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मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ- केंद्रीयकरण का एक साल

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ

नरेन्द्र मोदी ने 25 मई 2015 को प्रधानमंत्री के रूप में एक साल पूरा कर लिया। उन्होंने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इस एक साल में मोदी की क्या उपलब्धियां रहीं, यह उतना ही विवादास्पद है जितना कि मोदी का व्यक्तित्व। जहां प्रधानमंत्री के समर्थक और अनुयायी यह अतिश्योक्तिपूर्ण दावा कर रहे हैं कि मोदी ने अभूतपूर्व सफलताएं हासिल की हैं वहीं उनके विरोधी, उन वायदों की सूची गिनवा रहे हैं जो पूरे नहीं हुए। उनके कार्यकाल का निष्पक्ष और ईमानदार विश्लेषण करना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। हम यहां उन कुछ प्रवृत्तियों की चर्चा करेंगे जो मोदी के कार्यकाल में उभरीं और उस दिशा पर विचार करेंगे, जिस ओर उनके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार देश को ले जा रही है।
आम चुनाव के समय नारा दिया गया था ‘अब की बार, मोदी सरकार’ और यह सचमुच मोदी की ही सरकार है। यह न तो एनडीए की सरकार है और ना ही भाजपा की। अखबारों के अनुसार, एनडीए के गठबंधन साथियों ने मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना की है। महाराष्ट्र के स्वाभिमानी शेतकारी संगठन और अकाली दल, भूमि अधिग्रहण अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों के विरोधी हैं। शिवसेना ने भाजपा की तुलना अफजल खान की सेना के महाराष्ट्र पर आक्रमण से की। पिछली यूपीए सरकार के विपरीत, प्रधानमंत्री शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि वे एक कड़े प्रशासक हैं और सभी निर्णय वे स्वयं लेते हैं। प्रजातंत्र में सबको साथ लेकर चलना होता है, सभी के हितों का ख्याल रखना होता है। कुछ महीनों पहले, अखबारों में एक फोटो छपी थी जिसमें प्रधानमंत्री मोदी एक ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए थे और बाकी सभी कैबिनेट मंत्रियों की कुर्सियां नीचे थीं। संदेश स्पष्ट था। प्रधानमंत्री ने किस हद तक अपने मंत्रियों पर शिकंजा कस रखा है यह इस बात से जाहिर है कि मंत्रियों को अपने निजी सचिवों की नियुक्तियों के लिए भी प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति लेनी पड़ती है। कारण यह बताया गया है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते कि मंत्रिगण अपने रिश्तेदारों या परिचितों को अपना निजी सचिव बनाएं। परंतु क्या इसके लिए एक सामान्य निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होता? क्या प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों पर इतना भरोसा भी नहीं है कि वे उनके निर्देशों का पालन करेंगे? यह भी साफ नहीं है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मंत्रियों के प्रस्तावित निजी सचिवों के संबंध में क्या जांच-पड़ताल की।
केंद्रीयकरण
मोदी सरकार में सभी शक्तियां, प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रीकृत कर दी गई हैं। सभी मंत्रालयों के सचिवों की पीएमओ तक सीधी पहुंच है और पीएमओ किसी भी मंत्रालय से कोई भी फाईल बुलवा सकता है। इससे निश्चित तौर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आई है परंतु हर तेज निर्णय हमेशा सबसे अच्छा निर्णय नहीं होता। प्रधानमंत्री ने फ्रांस की राफेल कंपनी से लड़ाकू हवाई जहाज खरीदने का सौदा, बिना रक्षामंत्री की मौजूदगी या सहमति के किया। प्रधानमंत्री इस एक वर्ष में दुनिया के बहुत से देशों में गए। इनमें भूटान, श्रीलंका, नेपाल, इंग्लैण्ड, जर्मनी, अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, चीन और मंगोलिया शामिल हैं। विदेश मंत्री, ईराक में फंसे 39 भारतीयों को निकालने और अन्य इसी तरह के कामों में व्यस्त रहीं। यहां तक कि नेपाल में भूकंप के बाद भारत सरकार ने जो राहत पहुंचाई उसका श्रेय भी केवल मोदी को दिया गया। जिन भी देशों में मोदी गए, वहां उन्होंने अप्रवासी भारतीयों की सभाओं को संबोधित किया और स्वदेश की राजनीति के संबंध में टिप्पणियां कीं।
किसी एक व्यक्ति में सारी शक्तियां केंद्रित कर देने से उन लोगों को लाभ होता है जो उस व्यक्ति के करीबी हैं या जिनकी उस तक पहुंच है। वह व्यक्ति जितना अधिक शक्तिशाली होता है उसे उतने ही ज्यादा विवेकाधिकार प्राप्त होते हैं और वह जो नीतियां बनाता है, उनसे उन लोगों को लाभ होता है जो उसके नजदीक हैं। प्रधानमंत्री की छवि कुबेरपतियों के मित्र की है। उनके ‘‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’’ व ‘‘मेक इन इंडिया’’ अभियानों से भी यही ध्वनित होता है। इन अभियानों के अंतर्गत उद्योगों की नियमन प्रणाली को लचीला बनाया जा रहा है, उन्हें विभिन्न अनुमतियां प्रदान करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है, कारपोरेट टैक्सों की दरें घटाई गई हैं, पर्यावरण संबंधी बंधन ढीले किए गए हैं और उद्योगपतियों को कर्मचारियों को जब चाहे रखने और जब चाहे हटाने की स्वतंत्रता दे दी गई है। इस सब से श्रमिकों की ट्रेड यूनियनें कमजोर हुई हैं व श्रमिक वर्ग की आमदनी घटी है। राज्य, भूमि अधिग्रहण करने में उद्योगपतियों की मदद कर रहा है और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने के लिए भारी मात्रा में धन खर्च कर रहा है। मुंबई-दिल्ली औद्योगिक गलियारा और मुंबई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन चलाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। इनकी तुलना पूर्व यूपीए सरकार की प्राथमिकताओं से कीजिए-यद्यपि वह भी उद्योगपतियों की मित्र थी-जिसने मनरेगा, खाद्य सुरक्षा व सूचना के अधिकार जैसी योजनाओं व कार्यक्रमों पर कम से कम कुछ धन तो खर्च किया।
एससी, एसटी व नीति आयोग
अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना व आदिवासी उपयोजना के लिए केंद्रीय बजट 2015-16 में पिछले बजट की तुलना में प्रावधान क्रमश: रूपये 43,208 करोड़ से घटाकर रूपये 30,851 करोड़ और रूपये 26,715 करोड़ से घटाकर रूपये 19,980 करोड़ कर दिए गए। इन समुदायों के आबादी में अनुपात की दृष्टि से जितना धन इन योजनाओं के लिए उपलब्ध करवाया जाना चाहिए, बजट प्रावधान उससे काफी कम हैं।
अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नज़मा हेपतुल्लाह को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अल्पसंख्यकों में शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी से ज्यादा चिंता इस बात की है कि पारसी समुदाय की प्रजनन दर कैसे बढ़ाई जाए।
मोदी सरकार ने योजना आयोग को भंग कर उसके स्थान पर नीति आयोग की स्थापना कर दी। मोदी सरकार का तर्क था कि योजना आयोग की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है क्योंकि उसका गठन उस दौर में किया गया था जब सरकार का अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण था। परंतु इस संदर्भ में यह याद रखे जाने की जरूरत है कि शनैः शनैः योजना आयोग अधिक समावेशी नीतियां अपना रहा था और उसी ने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में बजट प्रावधान करने की अवधारणा प्रस्तुत की थी। आठवीं पंचवर्षीय योजना में पहली बार ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का इस्तेमाल किया गया और इस बात पर जोर दिया गया कि समाज के हाशिये पर पड़े तबकों को मुख्यधारा के समकक्ष लाए जाने की जरूरत है। नौवीं पंचवर्षीय योजना में सामाजिक न्याय व सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के जरिए सभी के विकास की बात कही गई थी। अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान लागू किए जाने का सिलसिला दसवीं पंचवर्षीय योजना से शुरू हुआ। इस योजना का फोकस महिलाओं व अल्पसंख्यकों सहित सभी वंचित व कमजोर वर्गों के सामाजिक-आर्थिक विकास पर था। ग्याहरवीं पंचवर्षीय योजना में अधिक समावेशी विकास की बात कही गई थी और सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध करवाने पर जोर दिया गया था। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में समाज के हाशिये पर पड़े वर्गों के लिए और अधिक आर्थिक प्रावधान किए गए थे।
योजना आयोग की जगह नीति आयोग स्थापित करने के निर्णय को इन तथ्यों के प्रकाश में देखा जाना चाहिए। नीति आयोग का वंचित समूहों के विकास से कोई लेनादेना नहीं है। वह तो एक प्रकार का ‘थिंक टैंक’ है, जिसका जोर बाजार और औद्योगिक गलियारों के विकास और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने पर है।
शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्ता
प्रधानमंत्री मोदी के बाद उनके मंत्रिमंडल के जिस मंत्री की मीडिया में सबसे अधिक चर्चा रही वे थीं मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी। और वे लगभग हमेशा गलत कारणों से चर्चा में रहीं। मानव संसाधन विकास मंत्री का कई शैक्षणिक संस्थानों से कई मौकों पर टकराव हुआ और उन्होंने अनेक विवादास्पद निर्णय लिए। इनमें शामिल हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के चार-वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को समाप्त करना, अमर्त्य सेन द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय का दूसरी बार कुलाधिपति बनने से इंकार, परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व निदेशक अनिल काकोडकर व आर.के. शैवगांवकर का आईआईटी मुंबई के शासी निकाय से इस्तीफा, केंद्रीय विद्यालयों में शैक्षणिक सत्र के अधबीच, जर्मन की जगह संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाना आदि। शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्ता को समाप्त करने के भरपूर प्रयास किए गए। हरियाणा में स्कूलों में गीता पढ़ाई जा रही है और राजस्थान के स्कूलों में सूर्यनमस्कार अनिवार्य बना दिया गया है।
आरएसएस नेता सुरेश सोनी व कृष्णगोपाल दत्तात्रेय और भाजपा के जेपी नड्डा व रामलाल ने मानव संसाधन विकास मंत्री से मिलकर यह मांग की कि स्कूलों के इतिहास के पाठ्यक्रमों में ‘सुधार’ किए जाएं। इस मुद्दे पर कई बैठकें हुईं। 30 अक्टूबर 2014 को इस मुद्दे पर छठवीं बैठक आयोजित की गई। दीनानाथ बत्रा की लिखी पुस्तकों को गुजरात  सरकार ने स्कूली विद्यार्थियों के अतिरिक्त अध्ययन के लिए निर्धारित किया है। ये किताबें इतिहास को हिंदू राष्ट्रवादी चश्मे से देखती हैं और इनमें अप्रमाणित तथ्यों के आधार पर प्राचीन भारत का महिमामंडन किया गया है ताकि लोगों में श्रेष्ठता और गर्व का झूठा भाव जगाया जा सके। इतिहास को पौराणिक रंग दे दिया गया है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं कहा कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक उपलब्ध थी और इसका प्रमाण यह है कि भगवान गणेश का सिर हाथी का और शरीर मनुष्य का है। हम सब यह सोचकर चकित थे कि हाथी का कई क्विंटल वजनी सिर यदि किसी तरह मानव शरीर पर लगा भी दिया जाए तो वह मनुश्य उसका वजन कैसे सहन कर सकेगा। इसी तरह के वक्तव्य कई अन्य भाजपा नेताओं ने भी दिए जिनमें से कुछ ने कहा कि भारत में हजारों साल पहले परमाणु मिसाइलें थीं। विद्यार्थियों के सामने फंतासी और पौराणिक कथाओं को इतिहास के रूप में परोसना, उनके दिमाग को कुंद करना है। एक अच्छे विद्यार्थी का सबसे बड़ा गुण यही होता है कि वह किसी भी बात को आंख मूंचकर नहीं मानता और हर विश्वास व तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसता है।
हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना
देश में हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना का तेजी से प्रसार हो रहा है। यह, हिन्दू धार्मिक चेतना से एकदम अलग है। हिन्दू धार्मिक चेतना का प्रकटीकरण कई स्वरूपों में हो सकता है जिनमें पवित्रता-अपवित्रता की अवधारणा, जो यह निर्धारित करती है कि कौन किसके साथ रोटी-बेटी का संबंध रख सकता है और कौन ऊँचा है और कौन नीचा से लेकर मीरा, कबीर, गुरूनानक, तुकाराम, रविदास आदि के प्रेम, सद्भाव, समानता, सत्य व अहिंसा पर आधारित समावेशी शिक्षाओं तक शामिल हैं। परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना एक प्रकार की राजनैतिक चेतना है जो जाति-आधारित ऊँचनीच को कायम रखते हुए हिन्दुओं को राजनैतिक रूप से एक करना चाहती है और जो ‘दूसरे‘ को न केवल परिभाषित करती है वरन् यह भी सिखाती है कि उस ‘दूसरे‘ से हिन्दुओं को अनवरत युद्धरत रहना है। हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना, एकाधिकारवादी राज्य को आसानी से स्वीकार कर लेगी बशर्ते वह उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग के विशेषाधिकारों को कायम रखे और ‘दूसरे‘ समुदाय का हिंसा से दमन करे और यहां तक कि उसे देश से भगा दे।
ध्रुवीकरण करने के उद्धेश्य से शुरू किया गया साम्प्रदायिक विमर्श दिन-प्रतिदिन और दुस्साहसी होता जा रहा है। कुछ राज्यों में गोड़से के मंदिर बन गए हैं और उसे हिन्दुओं का नायक बताया जा रहा है। दिसम्बर 2014 से लेकर अब तक दिल्ली, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक और मध्यप्रदेश में चर्चों पर हमले की कम से कम 11 घटनाएं हुई हैं।  शासक दल के सांसद और यहां तक कि मंत्री ऐसे वक्तव्य दे रहे हैं जिनके लिए उनपर दूसरे समुदाय के विरूद्ध घृणा फैलाने के लिए भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153ए के तहत कार्यवाही की जा सकती है। गिरिराज सिंह, साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची व अन्यों ने अलग-अलग समय पर कहा कि जो लोग राम में विश्वास नहीं करते वे हरामजादे हैं, मदरसे आतंकवाद के अड्डे हैं, मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है, हिन्दू महिलाओं को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए और जो लोग मोदी को वोट नहीं देते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। परंतु न तो इन भड़काऊ वक्तव्य देने वालों और ना ही चर्चों पर हमले करने वालों पर कोई कार्यवाही की गई।
घर वापसी अभियान जोरशोर से जारी है और आरएसएस मुखिया मोहन भागवत ने आगरा में गैर-हिन्दुओं को जबरदस्ती हिन्दू बनाए जाने को औचित्यपूर्ण बताते हुए अत्यंत गिरी हुई भाषा का उपयोग किया। उन्होंने यह मांग की कि ‘हमारा माल वापिस कर दो‘ मानो मुसलमान कोई संपत्ति हों। भागवत के खिलाफ कार्यवाही करने की बजाए गृह मंत्री ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसी तरह, कई संगठनों ने यह बीड़ा उठा लिया है कि वे हिन्दू लड़कियों की शादी गैर-हिन्दुओं से नहीं होने देंगे भले ही लड़के और लड़की को इसमें कोई आपत्ति न हो।
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन केवल मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने से संतुष्ट नहीं हैं। वे राज्य की शक्ति का प्रयोग उनके खिलाफ करना चाहते हैं। गुजरात विधानसभा ने हाल में एक अत्यंत भयावह तथाकथित आतंकवाद-निरोधक विधेयक पारित किया है और सरकार के कहने पर राष्ट्रपति ने महाराष्ट्र सरकार के बीस साल पुराने गौवध निषेध अधिनियम को अपनी स्वीकृति दे दी है। इन सभी कानूनों का उद्धेश्य अल्पसंख्यकों का दमन है।
-इरफान इंजीनियर
 (मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

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