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मोदी न हैं, न थे और न होंगे तुरूप का इक्का

सलीम अख्तर सिद्दीकी
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मुसलमानों से भाजपा से हुयी जानी-अनजानी गलतियों के लिये सिर झुकाकर माफी माँगने की बात कहकर चुनावी बेला में माफी की राजनीति को आगे बढ़ाया है। पूर्व में सोनिया गांधी 84 के सिख विरोधी दंगों के लिये माफी माँग चुकी हैं, तो मुलायम सिंह यादव कल्याण सिंह को सपा में लाने की गलती के लिये मुसलमानों से क्षमा माँग चुके हैं। मुलायम सिंह को मुसलमानों ने माफ भी कर दिया था। अब देखना यह है कि मुजफ्फरनगर दंगों के लिये वह कब माफी माँगेगे?
बहरहाल, भाजपा को यह पता है भारत में मुसलिम एक सियासी ताकत हैं, जिन्हें नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि वह देश की ऐसी सौ सीटों की पहचान करती है, जहाँ मुसलिम 30 प्रतिशत या उससे अधिक हैं। यदि इन सौ सीटों पर भी मुसलिमों ने एकजुट होकर उसके खिलाफ वोट कर दिया, तो उसका “272 प्लस” मिशन तो धराशायी हो ही जायेगा, वह 200 के आसपास सीटें लाने से भी वंचित हो सकती है। भाजपा की यही सबसे बड़ी चिंता है कि यदि नरेंद्र मोदी को रोकने के लिये मुसलिम एकजुट हो गये तो क्या होगा? हमें याद रखना चाहिए कि देश में जब भी सत्ता परिवर्तन हुआ है, उसमें सभी वर्गों की भागीदारी रही है। आजादी के बाद 1977 और 1989 में गैर कांग्रेसवाद के नाम पर क्रमश: जनता पार्टी और जनता दल सत्ता में आये थे। यह जानते हुये भी कि जनसंघ, जो आज की भाजपा है, का जनता पार्टी में विलय हो गया था, तब भी मुसलमानों ने जनता पार्टी को वोट दिया था।
इसी तरह 1989 में जनता दल को जिताने में दूसरे वर्गों के साथ मुसलमानों का भी अहम योगदान रहा था। जनता दल ने भाजपा से बाहर से समर्थन लेकर सरकार बनायी, तब भी मुसलमानों को ऐतराज नहीं हुआ था। लेकिन राम मंदिर आंदोलन के बहाने जिस तरह से भाजपा ने सांप्रदायिक एजेण्डा चलाया था, वह अभूतपूर्व था। 1992 में बाबरी मसजिद के टूटने और देश के कई शहरों में हुये भीषण सांप्रदायिक दंगों के बाद मुसलमानों और भाजपा के बीच फासला बहुत अधिक हो गया। 2002 के गुजरात दंगों के बाद तो दूरियां इतनी ज्यादा बढ़ गर्इं कि उन्हें किसी तरह की माफी शायद ही खत्म कर सके।
राजनाथ सिंह मुसलमानों से यह क्यों कह रहे हैं कि यदि भाजपा से गलती हुयी है, तो वह उनसे माफी माँग लेंगे? यह तो खुद भाजपा को देखना है कि उससे कब और कहाँ ऐसी चूकें हुयी हैं, जिससे देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग उससे ऐसा छिटका कि किसी भी तरह उसके पास आने के लिये तैयार नहीं है। 1925 में वजूद में आये आरएसएस, फिर जनसंघ, आज की भारतीय जनता पार्टी और तमाम पूरे संघ परिवार की कवायद देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाकर हिंदुओं का वोट बैंक तैयार करने की ही रही है। लेकिन इस देश का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना इतना मजबूत है कि वह तमाम कोशिशों के बाद भी छीजा नहीं। यही वजह रही कि भाजपा 188 सीटों से कभी आगे नहीं बढ़ सकी। इससे पता चलता है कि उसकी नीतियों को मुसलिम ही नहीं, देश के अन्य वर्ग भी पसन्द नहीं करते। ऐसा न होता, तो वह 90 के दशक में ही 272 प्लस का आँकड़ा छू चुकी होती। नब्बे का दशक भाजपा का सुनहरा दौरा था, जो अब शायद ही कभी वापस आये। दरअसल, 1986 में बाबरी मसजिद का ताला खुलने से लेकर मुजफ्फरनगर दंगों तक संघ परिवार, भाजपा के पक्ष में हिंदुओं के ध्रुवीकरण की कोशिश करता रहा है।
अगर राजनाथ सिंह भाजपा की गलती ही पूछते हैं, तो उनकी हालिया सबसे बड़ी गलती तो यही है कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद वे मुसलिम दंगा पीड़ितों का हाल जानने नहीं गये। किसी राहत शिविर में उन्होंने कदम रखा। हां, दंगों के आरोपियों को भाजपा के मंच से सम्मानित किया गया। जब भाजपा ऐसा करेगी, तो मुसलमान भाजपा को वोट क्यों देगा?
अगर भाजपा वास्तव में देश के सभी नागरिकों को समान समझती, जैसा वह दावा करती है, तो उसकी राजनीति मुसलिम विरोध पर ही क्यों टिकी है? लोकसभा और विधान सभाओं में उसने कितने मुसलमानों को टिकट दिया है? ऐसा क्यों हैं कि उसके पास मुसलमानों के नाम पर सिर्फ दो चेहरे ही होते हैं? क्या उसे पूरे मुसलिम समुदाय से चंद काबिल मुसलिम नहीं मिलते, जिन्हें वह लोकसभा या विधान सभाओं में भेज सके? भाजपा को अपनी मुसलिम नीति में बदलाव लाने की जरूरत है, जिसमें वह चाहकर भी बदलाव नहीं कर सकती। उसने अपना चरित्र कुछ ऐसा बना लिया है कि है कि उससे बाहर आने पर उसे डर लगता है कि उसका वजूद इतना भी नहीं रहेगा, जितना आज है।
राजनाथ सिंह के बयान से प्रकाश जावेडकर का किनारा करना इसकी पुष्टि करता है। भाजपा भले ही अन्य राजनीतिक दलों को छद्म धर्मनिरपेक्ष कहकर उनकी आलोचना करे, लेकिन सच यही है कि भारत जैसे देश में सभी को साथ लेकर ही सत्ता का शिखर छुआ जा सकता है। बसपा ने दलितों के साथ सभी को जोड़ा तो 2007 में उसने पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। भाजपा सोचे कि वह क्यों पिछले दस साल से वनवास में रही है? भाजपा को यह समझ लेना चाहिए कि मोदी का चेहरा तुरूप का इक्का नहीं है, जिसको चलकर हर हाल में बाजी जीती जा सकती है।

About the author

सलीम अख्तर सिद्दीकी पत्रकारिता जगत का जाना पहचाना चेहरा हैं। देश के अनेक समाचार-पत्रों में सामायिक मुद्दों पर लेख लिखते हैं। आजकल दैनिक जनवाणी में कार्यरत हैं

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