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मोदी के विकास का झुनझुना !

शैलेन्द्र चौहान
12 सितंबर 2003 को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने, गुजरात नरसंहार के बहुत डरावने भूत से मोदी और संघ का रास्ता आसान कर दिया। इसे मोदी की बेगुनाही के तौर पर प्रचारित किया जाने लगा और मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का आधा रास्ता, भाजपा और संघ द्वारा साफ मान लिया। बाकी का आधा रास्ता साफ करने के लिये सामाजिक सद्भावना हेतु मोदी ने तीन दिन के उपवास की घोषणा करके किया हुआ मान लिया। गुजरात नरसंहार के लिये जिम्मेदार महाशय अब सामाजिक सद्भावना के लिये उपवास करते दिखते हैं। नरेंद्र मोदी को गले लगाने के लिये लालायित पूंजीपति वर्ग को यह पर्याप्त बहाना प्रदान कर देता है। याद कीजिये वर्ष  2009 में संपन्न ‘वाइब्रेंट गुजरात’ सम्मेलन में, प्रधानमंत्री पद हेतु, भारत के दो बड़े उद्योगपतियों अनिल अंबानी और सुनील मित्तल ने खुले तौर पर मोदी का समर्थन किया था। अनिल अंबानी ने कहा था, ‘नरेंद्र भाई ने गुजरात का भला किया है, शासक और जरा सोचिए, जब वह देश का नेतृत्व संभालेंगे, तो क्या होगा।’ वहां मौजूद रतन टाटा ने भी केवल दो दिन के भीतर नैनो के लिये जमीन की व्यवस्‍था करने वाले मोदी की तारीफ की थी। इसके दो वर्ष बाद 2011 में हुये इसी सम्मेलन में मुकेश अंबानी ने कहा, ‘गुजरात एक स्वर्ण दीपक की भांति जगमगा रहा है, और इसकी वजह नरेंद्र मोदी की दूरदृष्टि है।’ 2013 में अनिल अंबानी ने मोदी को राजाओं का राजा कह कर संबोधित किया था।
राजनीतिक और व्यापारिक हितों के बीच मजबूत होते रिश्तों में महत्वपूर्ण मोड़ 2010 में नीरा राडिया टेप के जरिये आया था। उसने व्यापारियों, राजनेताओं, नीति-नियंताओं और मीडिया के बीच पनपते गठजोड़ का पर्दाफाश किया। सर्वोच्च न्यायालय और कैग के रवैये को देखते हुये जब यह लगने लगा कि सार्वजनिक संसाधनों की लूट करना अब इतना आसान नहीं होगा, तब कॉरपोरेट ने मनमोहन सरकार को कोसना शुरू कर दिया। यानि जब कांग्रेस उनके मुनाफे को बढ़ने में कमजोर पड़ी तो मोदी का दामन थम लिया। आखिर मोदी, कांग्रेस से आर्थिक आधार पर अलग कहां हैं दिख रहे हैं भले ही वे मध्यवर्ग को एक स्ट्रांग अच्छे तानाशाह क्यों न दिखते हों।
आज मोदी जिस मुकाम पर हैं, वह इसलिये नहीं कि देश में सांप्रदायिकता की लहर जोर मार रही है, बल्कि इसलिये कि भारत का कॉरपोरेट क्षेत्र अधीर हो रहा है। मजबूत होती उनकी स्थिति को दर्शाते हर जनमत सर्वेक्षण के बाद बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का उत्साह देखते ही बनता है। हाल ही में जेम्स क्रेबट्री ने फाइनेंशियल टाइम्स में अडानी इंटरप्राइजेज को होने वाले भारी मुनाफे का उल्लेख किया है। पिछले महीने के दौरान इस कंपनी के शेयरों में 45 फीसदी से ज्यादा उछाल आया है। जबकि इस दौरान सेंसेक्स में सात फीसदी की ही बढोतरी देखने को मिली। विश्लेषक इसकी एक वजह यह मान रहे हैं कि निवेशकों को भरोसा है कि चुनाव के बाद यदि मोदी की सरकार बनती है, तो पर्यावरणीय अड़चनों के बावजूद अडानी इंटरप्राइजेज को मुंद्रा बंदरगाह के मामले में अनुमति मिल जाएगी। ‘क्‍लीयरेंस’ (सरकारी अनुमति) शब्द सुनने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन अगर नरेंद्र मोदी के संदर्भ में देखें, तो इसके कहीं व्यापक मायने हैं। दरअसल बीमा और रिटेल क्षेत्र को खोलने समेत विदेशी निवेशकों की सभी मांगों को पूरा करने के लिये पूंजी के साथ मनचाहा बर्ताव करने की छूट देने की मोदी की मंशा, इस एक शब्द में छिपी हुई है। इतना ही नहीं, पर्यावरणीय अड़चनों, आजीविका या आवास से जुड़े संकटों या सामुदायिक हितों को भी मोदी की इस आकांक्षा के आड़े आने की इजाजत नहीं होगी। इस निर्णायक भूमिका के वायदे के कारण मोदी न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया के बड़े व्यापार के लिये आकर्षण बन गए हैं। मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के एन एस सिद्धार्थन कहते हैं, ‘आज के बिजनेस माहौल में केवल विनिर्माण के जरिये मुनाफा कमाने की सोचना बेमानी हो गया है। दरअसल इसका तरीका सरकारी स्वामित्व में संसाधनों के दोहन में छिपा हैं।’ गौरतलब है कि इन संसाधनों में केवल कोयला, स्पेक्ट्रम या लोहा ही शामिल नहीं हैं, बल्कि जमीन और पानी भी इसी के तहत आते हैं। अब यह पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है कि नरेंद्र मोदी आखिर किसका प्रतिनिधित्व करते हैं, और भारतीय राजनीति में उनके उदय के क्या मायने हैं?
2004 में वाजपेयी सरकार की हार के पीछे गुजरात दंगों को रोक पाने में मोदी की नाकामी को मीडिया ने जिम्मेदार माना था। ऐसे में उनके सामने बड़ा सवाल यह था कि सांप्रदायिक हिंसा के विरोध में खड़े शहरी मध्य वर्ग को इस बात पर कैसे राजी किया जाए कि देश की सारी समस्याओं का समाधान मोदी ही कर सकते हैं। यहीं से गुजरात के विकास मॉडल का मिथक खड़ा किया गया। 2013 में वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में आनंद महिंद्रा ने कहा, ‘आज लोग गुजरात में विकास के चीन सरीखे मॉडल की बात कर रहे हैं। लेकिन वह दिन दूर नहीं जब चीन में लोग गुजरात के विकास मॉडल की बात करेंगे।’  पूंजीवादी विकास के इस लुभावने मॉडल की ओर आकर्षित भारतीय और विदेशी पूंजीपति वर्ग के लिये बस एक ही परेशानी की बातथी -2002 का नरसंहार जिसे मोदी और उनकी सरकार की मिली भगत से अंजाम दिया गया था। पूंजीपति वर्ग का एक हिस्सा इस तरह के नरसंहार से हिचकता है तो दूसरा हिस्सा इस भयंकर कत्लेआम की छवि वाली सरकार के साथ खुल कर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। इसीलिये यदि किसी तरह यह सब धूमिल हो सके, यदि नरेंद्र मोदी थोड़े नरम हो जाएं या वे बेगुनाह साबित हो जाएं तो कितना अच्छा हो। तब पूंजीपति वर्ग को मोदी को खुलेआम गले लगाने में दिक्कत नहीं होगी।
मोदी की तारीफ के पीछे कॉरपोरेट, उस आर्थिक विकास का मॉडल देख रहा है जिसमें उनका भारी मुनाफा होगा। आखिर क्या है यह मॉडल?  दर असल यहां ऐसे विकास की बात है, जिसमें जमीन, खदान और पर्यावरण के लिये क्‍लीयरेंस पाना बेहद आसान होगा। इसमें गैस की कीमत जैसे असहज सवाल नहीं किए जाते। कांग्रेस की जनविरोधी पूंजीवाद समर्थक जिन नीतियों के कारण भ्रष्टाचार बढ़ा है, उसे खत्म करने में मोदी-कॉरपोरेट की दिलचस्पी नहीं है। दरअसल सत्ता के साथ अनैतिक मिलीभगत से हमारी बड़ी कंपनियों को कारोबार करने पर कोई एतराज नहीं है। भ्रष्टाचार यहीँ  से शुरू होता है। यह पूंजीवादी भारत का चरित्र बन चुका है। और वे कॉर्पोरेट घराने मोदी की ओर देख रहे हैं कि वह इस भ्रष्ट व्यवस्था को निर्णायक तथा स्थायित्व के साथ, उनके अनुकूल तरीके से चलाएंगे। यह मोदी का स्थायित्व है, ऐसा इस देश के मध्य वर्ग का सोच निर्मित किया गया है। भ्रष्टाचार मिटाने का मोदी का यही तरीका है, विकास का यही उनका मॉडल है। लेकिन नरेंद्र मोदी को पूंजीपति वर्ग के इस समर्थन के बावजूद उनके रास्ते में सबसे बड़ी बाधा स्वयं उनकी पार्टी के लोग हैं। भाजपा में प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार हैं और उनमें से कई भाजपा, राजग के अन्य धड़ों, को ज्यादा स्वीकार्य होगें। सबसे बड़े दावेदार तो आडवाणी ही थे जो अपनी घोर उपेक्षा और अपमान के बावजूद इस समय पूरी निष्ठा के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान हेतु एक नए रथ पर सवार हो गए हैं। राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी, उमाभारती क्या चाहते हैं यह भी सबको पता है। विदिशा, मध्य प्रदेश लोकसभा उम्मीदवार और म प्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अबकी बार मोदी सरकार से मन से इत्तफाक नहीं रखते। वहां की चुनावी रैलियों में मोदी के फ़ोटो से दूरी बनी है।

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शैलेन्द्र चौहान, साहित्यकार व स्तंभकार हैं।

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