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ये गलियों के आवारा कुत्ते बनाम पशुप्रेमियों का अतिवाद

ये फैज़ की गज़ल के गलियों के वो आवारा, बेकार कुत्ते नहीं हैं जिन्हें ज़ौक-ए-गदाई बख्शा गया है या जिनका सरमाया ज़माने की फटकार और जिनकी कमाई जहां भर की दुत्कार है, ये अपने इलाके के दबंग, बेखौफ और दादा किस्म के कुत्ते हैं जो हर गली, हर मोड़, चौराहे और बाज़ार में आपको किसी संगठित गिरोह की शक्ल में नज़र आ जाएंगे। इनमें से कभी किसी एक का भी माजी सटक गया तो समझो आपकी खैर नहीं।
यूं तो ये अकेले भी दस-बीस पर भारी हैं लेकिन ये अकेले भी नहीं हैं इनके कुछ देसी शुभचिंतक भी हैं जिनकी डोर विदेशी हाथों में हैं। एक खास प्रजाति के ये लोग ‘नाच मेरी बुलबुल के पइसा मिलेगा’ की तर्ज पर पशुओं के समर्थन और उनके प्रति अगाध प्रेम प्रदर्शित करने के लिए ही अपना मुंह खोलते हैं। कोई इंसान रेबीज़ से मर जाए या नोंच-नोंच कर खा लिया जाए इनकी बला से। इनके लिए यह मौका अपना नाम और शोहरत चमकाने का होता है। जब भी कोई ऐसा हादसा पेश आता है और लोग जानवरों के कहर से छुटकारा पाने के लिए आवाज़ उठाते हैं तो ऐसे लोग अपनी पूरी विद्वता, अपना ज्ञान, अपनी प्रतिभा सब कुछ दावं पर लगाकर पशुओं के प्रति अपना प्रेम दर्शाने में लगा देते हैं। कोई बन्दर किसी को मार कर चला जाए या कोई पागल कुत्ता किसी को काट जाए, इनकी बला से। मगर उत्पाती, उपद्रवी जानवरों और इंसानों की खास प्रजाति का यह गठबंधन सरकार, उसके पूरे लाव-लश्कर, फौज, पुलिस पर ही भारी नहीं है बल्कि कभी-कभार हमारे न्याय मंदिरों पर भी इसका सम्मोहन काम कर जाता है।
मगर साहब यहां मामला मात्र व्यंग्य और हंसी-ठठ्ठे का नहीं है, बल्कि समस्या इससे कहीं ज्यादा गंभीर है। आप रोज़ सुबह ठीक-ठाक घर से निकलो लेकिन घर वापसी सही सलामत हो इस बात की कोई जमानत नहीं। खासतौर पर अगर आप हिमाचल की राजधानी शिमला में रहते हों। किस मोड़ पर बन्दर आप पर झपटा मार दे या कोई लंगूर आपको धक्का देकर चला जाए, किस गली में कुत्ता आपको काटने के लिए दौड़ पड़े आप नहीं जानते। बच्चों का स्कूल आना-जाना, बुजुर्गों का सैर पर निकलना, महिलाओं का बाज़ार जाना, मरीज़ों का अस्पताल पहुंचना, नौकरीपेशा या दूसरे लोगों का काम पर निकलना सब कुछ अनिश्चितता और एक अजीब, अनजान डर के साये में चल रहा है। बन्दरों का आतंक तो था ही अब आवारा कुत्तों ने भी लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। अभी चार महीने भी नहीं गुज़रे होंगे जब 50 से ऊपर लोग आवारा कुत्तों के कहर के शिकार हुए थे कि फिर से यह संख्या 49 पहुंच चुकी है और हैरत नहीं कि लेख छपते-छपते संख्या 50 का आंकड़ा पार कर जाए। इस बीच रामपुर से तेंदुए के हमले से बच्ची के घायल होने और चम्बा से बन्दर के हमले से भी बच्ची घायल होने की खबरों को भी अखबारों के कोने जगह मिली है।
मसला सिर्फ एक शहर या एक मौके का भी नहीं है यह देश के किसी भी शहर या गांव का है। हिमाचल में ही फरवरी महीने में सोलन जिला में पागल कुत्ते का कहर बरपा था। 2012 में पंजगांईं गांव की 63 वर्षीय गीता देवी को किसी छोटे कुत्ते ने नाखूनों से खरोंच लगाई और उसे रेबीज़ हो गई थी। अखबारों को उठाकर देखा जाए या इंटरनेट में खंगाला जाए तो ऐसी ढेरों खबरें आपको मिल जाएंगी। बन्दरों और लंगूरों का शिकार हुए कितने ही लोग जान गवां चुके हैं और कितने आजीवन अपाहिज होने का दंश झेल रहे हैं। शिमला शहर को यह ज़ख्म पिछले नवम्बर में ही मिला जिसमें बन्दरों के हमले ने शहर में रहने वाली 38 साल की महिला ममता सचदेवा की जान चली गई। देश की राजधानी दिल्ली का वह हादसा भी लोगों के ज़ेहन से उतरा नहीं होगा जिसमें बन्दरों के हमले ने दिल्ली नगर निगम के उप-महापौर की जान चली गई थी।
हमारे लिए इस बात को समझना मुश्किल हो रहा है कि हमारी सरकारें इन हादसों के प्रति क्या लापरवाह हैं, असंवेदनशील हैं या फिर इतनी कमज़ोर हैं कि चंद पशु प्रेमियों से घबराकर ऐसे हादसे रोकने के लिए कोई ठोस फैसला ही नहीं ले पा रही हैं।
पशु प्रेमियों का अतिवाद आम आदमी को किस हद तक खतरे में डालेगा, कहना मुश्किल है। कानून ने आम आदमी के हाथ में जनहित याचिका का एक हथियार दिया था ताकि आम गरीब आदमी भी न्याय से वंचित न रहे। उसके हक में अगर वह खुद नहीं तो कोई जागरूक नागरिक न्याय का दरवाज़ा आसानी से खटखटा सके लेकिन जनहित का यह हथियार ‘बन्दर के हाथ में

उस्तरा’ की तरह ऐसे लोगों के काम आ रहा है जो इसका इस्तेमाल जनहित में कम और जनता को परेशान करने में ज्यादा कर रहे हैं। ऐसे लोगों ने इस बहुत ही महत्वपूर्ण हक को अपने मनोरंजन और खुरापात का ज़रिया बना दिया है। और कुछ न सूझा तो कह दिया कि झोटों की लड़ाई बन्द करवा दी जाए क्योंकि यह उनके साथ हिंसा है।
खुद कभी झोटों को लड़ते हुए देखा हो तो पता चले कि भई ये कोई खूनी लड़ाई नहीं है बल्कि दो मिनट के अन्दर होने वाली पहलवानी है। ऐसे तो फिर कुश्ती को भी बंद करवा देना चाहिए उसमें भी कष्ट तो होता ही है। लेकिन उन्हें तो अपना नाम उन महान लोगों की सूची में शामिल करवाना है जिन्होंने निरीह जीवों के हक में अपने को न्योछावर किया है। कोई परम्परा मिटती है, लोगों की सांस्कृतिक धरोहर लुप्त होती है, इससे उन्हें कोई वास्ता नहीं है।
इस समय तेजी से सक्रिय होती जा रही अतिवादी पशुप्रेमी और पर्यावरण प्रेमियों की दो खास किस्म की मानवीय प्रजातियों की प्रसंगिकता और इनकी कारगुज़रियों पर लम्बी बहस छेड़े जाने की दरकार है कि इनके अतिवाद और अतिसक्रियतावाद से मानवीय हित और अहित पर क्या असर हो रहा है।
जीयानन्द शर्मा
सामाजिक कार्यकर्ता, स्तम्भकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकर

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