से शुरु होती हैं।
किसी के साथ किसी हादसे की खबर होती है और अगर वह स्त्री पुरुष शादी शुदा है तो गुरुजी फौरन साबित कर देंगे कि इसकी वजह शादी है।
कोई स्त्री उन्हें छू न दे, इसकी हर जुगत लगाते हैं।
उन्हें मित्रों के यहां जाने से डर लगता है कि कोई उन्हें फंसा न दे इस झमेले में।
हमारी किसी समस्या के बारे में मालूम हुआ उन्हें तो फौरन कहेंगे, और कर लो शादी।
पिछले तेईस साल से उनका कहा सुनते-सुनते और गृहस्थी के पापड़ बेलते बेलते हम लोग भी कभी-कभार मान लेते हैं कि उनसे पहले मुलाकात हो जाती तो हम हर्गिज नहीं करते शादी।
हिंदी पत्रकारिता में आटोमेशन पूरा हो चला है और सारी खबरें, सूचनाएं और मतामत,  विमर्श दिल्ली से फीड हैं। बाकी लोगों का पेस्टर पेजमेकर कायाकल्प हो चुका है।
बाहैसियत पत्रकार लेखक हिंदी पत्रकारिता में दिल्ली के बाहर किसी की न पहचान है और न कोई औकात है। हम लोगों की न ब्रांडिंग है और न हमारा बाजार भाव है।
हमने कितनों की ग्रुमिंग की, कितनों के संपादकीय कृतित्व के पीछे हमीं लोग हैं, यह गौण है। हमारी वरिष्ठता तो सुपरसिड कर दिये जाने के निमित्त है। हम लोग निमित्तमात्र हैं।
चूंकि जाति से हम लोग मेहनतकश बंधुआ प्रजाति के हैं, दीगर नस्लवालों को हमारे सर पर हगने मूतने की आजादी है।
ऐसे हैं हिंदी पत्रकारिता के बहुसंख्य लोग।
हम उन महामहिमों की यशोगाथा भी जानते हैं जो प्रशिक्षुस्तर से अपने राजनीतिक संपर्कों की वजह से अब करोड़पति अरबपति जमात में शामिल हैं और अंबानी के सथा कंधे से कंधे भिड़ाये हैं।
हमारी पोटली में अभी किस्सों का जखीरा है और अंतिम समय सामने है,  हम यह पोटली आहिस्ते-आहिस्ते खोलते जायेंगे और इस जन्नत का हकीकत बयां करेंगे। अब हमारा कुछ होना जाना नहीं है।
वेतनमान में भी दिल्ली के मुकाबले बाकी पत्रकार जमात बंधुआ मजदूर हैं।
पदोन्नति ताउम्र मिलनी नहीं है।
रघुकुल रीति भी वही टेली प्रिंटर जमाने की है।
हमें रिपोर्टर इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि हम अंग्रेजी जानते हैं और कामचलाऊ अनुवाद भी कर लेते हैं।  डेस्क पर यह काम की चीज है।
बाकी जनता, मसलन जो अंग्रेजी ठीकठाक नहीं जानते और जिनकी भरती किसी न किसी कारणवश अनिवार्यता रही है, उन्हें रिपोर्टिंग में घुसेड़ा जाता रहा है।
बाकी भारतीय भाषाओं में बेहतरीन लिखने वाले लोग ही रिपोर्टर बनाये जाते हैं और अनुवाद के बदले मौलिक सामग्री पर वहां जोर है।
मसलन बांग्ला के अखबारों में।
गौरतलब है कि बांग्ला के महाश्वेता देवी और नवारुण भट्टाचार्य को छोड़कर लगभग हर दिग्गज साहित्यकार किसी न किसी रुप में आनंदबाजार समूह से जुड़े रहे हैं।
उसका कारोबार देख लें और हिंदी अखबारों के जन्नत का हकीकत समझ लें।
हिंदी में जो लिखने वाले संपादक हैं वे बेचारे ज्यादातर उपसंपादक है और हिंदी ब्लागों की बहार भी उन्हीं की देन है।
इंडियन एक्सप्रेस समूह में बड़े संपादकों के अलावा बाकी गैर रिपोर्टर पत्रकारों को छापने का रिवाज नहीं है।  हम जागरण और अमर उजाला में लगभग रोजाना लिखते थे।
जनसत्ता में तेइस साल से लिखने का मौका मिला नहीं है।  झख मारकर ब्लाग और सोशल मीडिया में अपने वजूद को बहाल रखने की लड़ाई में हम अब्दुल्ला दीवाना हैं।
हमारे गुरुजी भी कुमार भारत अवतार में भारत परिक्रमा कर चुके हैं।  लिखते भी रहे हैं खूब।
फिल्मों के मामले वे लगभग एनसाइक्लोपीडिया हैं और पिछले तेइस साल से वे गंगासागर में लाइव हैं।
बेहतरीन लिख सकते हैं, लेकिन वे रिपोर्टर नहीं हैं।  संपादकों की कृपा से थोक भाव से स्ट्रिंगर तक रिपोर्टर बना दिये गये हैं लेकिन हमारे गुरुजी नहीं बनाये गये हैं।
हम तो अपनी भड़ास हर संभव भाषा में हर संभव विधा में निकाल ही लेते हैं और यह हमारा सामाजिक क्रिया कर्म भी है।  लेकिन गुरुजी तो भीष्म प्रण कर बैठे कि कंप्यूटर नहीं छुयेंगे।
बहरहाल तेइस साल की मेहनत के अंत में हम उनकी शादी भले ही नहीं करा सके हैं, लेकिन हम आखिरकार पिछले माह से कंप्यूटर पर उनसे नेट ब्राउज करवाने में कामयाब हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि वे किसी भी दिन कंपोज करने लगेंगे तो एक बेहतरीन लेखक से हिंदी समाज को वंचित न रहना होगा।
वे फिल्म निर्देशन का कोर्स भी कर चुके हैं लेकिन वे फिल्म नहीं बनाते हैं।
हमारे सरदर्द का सबब यह है कि पत्रकारिता के उन विरले जीवों में हमारे गुरुजी शामिल हैं, जो मुक्त बाजार संस्कृति के खिलाफ हैं और जमकर लिख भी सकते हैं, फिल्म भी बना सकते हैं।  लेकिन वे कुछ भी नहीं करते हुए लगातार बूढे होते जा रहे हैं।
मेरे ताउजी की मृत्यु जब निमोनिया और गिरकर कमर टूटने के बाद हुए आपरेशन की वजह से दिल्ली प्रवास के दौरान हुई जबकि वे हमारे छोटे भाई से, जो उनके इकलौते बेटे हैं,  अरुण से लगातार गांव बसंतीपुर लौटने की गुहार लगाते रहे हैं।  उनने दिल्ली में भरपूर जवानी में सौ साल की उम्र में दम तोड़ा।  उनके बाल अभी पूरे काले नहीं हुए थे और न उनके दांत गिरे थे।
मेरे पिता कैंसर से रीढ़ की हड्डियां गल जाने के बावजूद अपने लोगों के लिए जब तक घर में गिरकर बिस्तर के हवाले न हुए, लगातार दौड़ते रहे और लगभग बिना इलाज की मौत के बावजूद हर पल हर छिन अपनी प्रतिबद्धता और सरोकार के लिए जवान रहे, सक्रिय रहे।  वे भी बूढ़े हरगिज नहीं रहे।
मेरे डाक्टर चाचाजी के किस्से तो अजब-गजब के हैं, वह सिलसिला जल्द ही शुरु करने वाला हूं।
लेकिन जैसे डीएसबी के जमाने में हमारा ख्वाब था जवानी में शेली कीट्स भगतसिंह सुकांत की तरह मौत कमाने की, आज भी बिन बूढ़ा हुए अपने कामकाज, अपनी सक्रिय जवानी में मरना चाहता हूं।
अपने अति प्रिय गुरुजी जो तेइस साल से हमारे मित्र भी हैं,  सहकर्मी भी हैं और संपादकीय में मुड़ी,  मिठाई,  दही और सलाद के अनंत स्रोत हैं, वे इस तरह बेमतलब बूढ़े हो जाये, यह हमें हरगिज गवारा नहीं है।
हम उनसे रोज-रोज की बहस से अघाकर यह सारा किस्सा आज सार्वजनिक कर रहे हैं कि वे कुछ तो अपनी निष्क्रियता के लिए शर्मिंदा हों और हमारे साथ भरपूर जवानी के साथ मजबूती से खड़े हों इस सांढ़ संस्कृति के खिलाफ।
हम चाहते हैं कि वे रोज लिखे हमसे बढ़ चढ़कर।
हम चाहते हैं कि वे फिल्में भी बनायें जो हमारे सबसे अचूक हथियार हैं।
बाकी लोग उनके किस्से से मजे ले सकते हैं, लेकिन यह हमारे लिए एक अफसोसनाक हादसा है और हमारे प्रतिभा भंडार के अपचय की शोकगाथा है।
पता नहीं कि उनका काम कैसे चलता है।
पूछने पर कहते हैं कि जैसे अटलजी का चलता है, जैसे मोदी जी का चलता है, जैसे लताजी का चलता है, वैसे ही वे काम चला लेते हैं।
हम तो भइये,  सविता पर बेहद निर्भर हैं।  घर परिवार के सारे फैसले वही करती हैं।  घर परिवार और कुनबे के सारे गिले शिकवे वही सुनती हैं और निपटारा भी वहीं करती हैं।
बसंतीपुर से उनका ही हाट लाइन है और वहां वे अपनी सरकार चलाती हैं कोलकाता में बैठे-बैठे।
मुझे फालतू का कोई सरदर्द नहीं है।
सोदपुर वालों से भी सारे रिश्ते नाते उनके हैं।
हम तो अतिथि कलाकार भये।
हमारी निजी जिंदगी और दिनचर्या भी उनके ही रिमोट कंट्रोल से चलती है।  वे पुस्तकें पढ़ लेती हैं, फिल्में देख लेती हैं और जरूरी समझा तो कहती हैं, पढ़ लो या देख लो।  शादी के बाद से ऐसा चल रहा है।
हमें नहीं मालूम कि हमारे परिवार में बच्चों की शादी अब हो पायेगी या नहीं।  टुसु और अंकुर दोनों नौकरी नहीं करते और स्वतंत्र पेशा का कोई मोल नहीं है, इसलिए हमारे घर कोई दुल्हन आयेगी भी कि नहीं, कोई पता नहीं।
बेटियां बड़ी हो रही हैं।  उनकी चिंता है।
हमारे यहां अभी तक किसी ने दहेज लिया नहीं है लेकिन बेटियों की शादी बिना दहेज हो पायेगी या नहीं, नहीं जानते।  क्योंकि हमारी जमा पूंजी कुछ भी नहीं है।
भविष्य की चिंता है तो सविता की फिक्र है कि हमें कुछ हो गया तो उसके वास्ते हम कुछ भी तो नहीं छोड़ जा रहे हैं।
सारा जहां हमारा घर है, हमारा कोई घर नहीं है।
बेगानी शादी में हम तो अब्दुल्ला दीवाना हैं।
कल हमने फौरी तौर पर सिनेमा कानून बदलने की सूचना दी थी।  देखें –
सिनेमा और दृश्य माध्यमों पर अंकुश के लिए बन रहा नया कानून
http://www.hastakshep.com/oldhindi-news/nation/2014/12/28/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AB-%E0%A4%8F%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%9F-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AC
हिंदू राष्ट्र में फिल्मों पर निशाना साध रहा है संघ परिवार। 
O- पलाश विश्वास

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