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मुख्तार के नाम पर अखिलेश का घटिया सांप्रदायिक कार्ड और समाजवादी पाखंड

राजीव यादव

यूपी की सियासत में कौमी एकता दल का सपा में विलय और स्वामी प्रसाद मौर्या का बसपा से निकलना, फिर अखिलेश की नाराजगी से विलय न होना या फिर स्वामी का कभी बीजेपी पर तो कभी सपा पर हमला करना फिर वार्ता करने, परिवारों की मान मनौवल को सिर्फ चन्द घटनाएं नहीं, बल्कि कई तरह की नयी परिघटनाओं को दर्शाता है।

अखिलेश को बताना चाहिए कि किस तरह का विकास, यादव सिंह कर रहे थे अगर सिर्फ माफिया कारणों के नाते कौमी एकता दल का विलय नहीं हुआ, क्यों कि अखिलेश की रूचि समीकरण में नहीं विकास में है, तो अखिलेश को बताना चाहिए कि किस तरह का विकास, यादव सिंह कर रहे थे, जो उनके लिए वो सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए। जबकि चुनावी वादे के मुताबिक बेगुनाहों को रिहा करने के मुद्दे पर वो नहीं गए, उलटे निचली अदालतों से बरी होने के बाद उनके खिलाफ फिर वे कोर्ट चले गए।

बुआ कहकर मायावती को तंज करने वाले अखिलेश और उनकी पार्टी को अगर इतनी चिंता होती तो वे गेस्ट हाउस कांड के माफियाओं को पालते नहीं।

दरअसल ये कथित सामाजिक न्याय की राजनीति का दिन प्रति दिन आरएसएस के हिंदुत्ववादी एजेंडे के प्रति नत मस्तक नहीं, बल्कि समाहित होने की प्रक्रिया है। जिसे अपनी कमजोरी छिपाने के लिए अपने को सेक्युलर कहने वाले दोस्त इन फर्जी सोशलिस्टों के सहारे लड़ने की कोशिश करते हैं।

यहाँ ये कहना जरूरी होगा कि कमजोरी छिपाने के लिए अपने को सेक्युलर कहने वाले ये दोस्त भी दरअसल समाहित होने वाली प्रक्रिया में ही हैं।

खैर मुख़्तार प्रकरण के साथ स्वामी प्रकरण नहीं होता तो इसे समझना समझाना थोड़ा मुश्किल होता।

स्वामी प्रसाद मौर्या का मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए कांशीराम के मिशन को भटकाने बीजेपी को लाभ पहुँचाने वाली बातों को आप भूल गए होंगे तो फिर भी शिवपाल यादव से मिलने और आज़म खान के साथ की तस्वीरें तो याद ही होंगी। नहीं याद होगी या भूल गए होंगे तो बेहतर ही होगा स्वामी और आज़म खान जैसों के लिए।

स्वामी, मुख़्तार, आज़म ये सभी चरित्र सामाजिक न्याय की राजनीति के मंच के हैं जिन्हें खुद तो मंच मिल गया पर इनको अपना नेतृत्व देने वाले अनाथ हो गए। जब मंच छिनने लगता है तो ये उसे सामूहिकता का मसला बना दे हैं और इसे अधिकारों पर हमला बता देते हैं।

खैर, इनको ही सिर्फ दोष क्यों दें? यही काम तो मुलायम, लालू और तो और मायावती, नीतीश, जो बीजेपी के साथ सरकार बना चुके हैं, वो भी करते हैं।

दलित वर्ग अपना नेता चाहता है जो मायावती में उन्हें दिखता है और रही बात मायावती का नोट के बदले टिकट तो उससे नैतिक तौर पर सहमत असहमत हो सकते हैं, पर सच्चाई यही है कि उनके पास अन्यों की तरह न बड़े कारपोरेट न कोई अमर (जिनकी विदेशों में भी पूछ है नोट के बदले वोट जैसे मसलों पर।

फ़िलहाल इसी प्रतिभा के चलते सपा में फिर उनकी घर वापसी हुई है) और न बसपा कोई मिशन है।

साफ बात दलित वर्ग अपना नेता चाहता है जो मायावती में उन्हें दिखता है। मायावती अच्छी तरह जानती हैं कि इस वोट बैंक को बूथ पर लाने और पार्टी चलाने के लिए पैसे चाहिए, जो लोकतंत्र के महान पर्व में संभव है। अब इसे सोशल इंजीनियरिंग कह दें और आप मन लें, तो ये आपकी समझ है न।

स्वामी या जो भी बसपा से निकलता है वो कांशीराम के मिशन की बहुत बात करते हैं। ये वही मिशन है न जिसके चलते कांशीराम ने बीजेपी के साथ सरकार बनवायी थी।

यहाँ गौर करने की बात ये है कि जो स्वामी गोबर गणेश की पूजा न करने और बीजेपी को लाभ पहुँचाने का आरोप लगा बसपा से निकले थे, वो भटकते हुए उसी गोबर में घुसने का कठिन प्रयास करने लगे।

शुक्रिया अदा कीजिये तड़ीपार अमित शाह का, जो उन्हें सेक्युलर से कम्यूनल होने नहीं दिया। नहीं तो क्या था जैसे लालू की बेटी मीसा यादव के टिकट मिलने के बाद राम कृपाल यादव  को सेक्युलर से कम्युनल बना कृपाल का धर्म भ्रष्ट कर दिया वैसे अपने बच्चों के लिए तपस्या कर रहे स्वामी के लिये भी कर देते।

अब मुख़्तार सरीखे मुस्लिम नेताओं या कारोबारियों को इस बात को समझना चाहिए कि यह सामान्य अपराधों को साम्प्रदायिक रंग देने का वक़्त है। मुस्लिम लड़का हिन्दू लड़की से विवाह कर ले तो उसमें आईएसआई की साजिश और हर मुस्लिम की गतिविधि को जिहाद के दायरे में रखकर हिन्दू समुदाय के खिलाफ षड्यंत्र कर उसके एक मात्र देश को उससे छीनने के प्रयास के रूप में देखा जाता है।

अब कुछ हमारे भाई जियाउल हक़ की हत्या के आरोपी रघुराज प्रताप सिंह से तुलना कर दें तो ये उनके दिमाग का है। जो राजा भैया को क्लीन चिट दिलवाए और खालिद मुजाहिद जैसे निर्दोष की हत्या करवाए, उनसे यही उमीद थी है और रहेगी।।

अब विहिप के नेता उदय प्रताप सिंह जो अस्थान में मुसलमानों का घर फुँकवाते हैं और मुहर्रम के दिन आरएसएस के समर्पित कार्यकर्ता की तरह घर पर अखंड रामायण करवाते हैं और जुलुस नहीं निकलने देते हैं, जैसे न जाने कितने विजय पताका फहरा चुके हैं। ऐसों से तुलना करना उस समाज के लोगों को शोभा नहीं देता जिनके समुदाय को फाँसी देना 'सामूहिक चेतना' की माँग है। और रघुराज तो उदय प्रताप के बेटे ही ठहरे।

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