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मैं भी देशद्रोही हूँ

महेश राठी

देशद्रोह,
नया तमगा है
उस आवाज़ का
जो चीख पड़ती है,
बरबस ही
सोते मासूमो के
क़त्ल पर !

जंगलो ,
पहाड़ो पर
दौड़ती ,
हांफती ,
उस जिन्दगी का
जो भागती नहीं
जीतना  चाहती है
मौत की लम्बी होती
परछाई से !

देशद्रोह,
अब रोज़ वसूली जाने वाली
सरकारी फीस है,
हर रोज उगते सूरज के साथ
फैलती नयी पराजय को
दुत्कारने के साहस की !

थकी,
हारी ,
उघडी साँसों
छीले बदन पर
उबलकर,
दह्ड़ना !
देशद्रोह है , गर
मैं भी देशद्रोही हूँ !

लकीर पर चलते जाना
कैद ” आज़ादी ” पर इतराना
कुछ ना कहना खावाहिशों पर
खामोश रहना और फिर पछताना
इतनी लाचार,
देशभक्ति से बेहतर
मैं भी देशद्रोही हूँ !

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