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मुजफ्फरनगर- खतरनाक है अखबारों की यह साजिश

खबरों को सनसनीखेज और उत्तेजक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी अखबारों ने
मीडिया क्षेत्र की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका जन मीडिया ने इस अंक में मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा और अखबारों की भूमिका पर बेहतरीन शोध पत्र प्रकाशित किया है। हम हस्तक्षेप के पाठकों को यह शोध पत्र उपलब्ध करा रहे हैं। शोध पत्र काफी लम्बा होने के चलते इसे हम किस्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। …
सं. ह.
मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा और अखबारों की भूमिका-4

शोधार्थी – अवनीश कुमार

दंगे के पश्चात् जब मामले के आरोपी लोगों की गिफ्तारियों का दौर शुरू हुआ तब अखबारों का क्या रूख रहा यह नीचे की खबरों से साफ होता जाएगा।

दैनिक जागरण, मुजफ्फरनगर, भोपा

शीर्षकः बीरबानियों की हुंकार, बजा देंगे ईंट से ईंट

अखबार लिखता है – …शासन प्रशासन की तरफ से एक पक्षीय कार्रवाई के खिलाफ भोपा थाना क्षेत्र के धीराहेड़ी गाँव की महिलाओं ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।… पुलिस की कार्रवाई को अखबार सिरे से खारिज करता नजर आ रहा है। शीर्षक में जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है आमतौर पर उन शब्दों का प्रयोग वीरता और हिंसा एवम् अन्य कृत्यों को न्यायोचित तरीके से पेश करने के लिये किया जाता है। प्रशासन की कार्रवाई एकतरफा है, यह रिपोर्टर ने पहले ही मान लिया है और इस तरह बीरबानियों के पक्ष में खड़ा हो गया है। इस बारे में प्रशासन का पक्ष जानने की कोई कोशिश नहीं की गयी है।

….दंगा शांत होने पर भी क्षेत्र के गाँव में तनाव है। खेतों में लगातार नकाबपोश बदमाश दिखाई दे रहे हैं। लड़कियों का स्कूल-कॉलेजों में जाना मुश्किल हो गया है। चार सप्ताह बीतने पर भी किसानों के ट्रैक्टरों का कोई मुवाअजा नहीं मिला है।….  इस जानकारी का खबर में कोई स्रोत नहीं दिया गया है। प्रदर्शन कर रही महिलाएं यदि ये बात कह रही हैं तो इस आरोप के साथ उनका नाम जाना चाहिए। पर खबर में ये बात एक तथ्य के तौर पर शामिल कर ली गयी है। यह पाठक के विवेक पर छोड़ दिया गया है कि वह नकाबपोश के बारे में अनुमान लगाये। लड़कियों का स्कूल जाना क्यों छूट गया है इसकी कोई वजह नहीं बतायी गयी है, बल्कि तथ्यों को इस तरीके से रखा गया है कि पाठक स्वयं ही वजह की पड़ताल एक खास दिशा में कर ले।

खबर आगे कहती है – …महिलाओं ने पंचायत कर कहा कि प्रशासन बहुसंख्यक वर्ग के खिलाफ फर्जी नामजदगी कर उन्हें जेल भेज रहा है।…आक्रोशित महिलाओं ने चेतावनी दी कि यदि एकपक्षीय कार्रवाई बंद नहीं हुयी तो महिलाएँ सरकार की ईंट से ईंट भिड़ा देंगी।… दुनिया के इतिहास में ऐसा शायद पहली बार हुआ होगा जब बहुसंख्यक वर्ग पीड़ित हुआ हो। यहाँ महिलाओं के साथ रिपोर्टर की भावनाएं भी जुड़ गयी हैं और वह उन्हीं महिलाओं की भाषा बोलने लगा है, या शायद उसे भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है।

इस खबर के साथ एक फोटो भी है जिसमें महिलाओं का एक बड़ा समूह हाथों में डंडा उठाए आंदोलन की मुद्रा में दिख रहा है। तस्वीर का इस्तेमाल हमेशा घटना की प्रभावशीलता का बयान करने के लिये होता है। यहाँ भी उसका यही इस्तेमाल है और यह बताने की कोशिश है कि महिलाओं की यह पंचायत अपने आप में बड़ा संदेश लिये हुये है।

जानसठ कार्यालय से जागरण की एक अन्य खबर की तस्वीर का कैप्शन है – मुजफ्फरनगर के सिखेड़ा क्षेत्र के एक गाँव में तमंचे लेकर प्रदर्शन करती महिलाएं। तस्वीर में महिलाओं के हाथ में तमंचे दिख रहे हैं।

…सपा सरकार के खिलाफ महिलाओं का उग्र प्रदर्शन लगातार जारी है। बुधवार को नूनीखेड़ा, राजपुर व नंगला मुबारिक में महिलाओं ने सीएम अखिलेश यादव व आजम खां के पुतले जलाए। नूनीखेड़ा में एक मुस्लिम महिला ने सीएम के पुतले में आग लगाई।… खबर का यह हिस्सा यह बताने की कोशिश है कि महिलाओं का प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है और जायज है। मुस्लिम महिला के पुतला जलाने का जिक्र करना यह साबित करना है कि प्रशासन के इस “अत्याचार” में मुस्लिम महिलाएं भी दूसरे समुदाय की महिलाओं के साथ हैं।

…महिलाओं का आरोप था कि सरकार एकपक्षीय कार्रवाई कर रही है। पुलिस ने सैकड़ों लोगों को फर्जी मामलों में फंसाया हुआ है।…यहाँ अखबार लगातार ये दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है कि प्रशासन कोई कार्रवाई न कर पाए। पुलिस की कार्रवाईयों को एकतरफा बताकर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि वह दूसरे समुदाय के खिलाफ कोई एक्शन नहीं ले रहा है।

अमर उजाला, 28 सितम्बर, मुजफ्फरनगर

 

शीर्षक – उफ! ये गुस्सा, गांवों में हल्ला बोल

अमर उजाला के इस पूरे पेज पर तीन चौथाई हिस्से तस्वीरों से भरे हैं। पहली तस्वीर मोहम्मदपुर राय सिंह गाँव की है जहाँ महिलाएं और लड़कियाँ हाथों में डंडा, हंसिया और चप्पल लिये आक्रामक मुद्राओं में दिख रही हैं। दूसरी तस्वीर में महिलाएं पुतला फूँक रही हैं और तीसरी तस्वीर में पुतले को डंडे से पीट रही हैं।

चौथी तस्वीर मुंडभर की है जहाँ बहुत सारी बूढ़ी और जवान महिलाएं इकट्ठा हैं। उनमें से कुछ खड़ी और कुछ बैठी हुयी हैं। लगभग सभी महिलाओं के हाथों में डंडा और चप्पलें दिख रही हैं।

इन तस्वीरों के बीच में एक कॉलम की खबर है। खबर का शीर्षक है – क्या कराएगा ‘आधी आबादी’ का गुस्सा।

…गाँव की महिलाओं का गुस्सा देख पुलिस को पसीने आने लगे हैं। दबिशों का सिलसिला थम चुका है। हिंसाग्रस्त गांवों में पुलिस की फर्जी नामजदगी को लेकर महिलाएं सड़क पर हैं।…रिपोर्टर पूरी तरह से आंदोलनरत महिलाओं की भाषा बोल रहा है। इन आंदोलनों का पुलिस पर क्या असर है, इस पक्ष को जानने की कोई कोशिश नहीं की गयी है लेकिन यह साबित करने की कोशिश पूरी है कि “..पुलिस को पसीने आने लगे हैं..”

रिपोर्ट लगातार पुलिस को दोषी बनाने में लगी हुयी है। वे पुलिस की कार्रवाईयों को नाजायज मानते हैं। यहाँ रिपोर्टर अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति कर रहा है जब वह कहता है कि “…फर्जी नामजदगी और पुलिस की वक्त बेवक्त दबिशों से तंग आई महिलाओं को सड़कों पर उतरना पड़ा। उनमें सरकार को लेकर नाराजगी है तो प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भरोसा नहीं।…”

इस खबर के साथ की तस्वीरें भी एक पक्ष को ही प्रमुखता से उभार रही हैं। हाथों में चप्पलें और डंडे लिये महिलाओं की तस्वीर पुलिस-प्रशासन के लिये एक चुनौती की तरह पेश आ रही है। तस्वीर यह जाहिर करती है कि प्रशासन व्यवस्था पर किसी का भरोसा नहीं है।

दैनिक जागरण, 3 अक्टूबर, मेरठ, मुजफ्फरनगर

शीर्षक – महिलाओं व बच्चों ने थामें लाठी और तमंचे

खबर के अलावा बोल्ड टाइप में कुछ प्रमुख बाते लिखी गयी हैं।-…वेस्ट यूपी का एक बड़ा हिस्सा इस वक्त अराजकता की चपेट में है। मारपीट, कत्ल और हमले की वारदात थमने का नाम नहीं ले रही है। अपने सुहाग और बेटों की फर्जी नामजदगी को लेकर मुजफ्फनगर और मेरठ में महिलाएं देहरी लांघ सड़कों पर हैं। उनका आक्रोश चंडी का रूप धारण करता जा रहा है। मीठा बोल झरने वाली जुबान मुर्दाबाद रूपी आग उगल रही है। चुनरी के बोझ से झुक जाने वाले कंधे सरकार के नुमाइंदों के पुतले ढो रहे हैं। चूड़ियों की खनखनाहट नारेबाजी के शोरगुल में खो गयी है। मेंहदी रचे हाथों में लाठी-डंडे और तमंचे तक लहरा रहे हैं। एकपक्षीय कार्रवाई को लेकर गुस्साई महिलाओँ का यह आक्रोश सरकार के लिये किसी नई आफत का इशारा कर रहा है।…

इस खबर के साथ दो तस्वीरें हैं। पहली तस्वीर नूनीखेड़ा गाँव की है जहाँ महिलाएं हाथों में डंडा, हंसिए और तमंचों के साथ आक्रामक मुद्रा में दिख रही है। इस तस्वीर में कम से कम दो महिलाओं के हाथ में देशी तमंचे दिख रहे हैं। दूसरी तस्वीर में महिलाएं और कुछ पुरूष दिख रहे हैं जो पुतला दहन कर रहे हैं। इसी खबर के उपर बुलेट प्वाइंट खबरों में एक खबर है – ..एक मुस्लिम महिला ने दी पुतले को आग…

विश्लेषणः शीर्षक यह बताने की कोशिश है कि प्रशासन का “अत्याचार” इतना बढ़ गया है कि महिलाएं तमंचा उठाने को मजबूर हो गयी हैं। अवैध तमंचे रखना और उनका सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन यहाँ रिपोर्टर को कानून व्यवस्था का मामला नहीं नजर आता। वह इसे जायज ठहराता दिख रहा है। खबर के साथ बोल्ड टाइप में जो जानकारी लिखी है वह किसी खबर का हिस्सा नहीं बल्कि वीर गाथा की चौपाई नजर आती है। साफ दिखता है कि रिपोर्टर का झुकाव कहाँ है।

अमर उजाला, 28 सितम्बर, शामली से

 

शीर्षक – अखिलेश सरकार गद्दी छोड़ो

महिलाओँ ने फर्जी नामजदगी पर नाराजगी जताई

पूरे पेज की इस खबर में पुलिस की गिरफ्तारियों के खिलाफ महिलाओं का आक्रोश बयाँ किया गया है – …जिले में भड़की हिंसा के बाद ग्रामीणों के विरूद्ध दर्ज हो रही रिपोर्ट से महिलाएं पुलिस प्रशासन के रवैयै से आजिज आ गयी हैं। सिंभालका गाँव की महिलाओं ने सूबे की सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई शुरू करने का ऐलान किया है।…

…महिलाओं ने बताया कि हिंसा के बाद कथित रूप से गाँव के सैकड़ों लोगों के खिलाफ झूठे मुकदमें दर्ज कराए जा रहे हैं। पंचायत की अध्यक्षता कर रही ईश्वरी देवी ने कहा कि एक आदमी थाने पहुँचकर सैकड़ों लोगों के खिलाफ मुकदमें दर्ज कराने में सफल हो जाता है। पुलिस भी बगैर जाँच किए सपा सरकार के दबाव में काम कर रही है। निर्दोषों के विरूद्ध रिपोर्ट दर्ज होने से लोगों में काफी गुस्सा है। पुलिस के डर से पुरूष और नौजवान गाँव छोड़कर छिपते घूम रहे हैं। स्कूल कॉलेजों में पढ़ने वाले उनके बच्चों को भी झूठे मकदमों में फंसाया जा रहा है।…

…सरकार षड़यंत्र रचकर नौयुवकों के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है।…

…महिलाओं ने चेतावनी दी कि अगर उनके बच्चों की गिरफ्तारी हुयी तो सबसे पहले वे जेल जाएंगी।…

विश्लेषणः शीर्षक एक आदेश की तरह छपा है, लेकिन यह आदेश कौन दे रहा है, इस बात का जिक्र नहीं है। अगर ये बात किसी ने कही है तो शीर्षक के साथ उसका नाम जाना चाहिए ताकि पाठकों को पता चल सके कि ऐसा कौन कह रहा है। अगर नाम नहीं दिया जा रहा है तो कम से कम इस बात को उद्धरण चिन्ह के अन्दर लिखा जाना चाहिए और खबर में इस बात का उल्लेख करना चाहिए। पर ऐसा लगता है मानो अखबार ही गद्दी छोड़ने का आदेश दे रहा हो। पत्रकारिता के आचरण के मानदंडों के हिसाब से यह बिलकुल गलत है।

यहाँ भी रिपोर्टर और अखबार एक पक्ष में खबरें छाप रहे हैं। एक पक्ष को प्रमुखता से लगातार छापने का यह प्रयास सायास है। पुलिस की कार्रवाई पर समुदाय की महिलाओं द्वारा दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।

अमर उजाला, सितम्बर, शामली से

शीर्षक – ‘सुन ले सरकार, नहीं सहेंगे अत्याचार’

फर्जी नामजदगी के विरोध में प्रदेश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन जारी

…साम्प्रदायिक हिंसा के मामले में दर्ज मुकदमों का विरोध जारी है…

…बहावड़ी में महिलाओं ने प्रदेश सरकार का पुतला फूंकते हुये बेकसूरों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की मांग की। उन्होने चेताया कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वह अपने बच्चों और पशुओँ के साथ अफसरों के यहाँ डेरा डाल देंगी।…

…महिलाओं ने कहा कि हिंसा के बाद दर्ज मुकदमों में गाँव वालों को कुछ लोगों ने गुमराह कर फर्जी मुकदमें दर्ज करा दिए हैं।…

न्याय माँग रही महिलाओँ की इस खबर के साथ ही दो तस्वीरें भी हैं। पहली तस्वीर में महिलाएं भारी संख्यां में इकट्ठी हैं और उनके हाथों में लाठी डंडे और फरसे हैं। दूसरी तस्वीर में पुरूष प्रदेश सरकार का पुतला फूँकते नजर आ रहे हैं।

अमर उजाला, मुजफ्फरनगर से

शीर्षक – ‘पहले म्हारी लाश उठैगी’

विश्लेषणः शीर्षक उत्तेजक है और यह बताता है कि ये कर्ता किसी भी हद तक जा सकता है। इस तरह यह पाठक के मन में भी उत्तेजना पैदा करता है। खबर का पहला पैरा यहाँ से शुरू होता है – …दंगे में फर्जी नामजदगी और एकपक्षीय कार्रवाई को लेकर देहात की महिलाओं का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। चूल्हा चौका छोड़कर महिलाओं ने सरकार के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंक दिया है।…

…भाकियू के गढ़ मुंडभर गाँव की महिलाओं ने ऐलान किया कि अगर उनके गाँव के निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी हुयी तो पहले म्हारी लाश उठैगी।…

…लोकसभा चुनाव में सपा के बहिष्कार का ऐलान किया।…

खबर में उन लोगों को लगातार निर्दोष साबित करने की कोशिश हो रही है जिनके खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया है। दूसरी तरफ महिलाओं के बयानों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है और जरूरत से अधिक तूल दिया जा रहा है ताकि उसको कुछ ज्यादा ही प्रभावशाली बनाया जा सके।

अमर उजाला, 28 सितम्बर, मेरठ

शीर्षक- मुजफ्फरनगर- दंगा और सियासत

अखबार के पेज 4 पर शीर्ष में ही एक बड़ी तस्वीर है जिसके दाईं तरफ एक कॉलम में दंगे से जुड़ी तीन छोटी – छोटी खबरें हैं। यहाँ तस्वीर में आगे बहुत सी महिलाएं, लड़कियाँ और बच्चियाँ खड़ी हैं जो डंडा, लाठी और चप्पलें हाथ में लिये हुये हैं। पीछे कुछ पुरूष खड़े दिख रहे हैं।

अमर उजाला, 28 सितम्बर, मेरठ

शीर्षक – गांवों में उबाल, हल्ला बोल (बोल्ड शीर्षक)

अखबार के इस पेज पर भी तस्वीरों की भरमार है जो विभिन्न गाँवों में महिलाओं के समूह की है। तस्वीरें काफी बड़ी-बड़ी हैं और उनमें भारी संख्या में महिलाएं हाथों में डंडा और चप्पलें लिये दिख रही है। मुद्रा आक्रामक है। भीड़ में कुछ छोटे बच्चे और बच्चियाँ भी दिख रहे हैं।

दैनिक जागरण, सितम्बर, मेरठ

शीर्षक – बेटियों को छेड़ा तो सिखा देंगे सबक

अखबार निज प्रतिनिधि के हवाले से लिखता है – …भौराकलां थाना क्षेत्र के गाँव मौहम्मदपुर राय सिंह, मुंडभर और हड़ौली में फर्जी नामजदगी और गिरफ्तारियों को लेकर महिलाओं का गुस्सा फूट पड़ा। स्कूल जाती लड़कियों के साथ संप्रदाय विशेष के युवकों द्वारा छेड़खानी को लेकर महिलाओं ने मौके पर ही सबक सिखाने की चेतावनी दी।…

…महिलाओं व छात्राओं ने समुदाय विशेष के युवकों पर छेड़खानी का आरोप लगाते हुये कहा कि जब तक पुलिस उनकी सुरक्षा का जिम्मा नहीं ले लेती तब तक वे स्कूल नहीं जाएंगी।…

यहाँ भी खबर के बाकी हिस्से तो पहले जैसे ही हैं जो प्रशासन की कार्रवाईयों को गलत ठहरा रहे हैं और साथ ही गाँव की महिलाओं के पक्ष में खड़े हैं लेकिन यहाँ एक नया तथ्य जुड़ गया है। अखबार कहता है – …कहा जा रहा है कि हुसैनपुरा के शिविर से आ रहे अल्पसंख्यक युवक गाँव में फायरिंग व चोरी की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।… यहाँ बात …कहा जा रहा है…से शुरू है। कहने वाला साफ नहीं है। यानी आरोप लगाने वाले का तो पता नहीं है पर आरोपी बिलकुल साफ है। इस आरोप की बुनियाद का कोई हवाला नहीं है।

इस खबर के साथ ही एक बड़ी सी तस्वीर लगी है जिसमें बहुत सी महिलाएं दिख रही हैं। सभी के हाथ में डंडे हैं और वे डंडे उठाए हुये हैं।

दैनिक जागरण, सितम्बर, मेरठ

 

शीर्षक – ठाकुर चौबीसी में कायम है तनावपूर्ण शान्ति

विरोध के डर से हटी फोर्स, पहरा दे रही महिलाएं, खेड़ा में सन्नाटा

          भाकियू व भाजपा प्रवक्ता ने पोंछे पीड़ितों के आंसू

          रूक गयी गाँव में दबिश, ग्रामीण ढूंढ रहे ‘विभीषण’

…सरधना की ठाकुर चौबीसी में बुधवार को पुलिस और सुरक्षा बल कम होने शुरू हो गये हैं। पुलिस की दबिश भी कम हुयी है और ग्रामीण थानों में अपना नाम लिखवाने वाले ‘विभीषणों’ को ढूंढ रहे हैं।….

…महिलाएं हाथों में डंडे लिये छतों पर खड़ी हुयी नजर आ रही हैं। उनका कहना है कि पुलिस लाठीचार्ज व फायरिंग से गाँव के करीब 500 लोग घायल हुये हैं।…

दैनिक प्रभात, 28 सितम्बर, मेरठ

 

शीर्षक – एक पक्षीय कार्रवाई बर्दाश्त नहीः हुकुम

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