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मुगलेआजम बन गये हैं आजम खाँ, जो अपने विरोधियों को दीवाल में भी चिनवा सकते हैं

जाने-माने चिंतक कँवल भारती पूरी रंगत के साथ लौट कर फेसबुक पर आ गये हैं और आते ही उन्होंने समाजवादी पार्टी के नेता मौ. आज़म खाँ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अपने फेसबुक वॉल पर भारती जी ने लिखा है- “सभी मित्रों को नमस्कार, गिरफ़्तारी के कारण मैं इधर मानसिक रूप से भी परेशान रहा और कम्प्यूटर न होने की वजह से न आप लोगों से जुड़ सका और न लेखन से। जब्त कम्प्यूटर मिलने की नाउम्मीदी में मैंने अब लैपटॉप खरीद लिया है और 5 अगस्त के बाद आज पुन: फेसबुक से जुड़ रहा हूँ। मैं अपने उन सभी साथियों का आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने सारे मतभेद भुला कर मुझे अपना समर्थन दिया और मुझे अन्याय का मुकाबला करने की शक्ति दी। मेरी गिरफ़्तारी जहाँ लेखकीय अभिव्यक्ति पर प्रहार है, वहां तीखा और कटु सत्य लिखने की सजा भी है. लेकिन यह अच्छी बात है कि मुझे अपने रामपुर में मदरसे का मुद्दा उठाने पर मुसलमानों का व्यापक समर्थन मिल रहा है।“
“सत्ता-प्रतिष्ठान और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सवाल” शीर्षक से उन्होंने पूरे घटनाक्रम पर प्रकाश डाला है और सवाल किया है कि आजम खाँ के जुल्म के शिकार ये तमाम लोग आज समाजवादी पार्टी की सरकार से पूछना चाहते हैं कि क्या यही समाजवाद है?
आइए देखते हैं क्या लिखा है कँवल भारती ने

“सत्ता-प्रतिष्ठान और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का सवाल”
(कॅंवल भारती)
घटना 6 अगस्त की है, सवेरे के आठ-सवा बजे का समय था, मैं टायलेट से निबट कर निकला ही था कि दो लड़कों ने दरवाजे पर दस्तक दी। मैंने गेट खोल कर पूछा- ‘जी कहिए।’ वे बोले- ‘हम पुलिस से हैं, आपके खिलाफ एक कम्पलेंट है, आपको थाने चलना है।’ मैं कुछ परेशान हुआ, इतने में ही पुलिस की जीप आ गयी और उसमें से एक मूँछों वाला दारोगा उतर कर घर में घुस आया और मेरा हाथ पकड़ कर ले जाने लगा। मैं उस वक्त बनियान और पैजामे में था, मैंने कहा-‘मुझे कपड़े तो पहन लेने दो।’ पर उसने मुझे कपड़े नहीं पहनने दिये और उसी स्थिति में वह मुझे गाड़ी में बैठाकर थाना सिविल लाइन्स ले गया, जहाँ उसने मुझे पुलिस कस्टडी में बैठा दिया। उन्होंने मुझे दोपहर के एक बजे तक बैठाये रखा। मेरे बार-बार पूछने पर भी पुलिस ने मुझे न तो यह बताया कि मेरे खिलाफ कम्पलेन्ट क्या है और न यह कि कम्पलेन्ट करने वाला कौन है? जब एक बजे के बाद उन्होंने मुझे सी.जे.एम. कोर्ट में पेश कर मुजरिमों के कटघरे में खड़ा किया, जब वहाँ मुझे मालूम हुआ कि मेरे द्वारा फेसबुक पर की गयी टिप्पणी पर मेरे विरुद्ध धारा 153ए और 295ए के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज किया गया है और मुझे जेल भेजने की तैयारी है।

खैर, यह गनीमत रही कि मेरे परिवार वालों और मित्रों ने मेरी जमानत के लिये वकीलों की व्यवस्था कर ली थी। मेरे वकीलों ने कोर्ट में इन धाराओं पर बहस की। ये धाराएँ गैर-जमानती थीं। पर, सीजेएम ने यह कहते हुए कि फेसबुक पर लिखना अपराध नहीं है, मुझे जमानत दे दी। पर, उन्होंने मुझ पर लगायी गयीं धाराओं को खारिज नहीं किया।

फिर भी मैं सीजेएम का बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने मेरी बेल मन्जूर करके मुझे एक बड़ी राहत दी है। इसके बाद मैं अपने तमाम फेसबुक-मित्रों, सामाजिक-मानवाधिकार संगठनों, साहित्यकारों, पत्रकारों और उन तमाम मीडिया-कर्मिंयों का आभारी हूँ, जिन्होंने व्यापक समर्थन देकर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के सवाल को देशव्यापी मुद्दा बना दिया।

गलत गिरफ्तारी

जो धाराएँ मुझ पर लगायीं गयीं थीं, उनमें तीन साल की सजा का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सात साल से कम की सजा वाली धाराओं के अन्तर्गत गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। लेकिन रामपुर पुलिस ने मुझे गिरफ्तार करके सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की। जिस बनियान-पैजामे की स्थिति में पुलिस मुझे घर से उठा कर लेकर गयी, वह भी मेरे प्रति पुलिस का अमानवीय व्यवहार था। मुझे तथा मेरे घर वालों को एफआईआर और गिरफ्तारी की सूचना दिये बगैर मुझे गिरफ्तार करना भी नियमों के विरुद्ध था।

मेरे द्वारा फेसबुक पर क्या लिखा गया था, जिससे उत्तर प्रदेश सरकार के काबीना मन्त्री आजम खाँ बौखला गये और उन्होंने रामपुर के अपने मीडिया प्रभारी को मेरे विरुद्ध एफआईआर लिखाने तथा उस पर जिला प्रशासन को मुझे गैर-जमानती धाराओं में गिरफ्तार करने के आदेश दे दिये?

मामला रामपुर में 23 जुलाई को एक दो सौ साल पुराने इस्लामिक मदरसे को तोड़े जाने का था। इस इमारत का ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्व था। पुरातत्त्व-कानून सौ साल तक पुरानी इमारतों को संरक्षित करने को कहता है, पर जिला प्रशासन ने यहाँ दो सौ साल पुराने मदरसे को गिरा दिया और वह भी रमजान के महीने में ही, जो भारत में साम्प्रदायिक दृष्टि से बहुत सम्वेदनशील माना जाता है। इस गैर-कानूनी कार्यवाही के लिये यहाँ किसी भी अधिकारी को सस्पेन्ड नहीं किया गया। मैंने फेसबुक में 2 अगस्त की अपनी पोस्ट पर इसी मुद्दे को उठाते हुए लिखा था कि अगर नोएडा में मस्जिद की दीवार गिराने पर वहाँ की एसडीएम दुर्गाशक्ति नागपाल को सस्पेन्ड किया जा सकता है, तो रामपुर में मदरसा गिराने पर किसी अधिकारी को सस्पेन्ड क्यों नहीं किया गया? मैंने यह भी जोड़ा था कि रामपुर में इसलिये किसी को सस्पेन्ड नहीं किया गया, क्योंकि यहाँ अखिलेश यादव का नहीं, आजम खाँ का राज चलता है। यह भी सच है कि मदरसे पर बुलडोजर आजम खाँ ने ही चलवाया था। पुलिस के बल पर उन्होंने रामपुर में अपना इतना खौफ बरपा कर रखा है कि कोई भी उनके खिलाफ बोलने का साहस नहीं कर सकता, जो बोलने का साहस करता है, वह उनका दुश्मन है और वह अपने हर दुश्मन की आवाज को दबाते आये हैं। मेरी फेसबुक पोस्ट को लेकर मेरे विरुद्ध संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कराकर मुझे गिरफ्तार कराने के पीछे भी आजम खाँ का मकसद मेरी आवाज को दबाना ही था। जब वह इस मकसद में कामयाब नहीं हुए, तो उन्होंने अपने लोगों के द्वारा प्रशासन पर यह दबाव डलवाया कि वह मुझ पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने की कार्यवाही करे।

इस पूरे प्रकरण में आजम खाँ की तानाशाही जिस तरह सामने आती है, उसका विरोध पूरी मीडिया और लेखक बिरादरी ने किया और जो अभी भी जारी है। दूसरी ओर आजम खाँ अपनी तानाशाही से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और अभी भी मुलायम सिंह यादव और मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव पर मुझ पर रासुका लगाने के लिये दबाव बनाये हुए हैं। जो रासुका, वरुण गाँधी पर भी नहीं लगायी गयी, और जिन्हें आरोप-मुक्त कराने में सपा सरकार की साजिश भी स्टिन्ग आपरेशन में सामने आ चुकी है, वह लोकतान्त्रिक तरीके से सरकारों के फासीवादी चेहरे को उजागर करने वाले लेखक पर लगाने की माँग करा कर आजम खाँ ने यह साबित कर दिया है कि रामपुर में वही होगा, जो वह चाहेंगे और यह भी रामपुर में उन्हीं का राज चलता है।

लोकतन्त्र पर हमला

निश्चित रूप से मेरी गिरफ्तारी अभिव्यक्ति की आजादी के दमन की देश में पहली घटना नहीं है। फेसबुक की ही अगर हम बात करें, तो एक साल पहले मुम्बई में बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद मुम्बई-बन्द के विरोध में फेसबुक पर टिप्पणी करने वाली दो लड़कियों को भी इसी तरह गिरफ्तार करके प्रताडि़त किया गया था। असीम त्रिवेदी को तो ‘देशद्रोह’ में ही बन्द कर दिया गया था, जिन्होंने कार्टून के जरिए अपना विरोध दर्ज किया था। महाराष्ट्र में घूम-घूम कर आंबेडकर-फुले के विचारों का गीतों के माध्यम से प्रचार करने वाली संस्था ‘कबीर कला मंच’ के कलाकारों के दमन की घटना तो अभी हाल की ही है।

लोकतन्त्र पर केवल आजम खाँ ही हमलावर नहीं है, केवल सपा सरकार ही हमलावर नहीं है, वरन् हमारी सभी सरकारें इसी दिशा में जा रही हैं।

आजम खाँ का जंगल राज

आजम खाँ ने अपनी राजनीति रामपुर के नवाबों के विरोध से शुरु की थी। पर अब वह खुद रामपुर के नवाब बन गये हैं। वह कहते हैं कि ऊपर के फैसले खुदा करता है और नीचे के फैसले वह खुद करते हैं। मतलब साफ है कि वह अपने आपको नीचे का खुदा समझते हैं। जिस नवाबी के दौर में आम जनता के उत्पीड़न की कहानी वह अपने भाषणों में चिल्ला-चिल्ला कर बताते हैं, वही आम जनता उनकी अपनी नवाबी में सबसे ज्यादा पीड़ित है। रामपुर में उनके सारे फैसले एक मुख्यमन्त्री की हैसियत से होते हैं और उनमें अखिलेश यादव भी दखल नहीं देते। अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव आजम खाँ को मुसलमानों का बड़ा नेता समझते हैं, जो उनकी सबसे बड़ी गलत फहमी है। अगर वह मुसलमानों के नेता होते, तो जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद नहीं करते। मुसलमानों के दो सौ साल पुराने इस्लामिक मदरसे पर बुलडोजर चलवाते हुए उन्हें शर्म आती, उनके हाथ काँपते, पर न उन्हें शर्म आयी और न उनके हाथ काँपे। जनता पुलिस से डरती है, क्योंकि आजम खाँ ने उसे अपने विरोधियों पर लाठियाँ चलाने, गोलियाँ चलाने और झूठे मुकदमों में जेल भेजने की खुली छूट दे रखी है। इसके लिये उन्होंने अपने खास पुलिस इन्सपैक्टर को प्रोन्नति देकर सीओ सिटी बना रखा है, जिसका नाम आले हसन है। रामपुर में पुलिस का जुल्म और खौफ इतना भयानक है कि मुँह में जुबान होते हुए भी जनता मुँह खोलने की हिम्मत नहीं करती, क्योंकि जिसने भी मुँह खोला, उसे कुचल दिया जाता है। आजम खाँ मुगलेआजम बन गये हैं, जो अपने विरोधियों को दीवाल में भी चिनवा सकते हैं। जब मैंने मदरसे के मामले को फेसबुक पर उठाया और उससे बौखला कर आजम खाँ ने मुझे गिरफ्तार कराया, तो पूरे शहर में आजम खाँ के खिलाफ रोष और मेरे समर्थन में खुशी की लहर दौड़ गयी। मदरसा-संचालक बाबू खाँ मेरे घर आकर मुझसे गले मिल कर बोले कि जो काम मुसलमानों को करना चाहिए था, वह आप जैसे गैर मुस्लिम ने किया। एक मुस्लिम ने तो यहाँ तक कहा कि अल्लाह जिससे चाहता है, उसी से काम लेता है। उन्होंने कहा कि कुरआन में लिखा है कि अगर मुसलमान जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना बन्द कर देंगे, तो अल्लाह कहता है कि यह काम मैं किसी गैर मुस्लिम से ले सकता हूँ। मैं नहीं जानता कि यह कहाँ तक सच है। पर मुझे यह जरूर ताज्जुब होता है कि मुझ जैसे नास्तिक से अल्लाह ने यह काम कैसे ले लिया?

आजम खाँ का जंगल राज सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है कि उन्होंने एक नहीं, दो मदरसों पर बुलडोजर चलवाया, वरन् उन्होंने सैकड़ों लोगों का रोजगार छीनकर उन्हें बेरोजगार भी कर दिया। अतिक्रमण के वैधानिक नाम पर उन्होंने 25 साल पुरानी सब्जी मण्डी को उजाड़ कर, सालों पुरानी दुकानों और सैकड़ों दिहाड़ी मजदूरों के घरों पर बुलडोजर चलवा कर उनके परिवारों को रोजी-रोटी से मुहताज कर दिया। आजम खाँ के जुल्म के शिकार ये तमाम लोग आज समाजवादी पार्टी की सरकार से पूछना चाहते हैं कि क्या यही समाजवाद है?

मेरी गिरफ्तारी ने रामपुर की जनता में आजम खाँ के फासीवादी डर को कम किया है। यह मेरे लिये फेसबुक की एक बड़ी उपलब्धि है।

15 अगस्त 2013

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