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मोदी के दो साल- आपातकाल से बड़ी चुनौती

बीते दो साल में जनतंत्र का हुलिया कैसे बदला ?
पवित्र किताब की छाया में आकार लेता जनतंत्र

भारतीय लोकतंत्र: दशा और दिशा को लेकर चन्द बातें
 सुभाष गाताडे
2014 में जनाब मोदी के सत्तारोहण के बाद गुजरात का पलीटाना सुर्खियों में था, जहां जैन लोगों के कई मंदिर हैं। जैन समुदाय के लोगों ने अपने धर्मगुरूओं की अगुआई में भूख हड़ताल इस बात के लिए की कि पलीटाना को ‘पवित्र क्षेत्र’ घोषित किया जाए तथा वहां से अंडा, मांस, मछली की बिक्री या सेवन को समाप्त किया जाए।

हालांकि पलीटाना में जैन लोगों की आबादी अधिक नहीं है तथा शेष समुदायों का बहुलांश मांसाहारी रहा है, सरकार ने आननफानन में जैन लोगों की मांग मान ली और न केवल लोगों के आहार के अधिकार पर, बल्कि ऐसे हजारों लोगों के जीवनयापन पर हमला बोल दिया, जो किसी न किसी रूप में उस धंधे में लिप्त थे।
और पलीटाना कोई अपवाद नहीं है।
ऐसे तमाम नगर, शहर आज देश में मौजूद हैं जिन्हें समुदायविशेष की भावनाओं को मददेनज़र रखते हुए ‘पवित्र क्षेत्र’ घोषित किया गया है। एक बहुधर्मीय मुल्क में – जहां नास्तिकों, निरीश्वरवादियों की तादाद कम नहीं है – ऐसे फैसले किस तरह के भारत को गढ़ेगे इस बात का महज अन्दाज़ा लगाया जा सकता है।

अख़बारों की यह कतरनें आखिर क्या बताती हैं ? दरअसल आज हम इस सम्भावना से रूबरू हैं कि जनतंत्र के रास्ते किस तरह बहुसंख्यकवाद का शासन कायम हो सकता है। दो साल पहले सम्पन्न चुनाव इस बात की एक झलक दिखलाते हैं कि ‘हम’ और ‘वे’ की यह गोलबन्दी किस मुक़ाम तक पहुंच सकती है।
जनतंत्र के रास्ते किस तरह बहुसंख्यकवाद का शासन कायम हो सकता है
निचोड़ के रूप में कहें कि अगर आप के विश्वदृष्टिकोण में ‘अन्य’ कहे गये समुदायों, समूहों के लिए कोई जगह नहीं भी हो, आप उन्हें सारतः दोयम दर्जे के नागरिक बनाना चाहते हों, तो भी कोई बात नहीं, आप ‘हम’ कहे जा सकनेवाले समुदाय को गोलबन्द करके सिंहासन पर बिल्कुल जनतांत्रिक रास्ते से आरूढ हो सकते हैं।

आज से ठीक 66 साल पहले देश को संविधान सौंपते वक्त जिस किस्म के भारत के निर्माण का तसव्वुर किया गया था, जिसकी कल्पना की गयी थी, उससे बिल्कुल अलहदा पसमंज़र फिलवक्त़ हमारे सामने है।

आप सभी जानते ही हैं कि यह एक ऐसी संसद है जहां सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का सबसे कम प्रतिनिधित्व दिखता है। और पहली दफा एक ऐसी पार्टी हुकूमत में आयी है, जिसके 272 सांसदों में से महज दो सदस्य अल्पसंख्यक समुदायों से हैं, और जोर देने वाली बात यह है कि देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का एकभी सदस्य उसमें नहीं है।
निश्चित ही यह महज खास समुदाय विशेषों की उपस्थिति या कम उपस्थिति या अनुपस्थिति से जुड़ा मामला नहीं है।
यह विभिन्न रूपों में प्रतिबिम्बित हो रहा है।

पहले आप सत्य को उद्घाटित करने के लिए लिखते थे, आप तथ्यों को जुटाते थे और सत्यान्वेषण करते थे, इस बात की फिक्र किए बिना कि इसकी वजह से किस संगठन, किस समुदाय की ‘भावनाएं आहत होंगी।’ और अब ‘आहत भावनाओं का खेल’ इस मुकाम पर पहुंच गया है कि कई चर्चित किताबें लुगदी बनाने के लिए भेज दी गयी हैं और कई अन्य को लेकर उसी किस्म का खतरा मंडरा रहा है।

मिसाल के तौर पर ‘द हूट’ नामक वेबसाइट http://www.thehoot.org/research/special-reports/free-speech-a-dire-three-months-9272/ द्वारा किए गए अध्ययन में यह बात आंकड़ों के जरिए स्पष्ट की गयी है कि किस तरह मौजूदा वर्ष अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए ख़राब वर्ष कहा जा सकता है।

अध्ययन के मुताबिक साल के शुरूआती तीन महिनों में ही 19 लोगों पर राजद्रोह के 11 मामले दर्ज किए गए, जबकि विगत दो वर्षों में इसी कालखंड में ऐसा एकभी केस दर्ज नहीं हुआ था। डिफेमेशन अर्थात बदनामी के नाम पर भी दर्ज मामलों में छलांग दर्ज की गयी जहां इन तीन महिनों में 27 केस दर्ज हुए तो विगत साल महज 2 केस दर्ज हुए थे।

तुलनात्मक टेबिल

मामले                    वर्ष     2014  2015  2016

देशद्रोह                           0          0          11 मामले, 19 लोग

बदनामी/डिफेमेशन          4          2          27

मौतें                               0       1      1

हमले                             5       5      1 5

सेन्सरशिप                        16       2          17

धमकियां                          5          1          7
2016 में सेन्सरशिप की घटनाओं में भी उछाल
जैसा कि उपर के टेबिल से स्पष्ट है कि 2016 में सेन्सरशिप की घटनाओं में भी उछाल देखा गया जबकि वर्ष 2015 के पहली तिमाही में महज दो केस हुए थे जबकि 2016 की प्रथम तिमाही में 17 मामले दर्ज किए गए।

इनमें सबसे विवादास्पद था कामेडियन किकू शारदा को एक आध्यात्मिक डेरे के मुखिया की नकल करने के लिए गिरफतार किया जाना। …और उर्दू लेखकों को नेशनल कौन्सिल फार प्रमोशन आफ उर्दू लैग्वेज की तरफ से दिया गया यह निर्देश कि अगर वह अपने प्रकाशन के लिए सरकारी सहायता चाहते हैं तो उन्हें यह अंडरटेकिंग लिख कर देना होगा कि उनकी रचना में राष्ट्रविरोधी कुछ भी नहीं है। भारतीय भाषाओं में से किसी के लिए पहली दफा ऐसी शर्त रखी गयी थी।
जनतंत्र के आवरण में बहुसंख्यकवाद की दस्तक
अगर हम बेहद ठंडे दिमाग से देखने की कोशिश करें तो आप यहभी महसूस कर सकते हैं कि जनतंत्र के लिए जिस चैलेंज की हम बात कर रहे हैं, वह एक तरह से आपातकाल द्वारा उपस्थित चुनौती से भी कई गुना बड़ा है।

आपातकाल, जब मोहतरमा इंदिरा गांधी ने जनान्दोलनों से आतंकित होकर ‘आन्तरिक सुरक्षा का हवाला देते हुए’ नागरिक आज़ादियों को, जनतांत्रिक अधिकारों को सीमित किया था, हजारों लोगों को जेल में ठूंसा था, तब कमसे कम यह दिख रहा था कि किस किस्म के अधिनायकवादी कदमों से हम रूबरू हैं, मगर आज ऐसे कोई प्रत्यक्ष अधिनायकवादी कदम नहीं हैं, मगर जनतंत्र के आवरण में बहुसंख्यकवाद की यह ऐसी दस्तक है जिसे लोकप्रिय समर्थन हासिल है।

……. जारी……..

(डॉ. ओमप्रकाश ग्रेवाल स्मृति व्याख्यान में प्रस्तुत मसविदा, 26 जून 2016, कुरूक्षेत्र)

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