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ये झूठ तो संघ परिवार ने फैलाया कि बुद्धिजीवियों ने देश को असहिष्णु कहा

असहिष्णुता की खेती के दौर में
देश असहिष्णु नहीं है अपितु उसे राजनीतिक लाभ हेतु असहिष्णु बनाने की कोशिश की जा रही है। ये प्रयास लगातार जारी हैं
वीरेन्द्र जैन

इस 14 अप्रैल को जब पूरा देश बाबा साहब अम्बेडकर की 125वीं जयंती मना रहा था और सतारूढ़ दल से लेकर विपक्ष तक सभी उनके योगदान के प्रति आभार व्यक्त कर रहे थे, तब ऐसे समाचार भी आ रहे थे कि पूरा देश असहिष्णुता के हमले झेल रहा है।
जिस समय नरेन्द्र मोदी मजबूत सुरक्षा में महू में फूलों के गुलदस्ते स्वीकार कर रहे थे, तब देश के तीन सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक जेएनयू छात्र संघ के चुने हुए अध्यक्ष कन्हैया के नागपुर पहुँचने पर पत्थर फेंके जा रहे थे व उसकी सभा में जूता फेंका जा रहा था।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जब दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पर जूता फेंका गया था और उनके मंत्रिमण्डल के एक सदस्य ने षड़यंत्र में भाजपा की भूमिका का बयान दिया था, उसी तरह नागपुर में जूता फेंकने वाले युवक का सम्बन्ध बजरंग दल और एबीव्हीपी से बताया गया। उसी दिन अपने एक भाषण में कन्हैया ने कहा था कि जिन भाईयों को जूता फेंकना ही आता है, उनसे निवेदन है कि वे दोनों जूते फेंकने की कृपा करें, जिससे उनका कुछ उपयोग तो हो सके। दूसरी बात उसने कही थी कि जूता फेंकने वाले को एक जोड़ी चप्पलें भी साथ में लाना चाहिए, क्योंकि बाहर गरमी बहुत है।

क्या पंजाबी  महिलाएं अपनी परम्परागत पोषाक में अपवित्र होती हैं
इसी 14 अप्रैल को महाराष्ट्र में तृप्ति देसाई पर हमला कर के इतना मारा गया था कि उन्हें आईसीयू में भरती कराना पड़ा था, क्योंकि वे कोर्ट के आदेश के अनुसार पंजाबी ड्रैस पहिन कर नवरात्रि की पूजा करने महालक्ष्मी मन्दिर में प्रवेश कर रही थीं। क्या पंजाब देश से बाहर है, और पवित्र ड्रैस का मतलब केवल साड़ी है? क्या पंजाबी  महिलाएं अपनी परम्परागत पोषाक में अपवित्र होती हैं जिनके प्रवेश से मन्दिर अपवित्र हो जाता है? क्या ये सवाल उठाने का इकलौता तरीका मारपीट ही है?
इसी 14 अप्रैल को हैदराबाद विश्वविद्यालय के जीनियस छात्र दिवंगत रोहित वेमुला की माँ और उसके भाई ने अपने प्रति हो रहे अन्याय का हल अपने धर्म परिवर्तन में खोजा। वे अम्बेडकर और उनके पाँच लाख समर्थकों की तरह हिन्दू धर्म छोड़ कर बौद्ध हो गये।
इसी 14 अप्रैल को अमरेली गुजरात से भाजपा के सांसद नारन कछाड़िया को तीन साल की सजा सुनायी गयी, क्योंकि उनकी असहिष्णु करतूत अदालत में साबित हो गयी। उन्होंने एक आन ड्यूटी डाक्टर को पीटा था। एक सांसद को कानून पर भरोसा नहीं था पर डाक्टरों को था।
संघ परिवार के लोगों ने पिछले दिनों एक झूठ सफलतापूर्वक फैलाया कि देश के बुद्धिजीवियों ने देश को असहिष्णु कहा। अपने विविधिता वाले धर्मनिरपेक्ष देश को चाहने वाले देश पर ऐसे आरोप को बिल्कुल स्वीकार नहीं कर सकते इसलिए कम पढने लिखने वाले भले भारतीयों ने संघ परिवार के इस झूठ को स्वीकार कर लिया और वे बुद्धिजीवियों के खिलाफ संघ परिवार के पक्ष में खड़े नजर आने लगे।

भाजपा सरकार आने के बाद विचार का जबाब गोलियों से दिया जाने लगा है
सच यह था कि किसी ने भी यह नहीं कहा कि हमारा देश असहिष्णु है, अपितु इसके विपरीत सबने दूसरे अनेक देशों से अलग अपने देश में सहिष्णुता की परम्परा की प्रशंसा करते हुए कहा था कि भाजपा शासन आने के बाद हमारे इस इतने अच्छे देश में असहिष्णुता जन्म ले रही है। विचार का जबाब गोलियों से दिया जाने लगा है। गोबिन्द पानसरे, कलबुर्गी, आदि जो देश के अनेक ख्यातनाम लेखक और बुद्धिजीवी थे की हत्याएं उनसे वैचारिक मतभेद के कारण ही हुयी थीं। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा पक्ष के लोगों ने इन हत्याओं की निन्दा करने व दोषियों को पकड़ने की मांग उस तल्खी के साथ नहीं की थी जिस तल्खी के साथ ऐसे मामलों में तब उनसे अपेक्षा रहती है, जब वे आरोपी नहीं होते। ऐसा इसलिए था क्योंकि आरोप उनके साथ खड़े रहने वाले लोगों व संगठनों पर लग रहे थे। जावेद अख्तर, आमिर खान, जावेद ज़ाफरी, शाहरुख खान, सहित ढेर सारे बुद्धिजीवियों ने तालिबानों की आलोचना करते हुए कहा था कि हम क्यों तालिबान बनते जा रहे हैं? इसके विपरीत संघ परिवार के प्रचारकों ने इन कथनों को देश की सहिष्णुता की आलोचना प्रचारित करवा दी।
लोकसभा चुनावों से पूर्व मुज़फ्फरनगर के दंगे, व दंगा कराने के लिए झूठा वीडियो जारी करने वाले की पक्षधरता के साथ उसे पार्टी का टिकिट देना, दादरी में सोचे समझे ढंग से माइक से प्रचार करके अखलाख के फ्रिज में रखे मांस को गाय का मांस बता कर उसकी सामूहिक हत्या करवा देना व आरोपियों के बचाव में पूरी पार्टी का जुट जाना क्या असहिष्णुता फैलाना नहीं है? लव जेहाद, घर वापिसी, धर्म परिवर्तन, गीता को कोर्स में लगाने, आरक्षण में संशोधन, बंगलादेशी घुसपैठिये, भारतमाता, बीफ, पाकिस्तान भेजने, आदि असंगत बातों को भड़का कर और योजनाबद्ध ढंग से क्रमशः उन्हें विभिन्न व्यक्तियों और संस्थानों से उठवाना और नेतृत्व द्वारा उनकी निन्दा भी न करना क्या असहिष्णुता फैलाने में मदद करना नहीं है? इन प्रयासों के बारे में किसी दल या संगठन की प्रतिक्रिया ही उसकी भागीदारी के संकेत दे देती है। राजनीतिक दलों के चरित्रों की पहचान केवल ढीली ढाली न्यायिक प्रक्रिया से बच निकलने से ही तय नहीं होती अपितु जनमानस में बन रही अवधारणाओं का भी महत्व होता है।
उपरोक्त घटनाओं के आलोक में देश के बुद्धिजीवियों का कहना यह था कि देश असहिष्णु नहीं है अपितु उसे राजनीतिक लाभ हेतु असहिष्णु बनाने की कोशिश की जा रही है। ये प्रयास लगातार जारी हैं।

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