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यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र साम्राज्यवादी

स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है
मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।
पलाश विश्वास
कल जो रोजनामचा लिखा, वह दरअसल अधूरा रह गया है। हमारे घर में दो छोटे बच्चे भी हैं। निन्नी और पावेल। छोटे भाई पंचानन की बेटी और बेटा।
निन्नी चौथी में पढ़ती है और बेहद समझदार हो गयी है तो पावेल सातवीं में पढ़ते हुए भी बहुत हद तक वैसा ही है, जैसा कि मैं बचपन में हुआ करता था।
मेरे इलाके में लोग मुझे बलदा यानी बड़े भाई और बुरबक एक साथ एक ही शब्द में कहा करते थे। पावेल मेरी तरह ही साईकिल से अपने स्कूल छह सात किमी दूर जाता है रोज। वह सातवीं में पढ़ता है।
वह मेरी तरह मुख्य सड़क छोड़कर खेतों की मेढ़़ों से रास्ता बनाकर स्कूल जाता है रोज। मैंने पूछा तो बताया कि मुख्य सड़क पर किसी फार्म हाउस के सात- सात कुत्ते हैं, उनसे एक बार वह बच निकला है और उनसे बचने के लिए सुरक्षित खेतों के दरम्यान वह अपना रास्ता बनाता है।
मुख्य सड़क पर सात छुट्टे कटखने निरंकुश कुत्तों का राज यह मेरा भारत महान है।
फर्क यह हुआ कि पहले पूरी तराई एक बड़ा सा फार्म हाउस हुआ करता था और बाकी सारे गांव महनतकश बस्तियां। अब तराई और पहाड़ पूंजी का मुकम्मल सामंती उपनिवेश है।
पिछली बार जब घर आया था, दोनों बहुत छोटे थे और मेरे साथ चिपके रहते थे। खासतौर पर निन्नी। गांव में लोग उसे चिढ़ाते भी थे, ताऊ तो चले जायेंगे, फिर क्या करोगी निन्नी। निन्नी जवाब में गुमसुम हो जाती थी।
अबकी बार स्कूल से लौटने के बाद वे कोचिंग में चले जाते हैं। शाम को ही उनसे मुलाकात हो पाती है। पहले दिन तो उसके पिता ने हमारे आने की खुशी में उन्हें छुट्टी दे दी। अगले दिन सविता उन्हें लेकर बाजार चली गयीं।
दोनो बच्चों ने अपनी ताई के साथ खरीददारी में अपनी पसंद के जो कपड़े खरीदे हैं, उन्हें देखकर मैं चकित रह गया।
हमें इतनी तमीज भी नहीं थी। मुझे एक काला कोट मिला था, उनकी उम्र में जो मेरी संपत्ति थी और मैं उसे हरवक्त चबाता रहता था।
फिर भी पढ़ाई से जब उनकी छुट्टी होती है, उनसे रोज ढेरों बातें होती हैं और रह रहकर अपने बचपन में लौटना होता है।
निन्नी ने वायदा किया है कि खूब पढ़ेगी।
मैंने उससे कहा कि अब इस घर में न कोई बेटी और न कोई बहू रसोई में कैद होगी फिर कभी। निन्नी से मैंने इस सिलसिले में जो भी कहा, बड़ो के मुकाबले ज्यादा गंभीरता से उसने सुना और अपने सकारात्मक जवाब से मुझे हैरान करती रही।
बहुत समझदार हो गयी है निन्नी।
बहुत समझदार हो गयी है हमारी बेटियां।
बिटिया जिंदाबाद।
बसंतीपुर गांव से मेरी मां कभी अपने मायके ओड़ीशा वापस नहीं गयीं। न वह बाहर जाना पसंद करती थीं और इसी गांव की माटी में मिल गयीं।
मेरी मां, मेरी ताई, मेरी चाची, मेरी बुआ, मेरी नानी और मेरी दादी के साथ साथ बसंतीपुर की सारी स्त्रियों को उनके कठिन संघर्ष के दिनों में बचपन से मैंने देखा है।
रसोई में सिमटी उनकी रोजमर्रे की जिंदगी और उनके बेइंतहा प्यार के मुकाबले हम उन्हें वापस कुछ भी दे नहीं पाये।
मेरी पत्नी सविता तो मेरी महात्वाकांक्षाओं की बलि हो गयीं। हम कोलकाता नहीं जाते तो उसे अपनी पक्की नौकरी छोड़कर हाउस वाइफ बनकर जिंदगी न बितानी होती। हम कोलकाता में उसकी कोई मदद नहीं कर सके।
खुशी यह है कि निन्नी की मां नौकरी कर रही हैं।
दरअसल मुद्दा यही है कि स्त्री के सशक्तीकरण के बिना न लोकतंत्र बच सकता है और न इस स्वतंत्रता का कोई मतलब है जबकि अपने अपने घरों में हम अपनी बेटियों बहुओं के लिए मुकम्मल कैदगाह रचते रहेंगे।
हमारे घर में और गांव में खेतों, खलिहानों से लेकर घर की व्यवस्था में स्त्रियों की प्रबंधकीय दक्षता का मैं कायल रहा हूं। इस मामले में अधपढ़ हमारी ताई बाकायदा मिसाल है। फिर प्रोफेशनल लाइफ में कामकाजी महिलाओं को मैं दसों हाथों से घर बाहर संभालते हुए रोज जब देखता हूं।
मुझे पक्का यकीन है कि समाज और देश के कायाकल्प के लिए स्त्री भूमिका ही निर्णायक होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि हमारी बहू बेटियां इस चुनौती को मंजूर करें और हम सारे पुरुष इसमें उनका सहयोग करें।
मेरी दूसरी भतीजी, तहेरे भाई की बेटी कृष्णा नई दिल्ली में बीए फाइनल की छात्रा है। इंटर करने के बाद समुद्र विज्ञान की पढ़ाई के लिए वह कोलकाता गय़ी थी और उसके बाद उससे मुलाकात नहीं हुई है। लेकिन तभी मैंने उससे वायदा किया हुआ है कि वह कुछ बनकर दिखाये और जिंदगी में जो भी कुछ करना चाहती है, करे, पूरा परिवार उसके साथ होगा।
हमने तभी साफ कर दिया कि हम उसके विवाह के लिए कोई जल्दबाजी नहीं करेंगे। जब वह पढ़ लिखकर काबिल हो जायेगी, तब जब चाहे तब, जिसे पसंद करेगी, उसके साथ विवाह करने के लिए स्वतंत्र होगी। जाति भाषा धर्म का कोई बंधन आड़े नहीं आयेगा।
जाहिर है कि चौथी में पढ़ने वाली निन्नी से ये बातें मैं कर नहीं सकता।
मुझे खुशी है कि बसंतीपुर की बेटियां ही नहीं, बहुएं भी पढ़ लिख रही हैं और नौकरी भी कर रही हैं और उनके जीवन में वे बाधाएं नहीं हैं, जो बसंतीपुर में मेरे बचपन के दौरान तमाम स्त्रियां पार नहीं कर सकीं।
फिर भी जाति गोत्र का बंधन वैसा ही अटूट है। इस पर भी हमने अपने गांव वालों को साफ साफ बता दिया है कि हमारे परिवार के बच्चों को अपने अपने जीवन साथी चुनने का हम पूरा हक देंगे और इस सिलसिले में बच्चों की मर्जी ही फाइनल है। गांव में हमारे प्राण हैं और हम हर मामले में गांव के साथ हैं तो गांव वालों को भी इस मामले में हमारा साथ देना चाहिए।
मुझे खुशी है कि जाति उन्मूलन के जिस जाति अंबेडकरी एजेंडे के तहत मेरे पिता तराई में सामाजिक एकीकरण की बात करते थे, नई पीढ़ी के बच्चे उसी के मुताबिक चल रहे हैं और उनके लिए जाति उतनी बड़ी बाधा नहीं रही, जिसकी वजह से हम अपनी संवेदनाओं को लगाम देने को मजबूर थे।
ताराशंकर बंदोपाध्याय के महाकाव्यीय आख्यानों के मुकाबले उनका छोटा उपन्यास कवि मुझे बेहद प्रिय रहा है। एक डोम के कवित्व के चरमोत्कर्ष की वह संघर्ष गाथा है बंगाल के लोक में सराबोर।
उसमें झुमुर गाने वाली बसंती की मौत निश्चित जानकर कविगानेर आसर पर जो गीत रचा उस डोम कवि ने, उसका तात्पर्य अब समझ में आ रहा हैः जीवनडा एतो छोटो कैने।
जिंदगी वाकई बेहद छोटी है। डिडिटल देश में डिजिटल सेना बनाने की बात हो रही है। बुलेट ट्रेन बस अब चलने वाली है।
दिनेशपुर में भी पीटरइंग्लैंड, रिबोक, ली ब्रांडों खी धूम है।
अत्याधुनिक जीवन और प्लास्टिक मनी की बहार के साथ-साथ हम अत्याधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विकास के साथ सुपरसोनिक हैं बतौर उपभोक्ता।
उपभोग और भोग के लिए हम अमेरिकियों से कम नहीं हैं। लेकिन अपनी ही बहू बेटियों के मामले में हम बर्बर आदिम पुरुषों से कम हैवान नहीं हैं।
इस विरोधाभास के खिलाफ लड़ने खातिर अब हमारे पास कोई राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फूले या हरिचांद गुरुचांद ठाकुर भी नहीं हैं।
हम जितने आधुनिक होते जा रहे हैं, जितने ब्रांडेड होते जा रहे हैं, जितने पढ़ लिख रहे हैं, दहेज की मांग उतनी अश्लील वीभत्स होती जा रही है।
दहेज खत्म कर दो तो बुनियादी जरुरतों के लिए इतने ज्यादा दुष्कर्म और इतने गहरे पैठे भ्रष्टाचार की गुंजाइश न हो और न कहीं भ्रूण हत्या की नौबत आये।
स्त्री की योग्यता और उसकी दक्षता का सही इस्तेमाल हो और पुरुष आधिपात्य से बाज आये समाज तो देश को अमेरिका बनाने की नौबत ही न आये और तब अमेरिका को भारत बनने की जरूरत आन पड़ेगी।
विकास जितना तेज हो रहा है, मुक्त बाजार जैसे शिकंजे में ले रहा है कृषि, कारोबार, उत्पादन प्रणाली, आजीविका, प्राकृतिक मानव संसाधन, उतना ही बर्बर और आक्रामक हो रहा है सैन्य राष्ट्र अपनी ही जनता के विरुद्ध।
सैन्य राष्ट्र के मुक्त बाजार में स्त्री उत्पीड़न की सांढ़ संस्कृति के तहत रोजाना बलात्कार, रोजाना उत्पीड़न,रोजाना अत्याचार, रोजाना हत्या और रोजाना आत्महत्या स्त्री जीवन की कथा व्यथा है।
पुरुषतंत्र को उनसे तो चौबीस कैरेट की निष्ठा चाहिए लेकिन अपने लिए रासलीला का पूरा बंदोबस्त चहिए।
उनके क्षणभंगुर सतीत्व के दो इंच पर ही टिकी है पृथ्वी बाकी सारे शिवलिंग हैं जिसका हर तरीके से अभिषेक होने ही चाहिए।
इस ग्लोबीकरण से तो बेहतर है दो सौ साल पहले का नवजागरण, जब भारत में पहली बार स्त्रियों को आजाद करने का आंदोलन शुरू हुआ।
स्वतंत्रता संग्राम शुरु हुआ तो स्त्री मु्क्ति आंदोलन ईश्वर चंद्र विद्यासागर राममोहन राय ज्योतिबा फूल और हिचांद गुरुचांद के तिरोधान की तरह खत्म हो गया।
हमने आजादी हासिल कर ली है लेकिन हमारी स्त्रियां अभी घर बाहर गुलाम हैं और हम उनकी देह को तो अपने भोग के लिए मुक्त करना चाहते हैं लेकिन उनकी अंतरात्मा की मुक्ति के हम विरुद्ध हैं। उनके सशक्तीकरण के हम विरुद्ध है। हम किस आजाद लोकतांत्रकिक देश में रह रहे हैं, यह सवाल हमें हर्गिज परेशान नहीं करता।
नये सिरे से नवजागरण के लिए जिंदगी बहुत छोटी पड़ गयी है। शरतचंद्र ने स्त्री मन का जो पाठ दिया, हमने अपने साहित्य और संस्कृति में उसे मुकम्मल देहगाथा में तब्दील कर दिया है जो औपनिवेशिक हीनताबोध के मुताबिक है।
चूंकि हम खुद गुलाम हैं तो हम यौनदासी के अलावा स्त्री का आजाद वजूद के बारे में सोच ही नहीं सकते।
हम उन मित्रों को बेहद करीब से जानते हैं जो जाति गोत्र तंत्र में इतने फंसे हैं, कुंडली ज्योतिष के ऑक्टोपस के शिकंजे में ऐसे हैं, कि जाति गोत्र समीकरण से बाहर निकलने की इजाजत अपनी बेटियों को न देकर उनकी जिंदगी नर्क बना रहे हैं दरअसल और हमारी मजबूरी है कि हम उनकी कोई मदद भी नहीं कर सकते।
स्त्री मुक्ति के लिए जाति धर्म मनुस्मृति अनुशासन का यह सामंती तिलिस्म तोड़़ना अनिवार्य है और उसके लिए अब एक ही जनम नाकाफी है।
यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम अब तकनीकी तौर पर हर भाषा में लिखने को समर्थ हैं लेकिन भाषा से भाषांतर हो जाने की हमारी कोई इच्छा नहीं है।
यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम ग्लोबीकरण को अपना रहे हैं लेकिन देश से देशांतर तक हमारी दृष्टि कहीं पहुंचती है नहीं और अपने अपने घर के भीतर कैद हम अंध हैं, दृष्टि अंध।
यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम चांद मंगल तक उपनिवेश गढ़ने को तत्पर हैं और हमारी दसों उंगलियों में ग्रह शांति के यंत्ररत्न हैं, ताबीज है, मंत्र तंत्र हैं।
यह कुछ वैसा ही है कि जैसे हम बात तो करेंगे ज्ञान विज्ञान की लेकिन धर्मग्रंथों के पाठ के संस्कार, मिथकों के चमत्कार और टोटेम के अंधविश्वास को हरगिज हरगिज नही त्याजेंगे।
यही है हीरक चतुर्भुज पुरुष तंत्र का।

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