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मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों ने की एक सुर में सीबीआई जांच की मांग

मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों की जनुसनवाई रोक कर
सपा सरकार ने अपना मुस्लिम विरोधी चेहरा उजागर किया- रिहाई मंच
जनसुनवाई रोके जाने के खिलाफ मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा
पीड़ितों के साथ शहर की अमन पसन्द अवाम ने किया प्रतिरोध मार्च
सरकार द्वारा रोके जाने के बाद मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा
पीड़ितों की जनुसनवाई रिहाई मंच कार्यालय पर हुई
लखनऊ 09 नवंबर 2013। सरकार द्वारा अनुमति न देने के कारण रिहाई मंच द्वारा आय़ोजित मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों की जनसुनवाई निर्धारित स्थल पर न हो सकी जिसे बाद में मंच के कार्यालय पर आयोजित किया गया।

मंच के प्रवक्ता राजीव यादव ने कहा कि मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों की जनसुनवाई को सपा सरकार ने अपना मुस्लिम विरोधी चेहरा उजागर कर दिया है। एक तरफ जहां धारा 144 लगे होने के बावजूद सांप्रदायिक तत्वों को खुली पंचायत करने की इजाजत दी और सांप्रदायिक हिंसा को भड़कने दिया गया। तो वहीं मानवाधिकार नेताओं और बुद्धिजीवियों व धर्मनिरपेक्ष ताकतों की तरफ से आयोजित बंद कमरे की जनसुनवाई को रोका जा रहा है। अगर राजधानी में मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों के पक्ष में आवाज उठाने पर इस तरह की पाबंदी है तो मुजफ्फरनगर में पीड़ितों की क्या स्थिति होगी समझा जा सकता है।

सरकार के इस सांप्रदायिक रवैए के खिलाफ रिहाई मंच के नेतृत्व सैकड़ों की तादाद में आए मुजफ्फरनगर से सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों ने प्रतिरोध मार्च निकाला। सरकार द्वारा रोके जाने के बाद मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों की जनुसनवाई रिहाई मंच कार्यालय पर हुई।

प्रतिरोध मार्च में सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों ने ‘दंगाइयों को बचाने वाली सपा सरकार शर्म करो, हमारी मां-बहनों के साथ बलात्कार करना बंद करो, पीड़ितों को आश्रय देने वाले मदरसों को बदनाम करने वाले शिवपाल यादव मुर्दाबाद, दंगा पीड़ितों को आईएसआई से जोड़ने वाले राहुल गांधी शर्म करो, मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा की सीबीआई जांच कराओ, मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों की आवाज दबाने वाली खुफिया एजेंसियां मुर्दाबाद’ इत्यादि नारे लगाते हुए मार्च में शामिल सैंकड़ों मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों के साथ स्थानीय लोगों ने अपनी एक जुटता दिखाई।

सभा को संबोधित करते हुए कांधला से आए हाजी माजिद, मौलाना सलीम, शामली से आए मौलाना असलम, मौलाना कौशर, अब्दुल कय्यूम, मौलाना शराफत ने कहा कि सरकार राहत शिविर संचालकों को बदनाम करने के लिए तरह-तरह की अफवाहें फैला रही है। जबकि सच्चाई यह है कि हिंसा के बाद पीड़ितों को जो मदद मिली वह स्थानीय लोगों ने अपने सहयोग से कैंप संचालित करके दिया। एक तरफ सरकार दंगाईयों को बचाने में लगी है तो वहीं उनके मददगारों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है जो नाइंसाफी है। खुर्शीद आलम, मौलाना मजहरुल हुदा, नसीम इत्यादि ने भी ने संबोधित किया।

मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पाण्डे, अवामी कांउसिल के महासचिव असद हयात और रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि जिस तरह से मुजफ्फरनगर जाट महापंचायत के दंगाईयों की वीडियो से अखिलेश सरकार डरी है वो दर्शाता है कि सरकार सांप्रदायिक हिंसा के पूरे मामले को सामने नहीं आने देना चाहती है। उन्होंने कहा कि भाजपा नेता हुकुम सिंह, संगीत सिंह सोम, सुरेश राणा, बाबा हरिकिशन, राकेश टिकैत, नरेश टिकैत आदि की मौजूदगी में जिस तरह लाखों की भीड़ ने सांप्रदायिकता की आग लगाई, आखिर उन वीडियो को सपा सरकार द्वारा मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों की जनसुनवाई में दिखाए जाने से रोकना बताता है कि इन दंगाईयों से अखिलेश सरकार के गहरे रिश्ते हैं और इसका प्रमाण यह भी है कि भाजपा विधायक संगीत सिंह सोम ने पिछला लोकसभा चुनाव सपा के टिकट से लड़ा था और आज सोम के ऊपर से अखिलेश सरकार द्वारा लचर पैरवी के माध्यम से रासुका हटाना सांप्रदायिक जाटों की महापंचायतों को एक तोहफा था, कि वो इसी तरह सांप्रदायिकता को हवा दें जिससे मुस्लिम डर की वजह से मुलायम के खेमे में बना रहे। पर मुलायम की यह भूल है।

रिहाई मंच के इलाहाबाद के प्रभारी राघवेन्द्र प्रताप सिंह, आईएनएल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान, आजमगढ़ रिहाई मंच के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी, भागीदारी आंदोलन के पीसी कुरील और भारतीय एकता पार्टी अध्यक्ष सैयद मोइद ने कहा कि खुफिया विभाग वीडियो को लेकर जिस तरह डरा हुआ है वो दर्शाता है कि इस वीडियो में छुपे राजों से सपा के भगवाधारी नेताओं के चेहरे बेनकाब होंगे।

जनसुनवाई में बागपत के काठा से आए हुए मकसूद ने कहा कि उसके भाई चांद की हत्या दिनांक 9 सितंबर 2013 को हुई थी जिसकी लाश ग्राम प्रधान राजेन्द्र और बीडीसी अनिल ने अज्ञात में पंचनामा भरवाकर दफन करवा दी। मकसूद ने कहा कि उसने नामजद करते हुए एफआईआर दर्ज करवाई चश्मदीदों का बयान था कि उन्होंने अभियुक्तों को मृतक के साथ आखिरी बार बात करते हुए घटना स्थल के करीब ही देखा था। राजेन्द्र व अनिल व्यक्तिगत रूप से चांद को अच्छी तरह जानते थे परन्तु फिर भी उन्होंने लाश का पंचनामा अज्ञात में भरवाया व ग्राम चौकीदार सलाउद्दीन को झूठा गवाह बनाया। दरोगा ने भी पंचनामें की झूठी कार्यवाई की। यह सब इसलिए हुआ कि नामजद अभियुक्त अनिल व राजेन्द्र के रिश्तेदार थे। पुलिस द्वारा कुछ अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया तो राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त गन्ना बोर्ड के चेयर मैन वीरेन्द्र सिंह ने बागपत कोतवाली में फोन करके अभियुक्तों को छोड़ने के लिए कहा जिस पर विवेचक ने इंकार कर दिया और वीरेन्द्र सिंह के फोन नंबर को इस टिप्पणी के साथ जीडी में दर्ज करया कि वीरेन्द्र सिंह के फोन नंबर से अभियुक्तों को छोड़ने के लिए धमकी भरे अंदाज में कहा गया, जांच में यह नंबर वीरेन्द्र सिंह का पाया गया। मकसूद के अनुसार जब तक सीबीआई जांच नहीं होगी तब तक उसे न्याय नहीं मिलेगा।

जनसुनवाई में जनपद बागपत के बामनौली से आए जाकिर ने कहा कि उनके गांव में सांप्रदायिक हमले में अख्तरी की हत्या हुई और जाकिर के दो बच्चों में एक के हाथ और दूसरे के पैर को काट दिया गया। जनसुनवाई में बच्चा मौजूद था जिसका हाथ काटा गया था। जाकिर का कहना था कि उसने नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई थी। अभियुक्त गांव के दबंग जाट हैं जो आए दिन पंचायत कर रहे हैं जो अख्तरी के पति सरवर से शपथ पत्र पर जबरन दस्तखत करवा लिया और जाकिर को मजबूर कर रहे हैं कि वह शपथ पत्र लिख दे और मुकदमा वापिस करा दे। इसलिए गांव से जाकिर व उसका परिवार पलायन कर गया है।

 

यही स्थिति ग्राम वाजिदपुर जनपद बागपत से आए मृतक इकाबाल के परिजन कमरुद्दीन ने बयान की। गांव वाजिदपुर की मस्जिद में घुसकर फायरिंग की गई थी, जिसमें इकबाल व शुएब की मौत हो गई थी। इकबाल व शुएब के हत्यारे कमरुद्दीन और दूसरे गवाहों पर दबाव डाल रहे हैं कि वह शपथ पत्र दे दे। जिसके कारण उन्हें पूरे गांव के साथ पलायन करके दिल्ली में रहना पड़ रहा हैै।

नजराना निवासी बागपत ने बताया कि उसके पति खलील की हत्या ग्राम काठा में जाटों ने की थी जिसमें शौकीन्दर आदि की मुख्य भूमिका थी। खलील के भाई सलीम ने कहा कि दिनांक 10 सितंबर 2013 को नजराना अपने पति के साथ ग्राम काठा में थी। ग्राम काठा में शौकीन्दर आदि जाटों ने खलील के साथ झूठा बहाना बनाकर मारपीट शुरु कर दी जिससे घबराकर खलील जमुना नदी की तरफ भागा जहां पत्थरों से कूचकर खलील की हत्या करके उसके शव को जमुना में फेंक दिया गया। खलील की मां बल्लों दिनांक 10 सितंबर 2013 को ही सूचना मिलने पर कोतवाली बागपत गए जहां उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई परन्तु दिनांक 11 सितंबर को पुलिस की मौजूदगी में गोताखोरों ने शव की तलाश की पर शव नहीं मिला मृतक का बनियान रक्त रंजित मिला और पत्थरों पर खून भी मिला तथा बाल भी पाए गए। पुलिस द्वारा फिर भी हत्या की रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। दिनांक 12 सितंबर के समाचार पत्रों में यह सब विवरण प्रकाशित हुआ परन्तु बागपत पुलिस द्वारा मंत्री साहब सिंह के करीबी शौकीन्दर के खिलाफ कोई रिपोर्ट दज न करके दिनांक 13 सितंबर को गुमशुदगी में रिपोर्ट दर्ज की गई। जबकि चश्मदीद गवाहों के बयान रक्त रंजित बनियान और पत्थरों पर खून तथा बालों का पाया जाना साबित करते थे। इसी प्रकार रेशमा कांधला ने बताया कि उसके पति एहसान की हत्या फतेहपुर पूठी के जंगल में तार चोर बताकर कर दी गई। जबकि उसका पति फेरी करने गया था। ग्रामीणों ने रिपोर्ट दर्ज कराई की कुछ तार चोरों को टयूबेल का पाइप काटते हुए घसियारों ने देखा है जिसकी सूचना मिलने पर ग्रामीणों ने दौड़ाकर एक चोर को पकड़ लिया और पीटकर घायल कर दिया जिसकी बाद में मृत्यु हो गई वे घसियारे कौन थे जिन्होंने सूचना दी यह अभी तक रहस्य है। रेशमा ने कहा कि एहसान का नाम पूछकर उसको पीटा गया और उसकी हत्या की गई।

दोघट के इदरीस का कहना था कि उसके भाई इंतजार की हत्या गांव दोघट के पवन ने दी परन्तु इस हत्या को सांप्रदायिक हत्या पुलिस नहीं मान रही है।

ग्राम रन्छाड़ बागपत के रहीसुद्दीन ने कहा कि उसके पुत्र आमिर की हत्या गांव के जाटों ने की और उससे 80 हजार रुपए भी वसूल तथा 18 दिन तक बंधक बनाकर रखा तथा रुपया अदा करने पर ही गांव से जाने दिया गया।

ग्राम सूप के सत्तार का भी कहना था कि मस्जिद पर सांप्रदायिक हमले में सरतार और हामिद घायल हुए परन्तु पुलिस द्वारा इसे मस्जिद पर हमला नहीं माना जा रहा।

मुजफ्फरनगर निवासी पप्पल का कहना था कि उसका भाई 8 सितंबर को बड़ौत से मुजफ्फरनगर जा रहा था परन्तु घर नहीं पहुंचा जिसकी गुमशुदगी के बाबत थाना बुढ़ाना में रिपोर्ट दर्ज है।

ग्राम लिसाढ़, मुजफ्फर नगर से आए रफीक और गुलशेर ने कहा कि गांव में 13 व्यक्तियों की हत्याएं हुई जिनमें केवल 2 की लाशें जनपद बड़ौत के गंगनहर में मिली जबकि बाकी 11 लाशों का अब तक काई अता पता नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि क्या यह दो लाशें स्वयं चलकर वीपरीत दिशा में बड़ौत की गंग नहर में पहुंची थी। बाकी लाशों का क्या हुआ। उन्होंने कहा कि जाटों और पुलिस की मिली भगत से लाशों को ठिकाने लगा दिया गया।

जनसुनवाई में बागपत के सलीम, इदरीश, नवाब, रईसुद्दीन, नूर दीन, दिलशाद, मुजफ्फरनगर के सराफत, फुगाना के नसीम, बहावड़ी के रियासत, मीर हसन, लाक गांव के शहजाद, लिसाढ़ गांव के मुशीर समेत कई लोगों ने समाचार लिखने तक अपनी आप बीती रख चुके थे।

जनसुनवाई की अध्यक्षता मलकपुरा कैंप के संचालन से जुड़े मौलाना कयूम ने किया व संचालन आजमगढ़ रिहाई मंच के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने किया। इस दौरान कमर सीतापुरी, जुबैर जौनपुरी, अतहर शम्शी, जैद अहमद फारुकी, रामकृण, आदियोग, आरिफ, अनिल आजमी, तारिक शफीक, लक्ष्मण प्रसाद, अहमर शफीक इत्यादि मौजूद थे।

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