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‘मृत्युगढ़ में तब्दील होता छत्तीसगढ़’, मुआवजा मुनाफे पर कोई चोट नहीं पहुंचाता

 छत्तीसगढ़ एक बार फिर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है। इस बार भी कारण वही है– बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं। पिछले दो सालों से यह कभी ‘आंखफोड़वा कांड’ के कारण सुर्खियों में रहा है, तो कभी ‘गर्भाशय कांड’ के कारण। वर्ष 2011-12 में कवर्धा, बालोद, दुर्ग और बागबहरा के नेत्र शिविरों में एक के बाद एक भयावह ‘आंखफोड़वा कांड’ उजागर हुए। भयावह इसलिए कि इन शिविरों में जिन लोगों को लाया गया था, उनमें से अधिकांश संक्रमण का शिकार हुए और 88 लोगों की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई तथा 6 लोग मारे गए। कारण– संक्रमित औजार और ऑपरेशन थियेटर तथा घटिया या नकली दवाइयां। इसी बीच गर्भाशय कांड भी सामने आया और सरकारी दावों के विपरीत छत्तीसगढ़ में कार्यरत जन स्वास्थ्य अभियान का दावा है कि कम से कम 7000 महिलाओं के गर्भ निकाल लिए गए। कारण– निजी चिकित्सकों और अस्पतालों को स्मार्ट कार्ड योजना में सेंध लगाकर मुनाफा कमाने का लालच। इन्हीं दो सालों में डेंगू और मलेरिया से राज्य में 47 लोगों के मरने के सरकारी आंकड़े हैं। पीलिया से भी 81 मौतें हुई हैं, जिनमें से 67 लोग राजधानी रायपुर में ही मरे हैं और इनमें से आधी गर्भवती महिलाएं ही थीं।
और अब नसबंदी कांड । कारण फिर वही– संक्रमित औजार और ऑपरेषन थियेटर तथा नकली दवाइयां। राज्य के शिविरों में 18 जानें ही नहीं गई हैं, कई मासूम अनाथ हो गये और कई परिवार तबाह। इस दवाई के बदले 6 लाख मुआवजे की घोषणा कर भाजपा सरकार ने अपने कर्तव्य की ‘इतिश्री’ कर ली है। दिखावे के लिए एक न्यायिक जांच की घोशणा भी हो गई, लेकिन इस जांच का जिम्मा भी हाईकोर्ट के किसी वर्तमान या निर्वतमान जज को देने की हिम्मत सरकार ने नहीं दिखाई। कुछ डॉक्टर बर्खास्त और कुछ निलंबित हैं। और स्वास्थ्य सेवा संचालक को पदोन्नति भी दी गई है!!
इस स्वास्थ्य संचालक की ‘कीर्ति’ भी किसी से छिपी नहीं है। यह वह स्वास्थ्य संचालक है, जिसके कार्यकाल में टेंडर में गड़बड़ी करके और कोर्ट को गुमराह करके हिसार, हरियाणा की दवा निर्माता कंपनी रिगेन लेबोरेटरीज से करोड़ों की दवा खरीदी गई और बाद में जांच में यह पाया गया कि प्रसूति के समय महिलाओं को दिये जाने वाले इंजेक्षन ऑक्सीटॉक्सीन में दवाई नहीं, बल्कि डिस्टिल्ड वाटर भरा हुआ था। इस कंपनी पर प्रतिबंध लगाने के बजाय फिर इस ‘यशस्वी’ संचालक ने इसी कंपनी से लिग्नोकेन नामक इंजेक्शन खरीदा है, जिसका उपयोग पेंडारी के नसबंदी शिविर में महिलाओं पर किया गया था।
लेकिन नसबंदी के बाद महिलाओं को खाने के लिए जो सिप्रोसीन नामक दवा दी गई, उसमें तो चूहामार दवाई जिंक फास्फेट ही मिला हुआ था, जो सीधे किडनी और आंतों को ही नुकसान पहुंचाता है। इस बात का खुलासा स्वास्थ्य विभाग के सचिव डॉ. आलोक शुक्ला ने खुद एक प्रेसवार्ता में किया है। यह ‘जहर’ महावर फार्मा बनाती थी, जिसका कारखाना तमाम नियम-कायदों को धता बताकर राजधानी रायपुर के ही पॉश एरिया में लगा हुआ है। जहर बेचने वाले इस कारखाने को ‘गुड मेन्युफेक्चरिंग सर्टिफिकेट’ जारी किया गया है!! साफ है कि सरकारी संरक्षण में संचालक की मेहरबानी के बिना यह संभव ही नहीं था। इसी से यह भी साफ हो जाना चाहिए कि उन्हें ससम्मान पदोन्नति क्यों दी गई?
इस सरकार को जवाब देना चाहिए कि पिछले दो सालों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में गड़बड़ी के कारण जो 150 मौतें हुई हैं, उसका जिम्मा लेने से वह कैसे इंकार कर सकती है?
तो छत्तीसगढ़ ‘मृत्युगढ़’ में तब्दील होता जा रहा है, तो संघ संचालित भाजपा सरकार की नीतियों को उसमें अच्छा-खासा योगदान है। और कुछ हो या न हो, मृत्यु दर के मामले में छत्तीसगढ़ का देश में तीसरा स्थान है। मृत्यु दर का राष्ट्रीय औसत आंकड़ा जहां 7 है, वहीं छत्तीसगढ़ में 8 है। थोड़ा और गहराई में जायें, तो पता चलेगा कि राष्ट्रीय औसत की तुलना में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में मृत्यु दर 12 प्रतिशत अधिक है, तो महिलाओं में 19 प्रतिशत और बच्चों में 15 प्रतिशत अधिक। स्पष्ट है कि सरकारी नीतियों की मार ग्रामीणों पर, महिलाओं और बच्चों पर ही अधिक पड़ रही है और इसमें भी उन तबकों पर जो सामाजिक-आर्थिक रुप से वंचित हैं–
यानि समग्र रूप से गरीबों पर और विशेष रूप से दलितों और आदिवासियों पर ही।
और यह सरकारी नीतियां क्या हैं, जो छत्तीसगढ़ को ‘मृत्युगढ़’ बनाती जा रही हैं? यह नीतियां हैं स्वास्थ्य सेवाओं को सार्वजनिक क्षेत्र से निकालकर निजीकरण के दायरे में धकेलने की, आम जनता को चिकित्सा-बाजार कीलूट और मुनाफे के सामने विकल्पहीन छोड़ने की और विकल्पहीनता के नाम पर निजी चिकित्सा बाजार को वैध जामा पहनाने की। सभी समझते हैं कि निजीकरण लूट पर आधारित अधिकतर मुनाफा कमाने की व्यवस्था का ही नाम है।
छत्तीसगढ़ जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में 56 लाख परिवार रहते हैं। पिछले 6 सालों में 8.82 लाख लोगों की नसबंदी का लक्ष्य रखा गया है। क्या यह लक्ष्य ‘अमानवीयता’ की हद को छूता नहीं लगता कि इस प्रदेश के छठे हिस्से का बधियाकरण करने की मुहिम चलाई गई है? वर्ष 2009-10 से 2013-14 के दौरान 4,35,631 लोगों की नसबंदी की गई, जो कि कुल लक्ष्य का लगभग आधा है। लेकिन फिर भी नसबंदी के आंकड़े राष्ट्रीय स्तर की तुलना में बहुत ज्यादा हैं। इसके बावजूद वर्ष 2014-15 के लिए 1.70 लाख नसबंदियों का लक्ष्य रखा गया है और नवम्बर तक 54000 से अधिक नसबंदियां भी की जा चुकी हैं। अब अगले 4 माह में 1,16000 नसबंदियां की जानी हैं– यानि आधे समय में दुगुना से ज्यादा काम। तो डॉक्टर इंसानों के साथ जानवरों जैसा- ट्रीटमेंट नहीं, तो और क्या करेगा? यही बिलासपुर के जिला सर्जन डॉ. आर.के. गुप्ता ने किया है– पेंडारी के शिविर (बंद अस्पताल के बंद ऑपरेषन थियेटर) में ढाई मिनट में एक नसबंदी ! इतनी तेजी से तो दुकानों में मुर्गे भी नहीं कटते होंगे!! लेकिन डॉ. गुप्ता की इसी रफ्तार पर तो रीझकर भाजपा सरकार ने उन्हें इसी वर्ष ‘राष्ट्रपति अवार्ड’ से सम्मानित किया था!!! इस अवार्ड के लिए उन्होंने कितने लोगों की बलि चढ़ाई होगी यह तो फिलहाल रहस्य ही है। फिर जनसंख्या नियोजन के महान काम में कैसे औजार हैं, कैसा ऑपरेषन थियेटर है, कौन सी दवाई है, इन छोटी-मोटी बातों को जानने-समझने की फुरसत किसे हो सकती है? लक्ष्य है जनसंख्या नियोजन का- जो हो तो रहा है: ऐसे भी और वैसे भी!! इस लक्ष्य पूर्ति का सबसे आसान निशाना ग्रामीण जनता और महिलायें ही होती हैं, जिन्हें डरा-धमका-ललचा कर, भेड़-बकरियों की तरह हांककर सरकारी शिविरों तक लाया जा सकता है।
  इन शिविरों में प्रशासन को यह भी देखने की फुरसत नहीं होती कि जिन ग्रामीणों को लाया गया है, उनकी शारीरिक स्थिति क्या है या वे किस समुदाय के हैं? उन्हें तो संरक्षित जनजाति बैगा का नसबंदी आपरेशन करने से भी हिचक नहीं है। छत्तीसगढ़ में रहने वाले इन बैगा आदिवासियों को मध्यप्रदेश का प्रशासन भी आकर उठा ले जाता है- अपनी नसबंदी का लक्ष्य पूरा करने के लिए। यह बैगा आदिवासी प्रशासनिक टारगेट का आसान निशाना बन गये हैं।
और मौत का यह खेल क्यों खेला जा रहा है? केवल इसलिए कि प्रदेश के कम से कम 1500 करोड़ रुपयों के चिकित्सा-बाजार में नेता से लेकर ठेकेदार तक और डॉक्टर से लेकर दलाल तक अपने-अपने हिस्से की ज्यादा से ज्यादा लूट कर सकें। बाकी जनता जाये भाड़ में! छत्तीसगढ़ में 3600 करोड़ रुपयों से
ज्यादा का दवाईयों का कारोबार है, जिसका 40 प्रतिषत से ज्यादा ‘अवैध’ श्रेणी का है। नशीली दवाईयों, नकली दवाईयों और जहर की भी इस बाजार में कमी नहीं हैं। वर्ष 2012-13 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन ने राज्य सरकार को 1006 करोड़ रुपयों से अधिक आबंटित किए थे। पिछले 8 सालों में मिशन ने वास्तव में 3325 करोड़ रुपये आबंटित किए हैं। यह अलग बात है कि राज्य सरकार इसमें से केवल 2015 करोड़ (61प्रतिषत) ही खर्च कर पाई।
प्रदेश का स्वास्थ्य बजट भी लगभग 1500 करोड़ रुपयों का है। प्रदेश के केवल आधे परिवारों का ही सरकारी बीमा योजना तक पहुंच हो, तब भी यह लगभग 9000 करोड़ रुपयों का खेल है। फिर इस खेल में महिलाओं के गर्भ निकालकर ही मुनाफा कमाया जाये, तो इसमें अनैतिक क्या है?
अनैतिक तो तब भी नहीं था, जब भाजपा सरकार ने सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल और निजी नर्सिंग होम शुरु करने के लिए एक रुपये की टोकन कीमत पर शहरी क्षेत्रों में 2 एकड़ तथा ग्रामीण क्षेत्रों में 5 एकड़ देने के लिए नीति बनाई है, जबकि सरकार की ही रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों में 1516, स्टाफ नर्स के 1780, एएनएम के 398, फार्मासिस्ट के 450 पद खाली हैं। प्रदेश के 350 अस्पताल चिकित्सक विहीन हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 100 से ज्यादा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 29 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तथा 38 प्रतिशत उप स्वास्थ्य केन्द्र या तो भवनविहीन हैं या तो किराये में चल रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में जांच की सुविधायें नहीं हैं और यदि हैं तो चिकित्सा उपकरण ‘सुनियोजित’ तरीके से बिगड़े पड़े हैं। दवायें हैं नहीं, और हैं तो घटिया, जिसका शरीर पर कोई असर नहीं होता। सरकारी डॉक्टरों का ज्यादा ध्यान अपने निजी अस्पतालों पर ही होता है। इस तरह सरकार की कार्पोरेटी नीतियां ही बीमारों को बाजार में धकेल रही हैं और गरीब आदमी के लिए नीम-हकीम ही भगवान हैं। सरकारी व्यवस्था तो उसके लिए ‘यमराज’ बन गई है।
लेकिन यदि सरकारी पैसों के बल पर निजी क्षेत्र को विकसित किया जाएगा,
तो पूरे छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था को चौपट तो होना ही है। नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ होता रहेगा और खिलवाड़ करने वालों को बचाया भी जाता रहेगा। आंखफोड़वा कांड और गर्भाशय कांड में किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। जहरीली दवाओं और घटिया उपकरणों की बिक्री-खरीदी करने वाले खुलेआम घूम रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो भी जाए दिखावे के लिए, तो चुपचाप वापस ले ली जाती हैं। नसबंदी कांड के सुबूत तेजी से मिटाये जा रहे हैं और जांच में न डॉक्टर जिम्मेदार पाये जायेंगे और न नकली दवा बनाने-खरीदने वाले। फिर कोई कांड होगा और हल्ला होगा, तो मुआवजा थमा दिया जाएगा, क्योंकि यह मुआवजा मुनाफे पर कोई चोट नहीं पहुंचाता। मुनाफे की कीमत पर मुआवजे का नुकसान सहा जा सकता है। यह मुआवजा भी मुनाफाखोरों की जेब से नहीं जाना है, सरकारी तिजोरी और जनता की जेब से ही जाना है।
और जब जनता की ही जेब से जाना है, तो फिर भेदभाव क्यों? पिछले दो सालों में सरकारी की नीतियों से मरे उन 130 लोगों ने क्या कुसूर किया था, जो 6 लाख के मुआवजे से वंचित रह गये? क्या सरकार मरे हुए लोगों के भूतों की तरह नाचने पर ही मानेगी?
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य के क्षेत्र में हुए इन बदनाम कांडों का एक और पहलू सरकारी नीतियों से जुड़ता है- और वह है उद्योग व श्रम विभाग की भूमिका। सिप्रोसीन बनाने वाली करोड़ों रुपयों के टर्न ओवर वाली महावर फार्मा केवल एक फार्मासिस्ट व 3-4 मजदूरों के भरोसे ही चल रही है- अब इसे ‘कुटीर उद्योग’ ही कहा जा सकता है! उद्योग विभाग और श्रम विभाग के इंस्ट्रेक्टरों को हर महीने फैक्टरियों की जांच करनी होती है, ड्रग इंस्पेक्टरों को दुकानों व अस्पतालों की दवाईयों की गुणवत्ता की जांच करनी होती है, लेकिन किसी ने भी अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की। केन्द्र की मोदी सरकार बड़े पैमाने पर श्रम कानूनों में जो परिवर्तन कर रही है, उसमें कथित इंस्पेक्टर राज का खात्मा भी शामिल है। इन श्रम कानूनों का सम्बन्ध केवल कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के वेतन-भत्तों और उनकी समस्याओं से ही नहीं है, बल्कि जनता के जीवन से भी किस प्रकार जुड़ा है, नसबंदी कांड इसका उदाहरण है। जब निरीक्षण का कोई डर ही नहीं रहेगा, तो जीवन रक्षक दवाईयों के नाम पर चूहामार पाउडर बेचने वाली कंपनियों व कारखानों की तो बन ही आएगी। आम जनता का जीवन भले ही खतरे में पड़ जाये।
स्वास्थ्य के मामले में हो रही सरकारी हत्याओं की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ यदि मंत्री की बनती है, तो इस नैतिकता का निर्वाह बिना इस्तीफा कैसे हो सकता है? क्या लोकतंत्र में ‘पिशाच-नृत्य’ की इजाजत है, जो रमन सरकार इस प्रदेश में दिखा रही है? शायद श्यामाप्रसाद मुखर्जी का एकात्म मानववाद, मोहन भागवत का हिन्दुत्व और मोदी की राजनीति छत्तीसगढ़ सरकार को यही रास्ता दिखा रही हो!!
O- संजय पराते

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संजय पराते, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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