मेवात का तावड़ू- क्या ये भारत माता की बेटी नहीं?

मेवात का तावड़ू- क्या ये भारत माता की बेटी नहीं?
इंसाफ़ की आवाज़ के लिए भी दोहरा रवैया क्यों?
मेहदी हसन ऐनी
आप को याद होगा
निर्भया से अरुणा शानबाग तक।
रोहित वेमुला से ऊना तक, अन्ना से कन्हय्या तक।
मांझी से सलामनी तक…
जब भी इंसाफ़ व न्याय के लिए गुहार लगाई गई, मज़लूम समाज को उस का हक़ दिलाने के लिए आंदोलन किया गया, संघर्ष किया गया, तो सम्पूर्ण भारत का मुसलमान देशवासियों के साथ पहली कतार में नज़र आया है।
फिर अगर पुलिसिया तांडव का शिकार होना पड़ा या प्रशासन का दबाव झेलना पड़ा हर मौक़े पर मुसलमानों ने अपना सीना पेश किया और समाज को इंसाफ़ दिलाने के लिए अपनी पूरी भूमिका निभाई।

लेकिन बात जब कश्मीर की निलोफ़र, दादरी के अख़लाक़,
झारखंड के नोमान, या कश्मीर के शब्बीर और  फिर तावड़ू हरियाणा के ज़हीरुद्दीन की रेप पीड़िता फैमिली पर हुये ज़ुल्म की हो, तो बड़े अफ़सोस के साथ ये कहना पड़ता है कि इंसाफ, सामाजिक न्याय, इंसानियत और सेक्यूलरिज़्म व अनेकता में एकता जैसे विचार सब किताबों में या संविधान के पन्नों में नज़र आते हैं। ज़मीन पर तो सिर्फ़ कुछ सरफिरे मुस्लिम युवक आवाज़ उठाते नज़र आते हैं।
जब दिल्ली में निर्भया रेप केस हुआ था, तो मुझे याद है कि करोड़ों की तादाद में धर्म से ऊपर उठ कर सभी ने मिल कर आवाज़ उठायी थी। धरने दिये थे। उसे इंसाफ़ दिलाने के लिए संघर्ष किया था। रातों रातों जग कर, भूखे रह कर इंसाफ़ की जंग लड़ी थी और यूं निर्भया देश की बेटी कहलाई। उसे इंसाफ़ मिला, लेकिन 24 अगस्त की रात को मेवात में तावडू कस्बे के पास डिंगरहेड़ी गाँव के एक परिवार को जो खेत में ढाणी बना कर रहता था जो गुजरी उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

दरिंदगी की सारी हदों को लांघ कर जिस प्रकार दो कत्ल किये गए,
तीन जनों को गम्भीर रूप से घायल किया गया, दो लड़कियों से जिनमें एक नाबालिग थी, के साथ घंटों तक सामूहिक दुष्कर्म किया गया, एक छोटे बच्चे को उल्टा लटका कर उसकी गर्दन से हथियार सटा कर लड़कियों को चुपचाप हर प्रकार के वहशीपन को बर्दाश्त करने को मज़बूर किया गया, ये  हैवानियत की कल्पना से भी परे था।
यकीनी तौर पर ये घटना अब तक की सबसे दुख भरी घटना थी।
इस से सभ्यता और संस्कृति का जनाज़ा उठ गया है।
पर सवाल ये है कि इस पर शासन, प्रशासन, नेता, जनता,और मीडिया में से किस ने कितनी आवाज़ उठाई?

किसने कैंडल मार्च निकाला?
किसने जन्तर मन्तर पर धरने दिये?
किसने तावड़ू का दौरा कर मर-मर कर जी रहे जहीरुद्दीन के घराने को सांत्वना दी?
हैरत की बात है कि मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए ये अभी तक मुद्दा नहीं बना है, जबकि हज़ारों व्यथित और आक्रोशित लोग कल घटनास्थल पर हुई पंचायत में शामिल हुए और और राजनैतिक पार्टियों के नुमाइंदे भी उसमें शामिल थे।

पुलिस ने अभी तक गिरफ़्तार चारों दोषियों पर कोई बड़ी कार्रवाई भी नहीं की है।
फास्ट ट्रेक कोर्ट का भी गठन नहीं किया गया है।
आठ दिन बीत जाने के बाद पुलिस ने अभी तक ये भी खुलासा नहीं किया कि इन चारों का किस नेता से कनेक्शन था? बी.जे.पी सांसद राव इंद्रजीत सिंह का इन से क्या ताल्लुक़ था?
जबकि गौरक्षा के नाम पर ये गुंडे पहले भी उस क्षेत्र में तांडव मचा चुके थे, जिस में शह देने वाले यही महाशय थे।
प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, चीफ़ जस्टिस, मुख्य मंत्री हरियाणा ने अभी तक ना तो तावड़ू के पीड़ितों के लिए दो शब्द कहे हैं और ना ही किसी ने उन से मिलने की सोची है।
जबकि ये प्रधान सेवक अपने कपड़ों के रंग तक को बताने के लिए ट्वीट किया करते हैं।
महिला आयोग, ह्यूमन राइट्स वगैरह की तो बात ही क्या करें, ये तो हॉट ईश्यूज़ पर ही हाथ रखते हैं।

तो क्या ये समझ लेना चाहिए कि एकता व अखंडता, सेक्यूलरिज़्म और इंसाफ़ व हक़ के ठेकेदार सिर्फ़ मुसलमान ही हैं?
बाकी मुसलमानों को देश वासियों से कोई उम्मीद या कल्पना नहीं करनी चाहिए, बल्कि अकेले देश भर के मज़लूमों के लिए इंसाफ़ की लड़ाई का जिम्मा सिर्फ़ मुस्लिम समाज का ही है?
अगर ऐसा ही है तो ये दोहरा रवैया किस की देन है?
इस घटना का साक्षी तावड़ू की ज़मीन 125 करोड़ देश वासियों से यही कह रही है कि
ओ धरती माँ के पुजारियो! मुझ को मानवता के दुश्मनों ने खून की होली खेल कर इंसानियत की हत्या करके रंगीन कर दिया है, पर तुम खामोश क्यों हो?
ये बेहिसी कैसी है??
क्या सिर्फ़ नारे लगा कर ही धरती की रक्षा की जाती है या कुछ और जिम्मेदारियां बनती हैं, देशभक्ति और मादरे वतन के लिये.