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यूपी की राजनीति को गुजरात सरीखा समझ भारी गलती कर रहे मोदी

लोकसभा चुनाव – मुख्य मुद्दे महँगाई और भ्रष्टाचार
मुज़फ्फरनगर की साम्प्रदायिक हिंसा से समाजवादी पार्टी को राजनीतिक नुकसान हुआ है
शेष नारायण सिंह
लोकसभा चुनाव 2014 की तारीखों की घोषणा के साथ सोलहवीं लोकसभा के गठन और उसकी ताक़त के आधार पर बनने वाली सरकार की बाकायदा शुरुआत हो गयी है। इन चुनावों में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों का बहुत महत्व है। भाजपा ने सत्ता में आने के लिये सब कुछ दांव पर लगा दिया है। उनकी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में कई सभाएं की हैं और लखनऊ की अपनी सभा में उन्होंने अपने श्रोताओं को बताया कि देश में उनके पक्ष में तूफ़ान चल रहा है और आने वाले वक़्त में यह तूफ़ान सुनामी में बदल जायेगा। उनको उम्मीद है कि उतर प्रदेश से भाजपा को बड़ी संख्या में सीटें मिलेंगी। प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के सपने को सच्चाई में बदलने के लिये ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश में पचास से अधिक सीटें आयें। लोकसभा चुनाव 2009 में उत्तर प्रदेश से भाजपा को दस सीटें मिली थीं और वह चौथे स्थान पर थी। इस साल पहले नम्बर पर आना और 50 या उस से अधिक सीटें हासिल करना बहुत कठिन है लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है उसमें कुछ भी असंभव नहीं होता। इसी उम्मीद में नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में सुनामी के सपने देख रहे हैं जिसमें कुछ भी गलत नहीं है। अपने सपने को साकार बनाने के लिये उन्होंने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पर अपने ट्रेड मार्क हमले के अलावा सत्ताधारी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पर भी हमला बोला और कहा कि उत्तर प्रदेश की यह दोनों ही पार्टियाँ वास्तव में कांग्रेस की समर्थक पार्टियाँ हैं इसलिये इनको भी कांग्रेस के काम में बराबर का हिस्सेदार माना जाना चाहिए।
लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नरेंद्र मोदी की तर्क पद्धति को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि इस बात में दो राय नहीं है कि कांग्रेस ने देश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है और बेहिसाब महँगाई की स्थिति पैदा किया है लेकिन उसमें उनकी पार्टी का कोई योगदान नहीं है। अखिलेश यादव ने कहा कि इस चुनाव में बहुत सारे मुद्दे हैं लेकिन महँगाई और भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दे हैं। उनकी पार्टी ने कांग्रेस को समर्थन महँगाई और भ्रष्टाचार लाने के लिये नहीं दिया, कांग्रेस का समर्थन साम्प्रदायिक ताक़तों को काबू में रखने के लिये ही किया गया था। मौजूदा चुनाव में भी धर्म निरपेक्षता एक बड़ा मुद्दा है और उतर प्रदेश के लोगों को यह बात बखूबी पता है। इस बार का लोकसभा का चुनाव समाजवादी पार्टी विकास और धर्म निरपेक्षता के मुद्दे पर लड़ेगी।
अखिलेश यादव ने नरेंद्र मोदी के इस दावे को कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के पक्ष में कोई माहौल बना हुआ है, बिलकुल फर्जी बताया और कहा कि उत्तर प्रदेश की तुलना गुजरात से नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी उतर प्रदेश की सच्चाई को समझे बिना उल जलूल दावे कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति को गुजरात की राजनीति समझ कर नरेंद्र मोदी भारी राजनीतिक भूल कर रहे हैं और चुनाव के बाद उनको पता चलेगा कि कहीं भारी गलती हो रही थी।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा कि नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश में मेहमान की तरह आये हैं और उनको राज्य की राजनीति के बारे में कुछ पता नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी हर भाषण में विकास की बात कारते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में उनकी राजनीति धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने की है और उसके लिये उनकी पार्टी हर स्तर पर कोशिश कर रही है। भाजपा को उत्तर प्रदेश में हालात बिगाड़ने में आर एस एस का पूरा सहयोग मिल रहा है।
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि भाजपा के एक विधायक ने अफगानिस्तान का एक वीडियो क्लिप लगाकर मुज़फ्फर नगर में दंगा करवाया और भाजपा ने उस दंगे को हवा दी। भाजपा और आर एस एस ने झांसी में भी इसी तरह की स्थिति पैदा करने की कोशिश की। लेकिन उसकी जानकारी मिल गयी और उसे रोक दिया गया वरना वहां भी मुज़फ्फरनगर जैसी हालात पैदा करने की साज़िश बन चुकी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब भाजपा अपने राजनीतिक लाभ के लिये कर रही है।
अखिलेश यादव का दावा है कि सारे प्रचार और टेलिविज़न के ज़रिये बनाये गये माहौल के बावजूद भाजपा की सरकार बन पाने की कोई सम्भावना नहीं है। उन्होंने कहा कि 1996 जैसे हालात बन रहे हैं जहाँ भाजपा सरकार गैर कांग्रेस और गैर भाजपा पार्टियों की बनेगी। कांग्रेस को चाहिए की साम्प्रदायिक ताक़तों को बाहर रखने के लिये वह समाजवादी पार्टी की अगुवाई वाली सरकार को बाहर से समर्थन दे जैसे 1996 में किया था। यह अलग बात है कि 1996 में सरकार का नेतृत्व समाजवादी पार्टी ने नहीं किया था लेकिन यह भी सच है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उस पार्टी में बहुत ही महत्वपूर्ण रक्षा मंत्रालय के इंचार्ज थे।
इस बात में दो राय नहीं है कि धर्म निरपेक्षता उत्तर प्रदेश में एक अति महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा है। इस बात में भी दो राय नहीं है की पिछले 25 वर्षों से मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के सर्वमान्य नेता रहे हैं लेकिन इस बार हालात वैसे नहीं हैं। मुज़फ्फरनगर में हुये दंगों की सच्चाई इस बार मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी पर भारी पड़ रही है। आम तौर पर माना जा रहा है कि मुज़फ्फरनगर में हिंसक घटनाओं के दौरान समाजवादी पार्टी की सरकार ने ऐसे लोगों को राजनीतिक संरक्षण दिया जो मुसलमान होने के बावजूद आदरणीय व्यक्ति नहीं थे। उनके कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सरकार और समाजवादी पार्टी की पोजीशन कमज़ोर हुयी। आम तौर पर माना जा रहा है कि अब तक मुसलमानों के सर्वमान्य नेता के रूप में बने एमुलायम सिंह यादव की छवि को मुज़फ्फरनगर ने कमज़ोर किया है।
2012 के विधान सभा चुनावों में बहुत मजबूती से साफ़ हो गया था कि उत्तर प्रदेश का मुसलमान और राज्य की धर्मनिरपेक्ष जनता मुलायम सिंह यादव के साथ थी। उत्तर प्रदेश में बहुत साल बाद पहली बार स्पष्ट बहुमत की सरकार 2007 में बनी थी जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन गयी थीं। पांच साल तक उन्होंने एकछत्र राज किया जिसका नतीजा यह हुआ कि जनता ऊब गयी और उसने 2012 में उनकी धुर विरोधी समाजवादी पार्टी को सत्ता सौंप दी। समाजवादी पार्टी की साफ़ जीत में मायावती की अलोकप्रियता एक महत्वपूर्ण कारण था लेकिन स्पष्ट बहुमत की सरकार के गठन में राज्य के मुसलमानों का योगदान बहुत ज़्यादा है। पूरे राज्य में मुसलमानों ने एकजुट होकर समाजवादी पार्टी को वोट दिया था। ऐसा शायद इसलिये था कि मायावती के बारे में सबको मालूम है कि 2007 के पहले वे जब भी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं, उनको आर एस एस और भाजपा ने ही समर्थन किया था। 2012 में भी चर्चा थी कि अगर कुछ सीटें कम पड़ गयीं तो मायावती को भाजपा सत्ता तक पहुँचा सकती थी। ज़ाहिर है राज्य की धर्मनिरपेक्ष ताक़तों के सामने इस बार डबल चुनौती थी। एक तो यह कि भाजपा को सत्ता से बाहर रखना है और दूसरा कि मायावती को भी सत्ता से बेदखल करना है क्योंकि अगर इस बार मायावती भाजपा के समर्थन से सत्ता में आयीं तो साम्प्रदायिक ताक़तों को ज़बरदस्त उछाल मिलेगा और इस बात की आशंका चारों तरफ थी कि कहीं गुजरात के 2002 जैसा माहौल न बनाया जाये। इसका कारण यह है कि भाजपा में जो थोड़े बहुत लिबरल नेता हैं वे हाशिये पर हैं और पार्टी के एक बड़े ताक़तवर वर्ग ने तय कर रखा था कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ही पार्टी का मुख्य नेता बना दिया जाये। उन दिनों भी यह चर्चा थी कि लाल कृष्ण आडवाणी नहीं, नरेंद्र मोदी को ही भाजपा वाले प्रधान मंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश करेगें। आज यह शक वास्तविकता में बदल चुका है।
साम्प्रदायिकता के इस माहौल में उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव हुआ था। साम्प्रदायिकता विरोधी सभी ताक़तों ने समाजवादी पार्टी को वोट दिया। मुसलमानों ने भी लगभग एकमुश्त समाजवादी पार्टी को समर्थन किया। लेकिन उस के बाद की राजनीतिक दिशा इस तरह से चल पडी कि समाजवादी पार्टी और उसकी सरकार का भारी राजनीतिक नुक्सान हुआ। लगभग हर शहर में ऐसे बहुत सारे मुसलमान पाये जाने लगे जो यह दावा करते थे कि वे ही मुसलमानों के असली नेता थे और उनकी वजह से ही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी है। समाजवादी पार्टी के लगभग दो वर्षों में ऐसे बहुत सारे नेताओं से मुलाक़ात हुयी।
एक धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में मुलायम सिंह यादव की पहचान 1984 के बाद से बनना शुरू हुयी। जब भाजपा और आर एस एस ने 1984 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से हार के बाद हिंदुत्व को अपनी राजनीति का स्थायी भाव बनाने का फैसला तो सब कुछ बदल गया। उसी दौर में बाबरी मस्जिद का मुद्दा पैदा किया गया, विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल को चुनावी संघर्ष का अगला दस्ता बनाया गया और गाँव-गाँव में साम्प्रदायिक दुश्मनी का ज़हर घोलने की कोशिश की गयी। नतीजा यह हुआ कि 1989 में सीटें बढ़ीं। बाबरी मस्जिद के हवाले से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होता रहा और भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उभरी। उस दौर में कांग्रेस ने भी अपने धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से बहुत बड़े समझौते किये। आर एस एस और भाजपा के उस विभाजक दौर में उत्तर प्रदेश में उनको पुरानी धर्मनिरपेक्ष पार्टी, कांग्रेस से कोई चुनौती नहीं मिली लेकिन जब 1989 के चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव ने सत्ता संभाली तो साम्प्रदायिक ताक़तों को हर मुकाम पर रोकने की राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हो गयी। उसी दौर की राजनीति में गाफिल पाये जाने के कारण ही उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक पार्टी के रूप में कांग्रेस पूरी तरह से हाशिये पर आ गयी। मुलायम सिंह यादव ने अपने आपको एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में पेश किया और आज तक उसी कमाई के सहारे राज्य की राजनीति में उनकी पार्टी का दबदबा बना हुआ है। मुलायम सिंह यादव की इस छवि का लाभ उनकी पार्टी को अब तक मिलता रहा है लेकिन मुज़फ्फरनगर के दंगों के बाद हालात बदल गये हैं। अब मुसलमान उनसे नाराज़ है। हालांकि इस बात की पूरी संभावना है कि वह एक बार मुलायम सिंह के साथ फिर चला जाये और उनकी पार्टी के मज़बूत पार्टी के रूप में 2014 के बाद उभरे।लेकिन फिलहाल हालात साफ़ नहीं हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि लोकसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी धर्म निरपेक्ष राजनीति की मुख्या पार्टी बन पाती है या मुज़फ्फरनगर की राजनीतिक गलती उनके लिये मुश्किल साबित होती है। अगर राज्य की धर्मनिरपेक्ष जनता और मुसलमान 2014 के चुनाव में मुलायम सिंह के साथ शामिल हो गये तो नरेंद्र मोदी के सपने में ग्रहण लग सकता है।

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