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यूपी में कोई ऐसा नहीं जो पिछड़ों को ठगेगा नहीं

फिर ठगे जाएंगे पिछड़े ?

2012 उत्तर प्रदेश की सियासत में कई नए रंग भर रहा है। यूपी में ही नहीं बल्कि हर राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग तादाद के लिहाज से एक बड़ा वर्ग है लेकिन अन्य राज्यों की तरह यहां भी सारे पिछड़े किसी एक दल के साथ लामबन्द नहीं रहते हैं। प्रदेश में मुख्य मुकाबले में मानी जा रही सभी पार्टियों ने एक सुर में इस बार पिछड़ों का राग गाया है। आश्चर्य यह है कि कांग्रेस (Congress) ने भी पिछड़ों को बड़ी संख्या में गले लगाया है जबकि पिछड़े परंपरागत रूप से यहां कांग्रेस के खिलाफ ही मत देते रहे हैं और सभी गैर कांग्रेसी सियासी आंदोलनों को खाद पानी पिछड़ों से ही मिलता रहा है। पिछड़ों की राजनीति की वकालत करने वाली समाजवादी पार्टी की तरफ से मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव दम भर ही रहे हैं। भाजपा ने भी हिन्दुत्व की फायरब्राण्ड नेत्री उमा भारती का पिछड़ाकरण कर दिया है। कांग्रेस में पुराने समाजवादी बेनी प्रसाद वर्मा पिछड़ों का झण्डा थामे हुए हैं तो बहुजन समाज पार्टी की तरफ से भी स्वामी प्रसाद मौर्या और नरेंद्र कश्यप को पिछड़े नेतृत्व के रूप में बढ़ाया जा रहा है।

प्रदेश में पिछड़ों की राजनीति आजादी के बाद से ही परवान चढ़ने लगी थी लेकिन जब सोशलिस्ट पार्टी ने साठ के दशक में ‘संसोपा ने बांधी गांठ/ पिछड़े पावें सौ में साठ’ का नारा दिया तब पिछड़े एक वोट बैंक के रूप में पहचान पाने लगे।     

कांग्रेस के खिलाफ ‘गैरकांग्रेसवाद’ का नारा भी मूलतः पिछड़ावाद ही था लेकिन इस पिछड़ेवाद की राजनीति को सही धार चौधरी चरण सिंह ही दे सके, जो मूलतः कांग्रेस से ही निकले थे, बड़े किसान थे और समाजवादी नहीं थे (कम से कम लोहियावादी तो नहीं ही थे)।

एक समय था जब हिंदी पट्टी के सात राज्यों में चरण सिंह का दखल रहता था और उनका ‘अजगर’ समीकरण यानी अहीर, जाट, गूजर और राजपूत, कांग्रेस के खिलाफ ही रहता था। लेकिन सत्ता की लड़ाई में पिछड़े मुख्य भूमिका में राजा माण्डा वीपी सिंह के कारण ही आ सके।

मज़ेदार बात यह है कि पिछड़ों की राजनीति का नारा बुलन्द करने वाले डाॅ. राम मनोहर लोहिया और वीपी सिंह दोनों ही पिछड़े नहीं थे। लोहिया जहां सवर्ण वैश्य थे वहीं राजा माण्डा वीपी सिंह तो क्षत्रिय ठाकुर थे और क्षत्रियों की सहानुभूति के वोट पाकर ही दिल्ली दरबार की सबसे मजबूत कुर्सी तक पहुंचे थे। अहम बात यह है कि दोनों की ही राजनीति में नेहरू-गांधी परिवार से निजी स्तर पर रंजिशें थीं जिन्हें सियासी नारों का मुलम्मा चढ़ाया गया था। डाॅ. लोहिया अगर स्वयं को पं. नेहरू से ज्यादा प्रधानमंत्री पद के योग्य समझते थे तो वीपी सिंह तो राजीव गांधी को अपदस्थ करके प्रधानमंत्री बनने में कामयाब भी रहे।

राजा माण्डा ने चौधरी देवीलाल को परास्त करने के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का जो दांव चला था उससे ताऊ तो चित्त हो ही गए लेकिन भारतीय राजनीति खासकर हिंदी पट्टी की राजनीति में जबर्दस्त बदलाव आया। यह मंडल का ही दबाव था कि 1991 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में लगभग आठ दर्जन विधायक ब्राह्मण होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने पिछड़े वर्ग के कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया।

तमाशा यह है कि जब मंडल लागू हुआ तो सवर्ण छात्रों को आत्मदाह के लिए उकसाने वाले और आरक्षण विरोधी आंदोलनों को हवा देने वाले भगवा खेमे के लोग ही थे और जब सत्ता पाने की बारी आई तो उन्हें भी पिछड़े याद आ गए। भाजपा मूल रूप से सवर्ण वर्चस्व वाली पार्टी ही है।

रएसएस में तो रज्जू भैया और सुदर्शन जी को छोड़कर सभी सरसंघचालक महाराष्ट्र के चित्पावन ब्राह्मण ही होते रहे हैं। इसलिए कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बनाए जरूर गए लेकिन उनकी छवि पिछड़े नेता की नहीं बल्कि हिन्दुत्व के झण्डाबरदार की बनाई गई। पिछड़ों के नेता की उनकी छवि तभी बन सकी जब वे भाजपा से बाहर किए गए और विधानसभा चुनाव में उनकी बिरादरी के लोगों ने भाजपा को वोट न देकर कल्याण के दल राष्ट्रीय क्रांति पार्टी को वोट दिया।

केवल कल्याण सिंह ही नहीं विनय कटियार, उमा भारती और नरेंद्र मोदी भी भाजपा के पिछड़े नेता हैं लेकिन किसी की भी छवि पिछड़े नेता की नहीं है बल्कि हिन्दुत्व के झण्डाबरदार की ही है।
जब कल्याण सिंह को निपटाने की बारी आई उस समय भी भाजपा को ओमप्रकाश सिंह, विनय कटियार या नैपाल सिंह जैसा कोई पिछड़ा नज़र नहीं आया बल्कि कहीं किसी कोने में छिपे हुए स्वयंसेवक रामप्रकाश गुप्ता मुख्यमंत्री बनाए गए और बाद में पांच बार अपने ही घर में चुनाव हारे राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बनाए गए। आज भी उमा भारती उछल कूद कितना ही मचा रही हों लेकिन कल को यदि मुख्यमंत्री बनने की बारी आई (जो आएगी नहीं) तो नंबर उमा का नहीं राजनाथ और कलराज मिश्र का होगा। और इस विषय में कलराज मिश्र तो खुलकर बोल ही चुके हैं कि उमा बाहरी हैं। इतना ही नहीं बसपा से बाहर किए गए पिछड़े नेता बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा ने गले तो बड़े शौक से लगाया लेकिन बाद में उसका सवर्ण मानसिकता वाला हिन्दुत्व जाग गया और उनका प्रवेश अधर में लटक गया। सवाल यह है कि कुशवाहा को अगर पिछड़े नेता के तौर पर भाजपा ने लिया था तो आखिर ऐसी कौन सी मुसीबत आन पड़ी कि उनकी सदस्यता भी स्थगित करनी पड़ी?

भाजपा को ही दोष क्यों?

समाजवादी पार्टी तो डाॅ. लोहिया और चरण सिंह की राजनीति की स्वयंभू वारिस है। लेकिन वहां भी दबदबा सिर्फ यादवों का ही है। अन्य पिछड़े नेता तो शो केस में रखे शो पीस की तरह हैं। क्या कारण है कि सपा की तरफ से मुख्यमंत्री के तौर पर कभी भी किसी पिछड़े का नाम नहीं आया है? क्यों मुलायम या अखिलेश ही इसके उम्मीदवार हैं। रामआसरे विश्वकर्मा, बाल कुमार पटेल, धर्मेंन्द्र कश्यप, नरेश उत्तम या विशंभर प्रसाद निशाद क्यों नहीं मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो सकते? यही कारण है कि सपा भी यादवों की पार्टी बनकर रह गई पिछड़ों की पार्टी नहीं बन पाई। पिछड़े नेताओं की सपा सरकार में हालत यह थी कि पिछड़े वर्ग से आने वाले कैबिनेट मंत्री को उसके निर्वाचन क्षेत्र की पुलिस चौकी का यादव सिपाही हड़का देता था।

बसपा भी ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा देती रही है। लेकिन हिस्सेदारी आज तक दी नहीं। वहां भी नेता तो हैं लेकिन चलती नसीमुद्दीन और सतीश मिश्रा की है। उसका भी इतिहास है कि उसके हर प्रदेश अध्यक्ष का निष्कासन हुआ है जिसमें अधिकांश पिछड़े नेता ही थे। अब खबर है कि बसपा यदि भाजपा से गठबंधन की नौबत आए और मायावती के नाम पर सहमति न बन पाए तो पिछड़े का दांव चलने के लिए अपने राज्यसभा सांसद नरेंद्र कश्यप को अन्दरूनी तौर पर विकल्प के रूप में मुख्यमंत्री के तौर पर पेश कर सकती है।

मजे की बात यह है कि जो लोग या जिनके सियासी पुरखे गैर कांग्रेसवाद और पिछड़ों की राजनीति के अलंबरदार रहे वही आज कांग्रेस के साथ खड़े हैं और सपा भाजपा और भाजपा के पिछड़ेवाद की हवा निकाल रहे हैं। कांग्रेस ने भी पिछड़ों को भारी संख्या में गले लगाया है। मोहन प्रकाश, बेनीप्रसाद वर्मा और राजबब्बर कांग्रेस की धार को हवा दे रहे हैं। जबकि चौधरी चरण सिंह के साहेबजादे चौधरी अजित सिंह और नाती जयंत चौधरी पिछड़ों का हाथ राहुल गांधी के साथ का नारा बुलंद कर रहे हैं।

अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या सत्ता में आने की बारी आती है तो क्या भाजपा उमा भारती को यूपी का ताज सौंपेगी जिनसे उसने मध्य प्रदेश का ताज छीनकर बाबू लाल गौर और शिवराज सिंह चैहान को दे दिया था? या बहन जी का दांव चला तो क्या वह नरेंद्र कश्यप या स्वामी प्रसाद मौर्या के लिए अपना दिल बड़ा कर पाएंगी? या पिछड़ों की राजनीति के मुखिया मुलायम सिंह पुत्रमोह छोड़कर किसी अन्य पिछड़े को चार दिन ही मुख्यमंत्री बन लेने देंगे?

और सवाल कांग्रेस से भी! क्या दो दशक बाद यूपी में लौटने की बारी आई तो बेनी बाबू या किसी अन्य पिछड़े के साथ कांग्रेस का हाथ होगा? या कमान किसी जितिन प्रसाद, श्री प्रकाश जायसवाल या रीता बहुगुणा के हाथों होगी? और अगर इतना बड़ा दिल किसी का नहीं है तो यक्ष प्रश्न यह है फिर किसलिए पिछड़े-पिछड़े का खेल खेला जा रहा है? क्या फिर पिछड़े ठगे जाएंगे? क्या सिर्फ जनता के असल मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए ही अगड़े-पिछड़े का खेल खेला जा रहा है?

-अमलेन्दु उपाध्याय

About अमलेन्दु उपाध्याय

अमलेन्दु उपाध्याय, लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वे hastakshep.com के संस्थापक/ संपादक हैं।

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