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यह खाई 47 का बंटवारा और अडवानी की रथयात्रा भी नहीं खींच पाई,जो मुजफ्फरनगर ने खींच दी

फिर याद आया मुजफ्फरनगर
अडवानी की रथयात्रा हो या मुजफ्फरनगर के दंगे, दोनों ने भाजपा को ही फायदा पहुंचाया है
मुजफ्फरनगर को याद करने के दो कारण हैं, पहला आज 25 सितम्बर को लालकृष्ण अडवानी की रथयात्रा को 25 साल पूरे हो रहे हैं, दूसरा यही वह समय है, जब विष्णु सहाय समिति ने मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी है, जिसे मानने को कोई भी राजनैतिक दल तैयार नहीं है, सब पहले दंगों पर राजनीति कर रहे थे, अब रिपोर्ट पर करने में लगे हैं।
इन दोनों घटनाओं का सीधा संबंध है। अडवानी की रथयात्रा ने देश में एक ऐसी विभाजन की रेखा खींच दी, जिसे यह देश आज तक भुगत रहा है। यह रेखा खून की रेखा थी, जो आज तक लाल है।
देश भर की तमाम आतंकी घटनाओं की बात करें, तो पाएंगे, 1990 से पहले इस देश में इतने खतरे नहीं थे, जो अब हैं। हम हर दिन भय और आशंका में जीते हैं, चाहें हिंदू हों या मुसलमान। इसी आशंका का फायदा वे फिरकापरस्त ताकतें उठाती हैं, जिनका काम धर्म के नाम पर सियासत करना है। इन परिस्थितियों का फायदा वे आतंकी ताकतें भी उठाती हैं, जो हमारे देश को खुशहाल नहीं देखना चाहते।
अडवानी की रथयात्रा हो या मुजफ्फरनगर के दंगे, दोनों ने भाजपा को ही फायदा पहुंचाया है। रथयात्रा और उसके बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस ने ही भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया है, दूसरी तरफ मुजफ्फरनगर ने भी इसमें महती भूमिका निभाई है, अगर मुजफ्फरनगर नहीं होता, तो भाजपा उत्तर पदेश से कभी भी इतनी सीटें नहीं जीतती। मुजफ्फरनगर को याद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इससे पता चलता है, कि किस तरह राजनैतिक दल अपने फायदे के लिए लोगों का इस्तेमाल करते हैं, वह किस तरह लोगों की एकता तोड़ी जाती है।
असल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह हिस्सा काफी सम्पन्न है, यह गंगा और यमुना के कछार का इलाका है। यहां आजादी से पहले से शक्कर मिलें थीं और किसान गन्ने की खेती करता था। इसीलिए शक्कर कारखाना मालिकों को लड़ने के कारण इस इलाके में किसानों की एकता भी काफी अधिक है। इस इलाके की एक खासियत और है, जो मार्शल कौम के किसान धर्मांतरण कर मुसलमान बन गए, उन्होंने आज तक अपनी हिंदू पहचान नहीं छोड़ी है, वे आज भी हिंदुओं की तरह व्यवहार करते हैं और उनमें भी उसी पकार की खाप हैं, जैसी हिंदुओं में हैं, उदाहरण के तौर पर जो जाट मुसलमान बने, वे मूला जाट कहलाते हैं।
बहरहाल, यहां मुसलमानों का एक हिस्सा भी आर्थिक रुप से काफी सम्पन्न रहा है। जाट समुदाय के बारे में एक बात और खास है, यह कभी भी मूर्ति पूजक नहीं रहा, इसीलिए यहां आर्य समाज की हमेशा से अच्छी पकड़ रही, वह चाहें पश्चिमी उप्र हो या हरियाणा।
चौधरी चरण सिंह के समय से यह इलाका मुसलमानों और हिंदू किसानों की एकता का गढ़ रहा है, बाद में जब टिकैत किसान नेता बनकर उभरे, तो उन्होंने इस आंदोलन को जाटों और खासकर अपने गोत्र तक समेटने की कोशिश की। हालांकि उनके समय भी एकता कायम थी, पर आंदोलन बिखरने लगा था।
मुजफ्फरनगर में बालियान खाप (टिकैत इस खाप के मुखिया थे, अब उनका बेटा नरेश टिकैत है) के 84 गांव हैं, दूसरी बड़ी खाप है मलिक, जिसके 54 गांव हैं। सबसे पहले इस आंदोलन से यह दल अलग हुआ और इसके मुखिया बाबा हरकिशन सिंह ने गढवाला खाप बनाई। बाद में अन्य खापें भी टिकैत के आंदोलन से अलग होती चली गईं।
मुजफ्फरनगर को समझने के लिए इस राजनीति को समझना जरुरी है, क्योंकि यही काम हमारे सियासत करने वालों ने किया।
बालियान और मलिक खापें इस इलाके के अन्य जिलों में भी फैली हैं। भाजपा ने भी चुनाव से पहले इस महत्व को समझा और उसने इन दोनों खापों को अपना टारगेट बनाया। अमित शाह को जब यहां भेजा गया, तो उन्होंने दो काम किए, एक तो गढवाला खाप के मुख्य स्पोक्समैन उमेश मलिक को अपने साथ लिया, दूसरा कुटवा-कुटवी के राकेश बालियान को साथ लिया, जो बालियान खाप का है।
राकेश के बारे में बताया जाता है, वह काफी अपराधी किस्म का आदमी है, इसीलिए अक्सर जेल में या जिले के बाहर रहता है, केन्दीय मंत्री संजीव बालियान इन्हीं के रिश्ते में भाई लगते हैं। राकेश के बारे में यह भी बताया जाता है, कि उसके सामने टिकैत परिवार भी कमजोर पड़ जाता है। संजीव बालियान राजनीति में राकेश के कारण ही आए हैं, यहां आने से पहले वे राकेश का ही काम देखा करते थे।
इन दो बड़ी खापों पर पकड़ बनाने के बाद भाजपा ने यहां राजनीति की शुरुआत की। यहां दंगा भड़काने की कोशिश पहले भी की गई, पर सफलता नहीं मिली, जिस लड़की छेड़ने की घटना को दंगे का आधार बनाया गया, उसकी एफआईआर में कहीं भी इस घटना का उल्लेख नहीं है।
इस पूरी घटना में सरकार की जो भूमिका रहनी चाहिए थी, वह भी संदिग्ध है, लगता है, वोटों के बंटवारे को दोनों अपने पक्ष में मान रहे थे, वैसे भी यह इलाका अजीत सिंह का था, सपा को यहां कोई बड़ी सफलता कभी नहीं मिली, इसलिए सपा के पास यहां खोने को कुछ नहीं था। जो हुआ वह सभी को पता है, लगातार नफरत फैलाने की कोशिश की गई, जिसका परिणाम दंगे के रूप में सामने आया।
दंगा करने वाले कितने वीर होते हैं, यह भी मुजफ्फरनगर के दंगों से पता चलता है। जिन लोगों ने 7 सितम्बर को पंचायत से लौट रहे जाटों पर गोलियां चलाई थीं, जिसमें कई जाट मारे भी गए, उनके बारे में बताया जाता है, वे मूला जाट थे, उनके खिलाफ आज तक कोई हिंसा नहीं हुई, जो मुसलमान इन दंगों में मारे गए वे घटनास्थल से काफी दूर के थे और खेत मजदूर थे, जो इन जाटों के खेतों में गन्ना काटा करते थे। अधिकांश हिंसा राकेश बालियान के गांव कुटवा-कुटबी और गढवाला खाप के मुखिया हरकिशन सिंह मलिक के गांव लिसाड़ में हुई।
लिसाड में यह अफवाह फैलाई गई,कि गोलीबारी में हरकिशन बाबा की मौत हो गई है, उसके बाद तेज आवाज में डीजे बजाकर हत्याओं का दौर चलाया गया। डीजे इसलिए बजाया गया, क्योंकि आवाज बाहर न जा सके।
बहरहाल मैं अक्सर सोचता हूं, इन दंगों में किसका फायदा हुआ और किसका नुकसान, उत्तर मिलता है, कुछ नेताओं और पूंजीपतियों का फायदा हुआ और किसानों का नुकसान। इन दंगों को बाद किसान आज तक गन्ना कारखाना मालिकों पर बकाए को लेकर कोई बड़ा आंदोलन नहीं कर सके हैं। सरकार ने इन कारखाना मालिकों को कर्ज भी दिया, पर किसानों का भुगतान नहीं हुआ। गन्ना किसानों को अब खेत में काम करने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं।
किसानों की सबसे बड़ी यूनियन, भारतीय किसान यूनियन इन दंगों के बाद से चार हिस्सों में बंट गई है, मुसलमानों, गुर्जरों व ठाकुरों ने अलग-अलग यूनियन बना लीं। यह वह इलाका था, जहां भूमि अधिगहण के खिलाफ सबसे अधिक आंदोलन किए गए थे, इन दंगों के बाद जब मोदी सरकार जमीन को लेकर अध्यादेश लाई, तो यहां से कोई बड़ी आवाज सुनाई नहीं दी। इन दंगों ने लोगों के दिलों में इतनी बड़ी खाई खींच दी, जिसे भरना नामुमकिन है, यह खाई 47 का बंटवारा और अडवानी की रथायात्रा भी नहीं खींच पाई थी।
भारत शर्मा

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भारत शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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