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मुसलिम हलचल के चार कोण!

अल्पसंख्यक राजनीति में नयी खदबदाहट शुरू हो गयी है! एक तरफ़ हैं संघ, बीजेपी और एनडीए सरकार, दूसरी तरफ़ है मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड, तीसरा कोण है मजलिस इत्तेहादुल मुसलिमीन के असदुद्दीन ओवैसी का और चौथा कोण है मुसलिम महिलाओं की एक संस्था भारतीय मुसलिम महिला आन्दोलन।

सच हुई ध्रुवीकरण की आशंकाएँ
खदबदाहट तो शुरू होगी, इसकी चर्चा तो केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार आने के पहले ही शुरू हो गयी थी। और सरकार आने के कुछ ही दिनों बाद ओवैसी ने महाराष्ट्र की राजनीति में प्रवेश कर साबित कर दिया कि लोगों को जिस तरह के ध्रुवीकरण की आशंकाएँ थीं, उसकी शुरुआत हो चुकी है। ओवैसी अब बिहार में भी ‘सेकुलर’ वोटों के दावेदारों के दम फुला रहे हैं, हालाँकि अभी उन्होंने ख़ुलासा नहीं किया है कि वह बिहार के चुनावों में उतरेंगे भी या नहीं! ओवैसी की सभाओं में भीड़ तो हो रही है और हाल के दिनों में मुसलमानों के बीच उनकी स्वीकार्यता भी काफ़ी बढ़ी है, जो देश के लिए शुभ संकेत क़तई नहीं है।
यह तो हुई राजनीति की बात। इसे अभी एक तरफ़ रखते हैं। फ़िलहाल बात दो सम्मेलनों की जो अगले कुछ महीनों में अल्पसंख्यक या यों कहें कि मुसलिम राजनीति को गरमाने वाले हैं। आमने-सामने हैं बीजेपी व एनडीए सरकार और मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड!
दीन और दस्तूर बचाओ तहरीक
मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ‘दीन और दस्तूर बचाओ तहरीक’ चलाने का एलान किया है। बोर्ड का आरोप है कि केन्द्र में एनडीए सरकार बनने के बाद योग, सूर्य नमस्कार, वैदिक संस्कृति और ऐसी कई अन्य बातों को मुसलमानों पर ज़बर्दस्ती थोपा जा रहा है, जो ब्राह्मणवादी हैं और इसलामी आस्थाओं के विरुद्ध हैं। बोर्ड अगले महीने उत्तर प्रदेश के अमरोहा में मौलानाओं और इमामों का एक बड़ा सम्मेलन बुलाने जा रहा है, जिसमें इमामों से कहा जायेगा कि वह हर हफ़्ते जुमे की नमाज़ के बाद लोगों को ‘इसलामी आस्थाओं पर किये जा रहे इस हमले’ के बारे में सचेत करें और बतायें कि मुसलमान इसका प्रतिरोध किस प्रकार कर सकते हैं। हालाँकि बोर्ड का कहना है कि योग के तीन आसन इसलाम-विरुद्ध हैं, उन्हें छोड़ कर उसे योग से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन फिर भी वह इसे स्कूलों में अनिवार्य किये जाने के विरुद्ध है। बोर्ड का यह भी कहना है कि संघ और एनडीए सरकार स्कूली पाठ्यक्रमों में और इतिहास में मनमाने तरीक़े से छेड़छाड़ कर ब्राह्मणवादी वर्चस्व स्थापित करना चाहती है, जो मुसलमानों के अलावा तमाम दलितों, पिछड़ों व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के हितों के ख़िलाफ़ है, इसलिए बोर्ड उन सबके साथ मिल कर अपना ‘दीन और दस्तूर बचाओ’ आन्दोलन चलायेगा।
इसी सिलसिले में बोर्ड ने इसी हफ़्ते भोपाल में एक जलसा किया था, जिसमें थोड़ी देर के लिए मध्य प्रदेश काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी भी पहुँचे थे। इसके अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं।

एनडीए का सशक्तीकरण समागम
उधर, एनडीए सरकार भी नवम्बर में अल्पसंख्यकों का एक विशाल ‘सशक्तीकरण समागम’ कराने जा रही है। ज़ाहिर है कि बीजेपी अकेले केवल मुसलमानों की बात नहीं करना चाहती, लेकिन अपनी ‘समावेशी छवि’ पेश करना चाहती है। कहा जा रहा है कि यह देश में अल्पसंख़्कों का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे भव्य सम्मेलन होगा और तमाम सेलिब्रिटी चेहरे भी होंगे। इस लेखक को पता है कि इस सम्मेलन की तैयारी महीनों पहले से की जा रही थी। सम्मेलन में सशक्तीकरण और विकास पर ही चर्चा होगी। उधर, प्रधानमंत्री के विश्वस्त ज़फ़र सरेशवाला मुसलमानों के बीच ‘तालीम की ताक़त’ नाम की मुहिम शुरू करने की तैयारी में हैं।

योग काँग्रेस शासित कर्नाटक में भी!
वैसे योग को तो कर्नाटक सरकार ने भी अपने स्कूलों में लागू करने का एलान किया है, जहाँ काँग्रेस की सरकार है। और 2005 में एनसीइआरटी के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम फ़्रेमवर्क में भी योग को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की बात कही गयी थी। तब केन्द्र में यूपीए की सरकार थी। इसलिए उसे संघ के एजेंडे से जोड़ा जाना उचित नहीं, लेकिन जिन आसनों को लेकर आपत्ति है, उन्हें हटा कर आसानी से इस विवाद को सुलझाया जा सकता है। लेकिन दिक़्क़त तब खड़ी होती है, जब सरकारें सूर्य नमस्कार जैसे मुद्दों पर टस से मस होने को तैयार नहीं होतीं।

तीन तलाक़ के ख़ात्मे की माँग
बहरहाल, मुसलिम राजनीति में हलचल भरे दिनों की आहट साफ़ नज़र आ रही है। और इस हलचल में जो चौथा कोण है, वह भारतीय मुसलिम महिला आन्दोलन का है, जिसने माँग की है कि मुसलमानों में बहुविवाह और तीन तलाक़ की मौखिक परम्परा ख़त्म की जाये। संस्था का कहना है कि उसने पिछले चार बरसों में क़रीब पचास हज़ार से ज़्यादा मुसलिम महिलाओं से बात की और उनमें से 92 फ़ीसदी मौखिक तलाक़ के विरुद्ध हैं। ऐसी तलाक़ तो आजकल इमेल, स्काइप या एसएमएस पर होने लगी है। संस्था की ओर से ज़किया सोमान और नूरजहाँ सफ़िया नियाज़ ने क़ुरान-आधारित मुसलिम पारिवारिक क़ानूनों का मसौदा भी तैयार किया है और उनकी सरकार से माँग है कि मुसलमानों के पारिवारिक मामलों के लिए कु़रान-आधारित स्पष्ट और लिखित क़ानून बनाये जायें, ताकि उसकी मनमानी व्याख्या न की जा सके। बहुत-से मुसलिम देशों में ऐसे ही क़ानून हैं तो यहाँ इस पर विचार क्यों नहीं होता? भारतीय मुसलिम महिला आन्दोलन का आरोप है कि मुसलिम पर्सनल बोर्ड ने मुसलिम महिलाओं की दयनीय हालत और मुसलिम पारिवारिक क़ानूनों के व्यापक दुरुपयोग पर न कभी कोई ध्यान दिया और न ही किसी सुधारवादी सुझावों पर कभी विचार किया।
लेकिन शायद इस बार कुछ बदलाव दिखे। बोर्ड के सूत्रों की तरफ़ से संकेत मिल रहे हैं कि शायद अमरोहा सम्मेलन में तीन तलाक़ को हतोत्साहित करने के उपायों पर विचार किया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो शायद पहली बार मुसलिम पर्सनल लाॅ बोर्ड कोई अच्छा सुधारात्मक क़दम उठायेगा। लेकिन संघ के एजेंडे के ख़िलाफ़ बोर्ड ने जिस तरह का आन्दोलन छेड़ने की घोषणा की है, उससे ध्रुवीकरण और तेज़ ही होगा और इससे संघ के ही मंसूबे पूरे होंगे। यक़ीनन यह अच्छा संकेत नहीं है।
क़मर वहीद नक़वी
साभार- http://raagdesh.com
 

About the author

क़मर वहीद नक़वी। वरिष्ठ पत्रकार व हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता के जनक में से एक हैं। हिंदी को गढ़ने में अखबारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सही अर्थों में कहा जाए तो आधुनिक हिंदी को अखबारों ने ही गढ़ा (यह दीगर बात है कि वही अखबार अब हिंदी की चिंदियां बिखेर रहे हैं), और यह भी उतना ही सत्य है कि हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता को भाषा की तमीज़ सिखाने का काम क़मर वहीद नक़वी ने किया है। उनका दिया गया वाक्य – यह थीं खबरें आज तक इंतजार कीजिए कल तक – निजी टीवी पत्रकारिता का सर्वाधिक पसंदीदा नारा रहा। रविवार, चौथी दुनिया, नवभारत टाइम्स और आज तक जैसे संस्थानों में शीर्ष पदों पर रहे नक़वी साहब इंडिया टीवी में भी संपादकीय निदेशक रहे हैं

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