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यह जनांदोलनों को हाईजैक करने का नया दौर है

हम बाकी जो हैं गिरगिट बने सत्ता में धंस जायेंगे। लक्षण यही है और स्थाईभाव भी यही। अलाप प्रलाप भी वहीं।
पलाश विश्वास
विकास दर का फरेब फिर लबालब है। दो साल में सबसे तेज विकास दर 5.7 अच्छे दिनों की सेंचुरी के बाद सबसे महती मीडिया खबर है। अर्थव्यवस्था पर 75 हजार करोड़ के बोझ के साथ सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग को चूना लगाने के चाकचौबंद इंतजाम और बैंकिंग में निजी क्षेत्र और औद्योगिक घरानों के वर्चस्व के स्थाई बंदोबस्त के बाद आंकड़ा यह है। अर्थव्यवस्था की बुनियाद में लेकिन कोई हलचल नहीं है। बजरिये आधार और नकदी मुक्त प्रवाह से एकमुश्त त्योहारी सीजन में खरीददारी को लंबा उछाला और सब्सिडी खत्म का किस्सा खत्म। डीजल का भाव बाजार दर के मुताबिक है और रिलायंस का बाकी बचा कर्ज उतारने की बारी है। तेल और गैस में सब्सिडी घाटा पाटने के चमत्कार से ही वृद्धिदर में यह इजाफा और रेटिंग एजंसियां बल्ले-बल्ले। खनन, मैनुफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार से चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर उछलकर 5.7 प्रतिशत पर पहुंच गई। पिछले ढाई साल में दर्ज यह सबसे ज्यादा वृद्धि है। वित्त मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अग्रिम कर प्रवाह अवधि को छोड़कर, नकदी की स्थिति संतोषजनक रही है।
इसी बीच शारदा फर्जीवाड़े मामले में मंत्री मदन मित्र से लेकर राज्यसभा सांसद मिथून चक्रवर्ती तक सारे के सारे दिग्गज उज्ज्वल चेहरे अब सीबीआई शिकंजे में हैं तो दीदी लालू नीतीश की तर्ज पर बंगाल में भाजपा विरोधी वाम तृणमूल गठबंधन की गुहार लगा रहे हैं और केंद्र सरकार की सारी पीपीपी परिकल्पनाओं को भी अंजाम दे रही है। डायरेक्ट टेक्स कोड से लेकर जीएसटी और राज्यसभा में समर्थन तक दीदी केसरिया हैं।
इसी बीच शारदा घोटाले में रिजर्व बैंके के चार अफसर और सेबी के तमाम अफसरों के नाम भी सामने आने लगे हैं, जिन तक पैसा पहुंचाया जाता रहा है। मिथून को भी सर्वोच्च शिखर तक जनगण की जमा पूंजी स्थानांतरित करने के आरोप में घेरा जा रहा है।
बंगाल में दीदी से लेकर मदन मित्र सीबीआई के खिलाफ जिहाद के मूड में है और इसी जिहाद की गूंज वाम तृणमूल एकता पेशकश है।
यह दिलचस्प वाकया मुक्त बाजारी अर्थव्वस्था के राजनीतिक तिलिस्म को समझने में बेहद काम का है।
हमारे युवा मित्र सत्यनारायण जी ने फेसबुक पर मार्के की बात लिखी है-

रोजगार छीनो, जीरो अकाउंट खाता खोलो
फिर 5000 का कर्जा दो (उसके लिए आधार कार्ड भी अनिवार्य)
कर्ज वापसी ना करने पर रहे सहे लत्‍ते कपड़े भी छीन लो
और इस तरह हमारे प्रधानमंत्री ने अर्थव्‍यवस्‍था मे उन लोगों की “भागीदारी” सुनिश्चित कर दी है जो सुई से लेकर जहाज बनाते हैं और जिनके दम पर यह सारी अर्थव्‍यवस्‍था है।
इससे बेहतर तस्वीर मैं आंक नहीं सकता। धन्यवाद सत्यनारायण।

आगे सत्यनारायण ने यह भी लिखा हैः

वैसे जोशी आडवाणी वाजेपेयी के साथ जो हो रहा है वो अच्छा ही है। ये लोग फासीवादी राजनीति के मुख्‍य चेहरे थे व अपने सक्रिय कार्यकाल में इन्‍होने जो जो दंगे करवाये (प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष तौर पर), देशी विदेशी लुटेरों को भारत को बेचा (वाजपेयी ने इसके लिये विशेष विनिवेश मंत्रालय बनवाया था), उसके बाद इनके लिए दिल के किसी कोने में सहानुभूति नहीं होनी चाहिए।
फासीवादियों आपस में लड़ो, एक दूसरे को नंगा करो, हमारी “दुआएं” भी तुम्‍हारे साथ हैं।

यह गौरतलब है खासकर इस संदर्भ में देश बेचो अभियान, हिंदू राष्ट्र का अश्वमेधी अभियान तो स्वदेशी का छद्म भी उन्हीं का। ऐसा हम पिछले 23 साल से नाना प्रकार के विदेशी वित्त पोषित जनांदोलनों में देखते रहे हैं, जो जल जंगल जमीन नागरिकता और प्रकृति और पर्यावरण की बातें खूब करते हैं, सड़क पर उतरते भी हैं प्रोजेक्ट परिकल्पना के तहत, लेकिन होइहिं सोई जो वाशिंगटन रचि राखा।
इन फर्जी जनांदोलनों से वर्गों का ध्रुवीकरण लेकिन नहीं हुआ है और न इनका कोई प्रहार जनसंहारक राज्यतंत्र पर है किसी भी तरह।हर हाल में बहुराष्ट्रीय कारपोरेट हित ही साधे जाते हैं, क्योंकि दरअसल असली कोई जनांदोलन है ही नहीं।
केसरिया कारपोरेट उत्तरआधुनिक मनुस्मृति नस्ली राजकाज का सार जो न्यूनतम सरकार, अधिकतम प्रशासन है, यह मनुस्मृति का तरह ही दरअसल एक मुकम्मल अर्थव्यवस्था है।
हिंदू राष्ट्र के झंडेवरदार जो हैं वहीं अब जनांदोलनों के धारक वाहक भी। पुरातन गैरसरकारी संगठनों के नेटवर्क में बारुदी सुरंगें बसा दी गयी हैं क्योंकि उस छाते की आड़ में भारी संख्या में प्रतिबद्ध और सक्रिय लोग भी हैं।
अब सीधे प्रधानमत्री कार्यालय से जुड़ा केसरिया एनजीओ नेटवर्क का आगाज है तो संघ परिवार की तमाम शाखाएं किसान, मजदूर, छात्र, मेधा संगठनों की ओर से अखंड जाप स्वदेशी का हो रहा है।
इसी स्वदेशी का मूल मंत्र लेकिन फिर वही हिंदी हिंदू हिंदुस्तान का वंदेमातरम है।
वे विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और जीएम बीजों का विरोध कर रहे हैं तो विनिवेश और बेदखली का भी। यह जनांदोलनों को हाईजैक करने का नया दौर है।जिसे मीडिया स्वदेशी सूरमाओं का धर्मयुद्ध बतौर खूब हाई लाइट कर रहा है।
समावेशी विकास कामसूत्र की ये मस्त धारियां हैं, इसके सिवाय कुछ नहीं। जैसे हमारे पुरातन सीईओ शेखर गुप्ता महामहिम का वैज्ञानिक केसरिया चंतन मनन लेखन है वैसा ही इतिहास बोध है हिंदुय़ाये तत्वों का जो इतिहास भूगोल वे नये सिरे से गढ़ने पर आमादा हैं।
फासीवादी दरअसल आपस में लड़ते नहीं है। लड़ाई सिर्फ संसदीय राजनीति की नौटंगी का अहम हिस्सा है और वे अपने एजेंडे के बारे में सबसे प्रतिबद्ध लोग हैं तो हम अलग अलग द्वीप हैं, जिनके बीच कोई सेतुबंधन नहीं है क्योंकि सारे के सारे बजरंगवली तो उन्हीं के पाले में हैं।
आज सुबह अखबार पढ़ने के बाद मोबाइल टाकअप के लिए मित्र की दुकान पर गया तो वहां एक करिश्माई चिकित्सक के दर्शन हो गये, जो वृद्धावस्था में अपने सारे बाल नये सिरे से उगाने में कामयाबी का दावा कर रहे थे। वे प्राकृतिक चिकित्सक हैं और निःशुल्क चिकित्सा करते हैं। मुहल्ले में उन्होंने पचास लाख टकिया फ्लैट खरीदा है और स्वयंसेवक हैं। उन्होंने भारत दर्शन का प्रवचन भी सुनाया। उनकी आमदनी के बारे में पूछा तो बोले बेटी कांवेंट हैं, सारी भाषाएं जानती हैं और खूब कमा रही हैं। वे सारे रोग निर्मूल करने का प्राकृतिक स्वदेशी निदान बांटते फिर रहे हैं। उनका कामकाज और नमो महाराज का राजकाज मुझे पता नहीं क्यों समानधर्मी लग रहा है। करिश्मे और चमत्कार के तड़के में स्वदेशी और आमदनी विदेशी।
संजोग से सांप्रदायिक राजनीति, द्विराष्ट्र सिद्धांत की मौलिक मातृभूमि बंगाल में ऐसे तत्वों की बाढ़ आ गयी है और देश भर में पद्मप्रलयभी सबसे तेज यही है और गुजराती पीपीपी माडल के कार्यान्वयन में भी बंगाल सबसे आगे। आर्थिक सुधारों को लागू करने में, सब कुछ विनियमित विनियंत्रित करने में बंगाल जो कर रहा है, मोदी सरकार उसके पीछे पीछे है।
हाल में एक्सकैलिबर स्टीवेंस ने लिखा कि बंगाल में माकपा और तृणमूल गठजोड़ का इंतजार है लोगों को, तो धुर मार्क्सवादियों ने लिखा, ऐसा कभी नहीं होगा।
मजा यह है कि बंगाल में लाल का नामोनिशान मिटाने पर अमादा, वामासुर वध करने वाली बंगाल की महिषमर्दिनी देवी का अब जैसे सेजविरोधी आंदोलन से पीपीपी गुजराती कायकल्प हुआ है,उ सी तरह मोदी केसरिया विरुद्धे अपनी जिहाद में वे अब लालू नीतीश की तर्ज पर बंगाल में संघ परिवार की बढ़त के लिए माकपा से गठबंधन बनाने की सार्वजनिक पेशकश कर दी। जाहिर है कि पत्रपाठ माकपाइयों ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है।
बंगाल में इन दिनों सीबीआई का जाल भयंकर है। सारी हस्तियां चंगुल में है। नेता, मंत्री, सांसद, स्टार, मेगा स्टार, मैदान, उत्सव सबकुछ माइक्रोसेकोप की निगरानी में हैं।
दीदी का मोदी के खिलाफ जिहाद दरअसल सीबीआई के खिलाफ जिहाद है। उनके सारे सिपाहसालार घिरते जा रहे हैं। शह मात की बारी बस बाकी है। आखिरी चाल में मात खाने से पहले वे तिनके के सहारे में मंझधार में हैं और तिनके को इस डूब की परवाह है नहीं।
इस प्रलय परिदृश्य में जबकि खतरों में घिरे हैं वाम तृणमूल शिविर और केंद्र की केसरिया शिविर रोजगार का पार्टीबद्ध इंतजाम से कैडरतंत्र का अपहरण करने लगा तो ना-ना करते-करते कब मुहब्बत का इकरार हो जाये, देखना यही बाकी है।
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About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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