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ये तो आरएसएस ही बताएगा गडकरी रुकेगें कि जायेंगे

आरएसएस वालों के पास महान पूर्वजों की किल्लत है
मोदी को रोक पाना अब गडकरी के बस की बात नहीं
शेष नारायण सिंह 
 

 

शासक वर्ग की दोनों ही बड़ी पार्टियों में उथल पुथल है। कांग्रेस के कई नेताओं के ऊपर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं तो सत्ताधारी पार्टी के भ्रष्टाचार पर नज़र रखने के लिए जनता की तरफ से तैनात विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी भी भ्रष्टाचार की लपटों से बच नहीं पा रही है। माहौल ऐसा है कि भ्रष्टाचार की पिच पर दोनों ही पार्टियों की दमदार मौजूदगी है। ज़ाहिर है कांग्रेस या बीजेपी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक दूसरे के ऊपर उंगली उठाने की स्थिति में नहीं हैं। यह देश का दुर्भाग्य है कि राजनीतिक जीवन में सक्रिय ज्यादातर बड़ी पार्टियों के नेता राजाओं की तरह का जीवन बिताने को आदर्श मानते हैं। जिसे हासिल करने के लिए ऐसे ज़रिये से धन कमाने के चक्कर में रहते हैं जिसकी गिनती कभी भी ईमानदारी की श्रेणी में नहीं की जा सकती। ताज़ा मामला बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का है। उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं लेकिन उनके साथी यह कहते पाए जा रहे हैं कि उन्होंने कानूनी या नैतिक तौर पर कोई गलती नहीं की है। लेकिन उनकी पार्टी के अंदर से ही उनके खिलाफ माहौल बनना शुरू हो गया है। सच्चाई यह है कि पिछले सात वर्षों से बीजेपी ने कांग्रेस को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही घेरने की रणनीति पर काम किया है, विकास या अच्छी सरकार का मुद्दा उनकी नज़र में नहीं आया। जब भ्रष्टाचार के चक्कर में लोकायुक्त ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पर आरोप लगाया तो बीजेपी ने दक्षिण भारत में अपनी पार्टी को कमज़ोर करने का खतरा लेकर भी मुख्यमंत्री येदुरप्पा को पद से हटाया। लेकिन गडकरी के ऊपर जो आरोप लगे हैं उनको झेल पाना बीजेपी के बस की बात नहीं है। एक टीवी चैनल ने सारा मामला उठाया। बाद में भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रहे लोगों की एक जमात के नेता ने भी बहुत ही समारोहपूर्वक नितिन गडकरी की भ्रष्टाचार कथा को सार्वजनिक किया। इस नेता की खासियत यह है कि जिस मुद्दे को भी यह उठाता  है, मीडिया उसे चटनी की तरह लपक लेता है। शायद इसी वजह से आज बीजेपी अध्यक्ष के भ्रष्टाचार  के कथित कारनामे सारे देश में चर्चा का विषय हैं। बीजेपी के सामने भी चुनौती है कि अपने मौजूदा अध्यक्ष को कैसे बचाए। माहौल ऐसा है कि अगर नितिन गडकरी हटाये जाते हैं तो भ्रष्टाचार के कहानियों के सारे ताने बाने बीजेपी के इर्द गिर्द ही बन जायेंगे। लेकिन न हटाने की सूरत में भी वही हाल रहेगा। राजनीतिक माहौल ऐसा है कि आजकल जब भी भ्रष्टाचार शब्द के कहीं इस्तेमाल होता है, तो नितिन गडकरी की तस्वीर सामने आ जाती है।

हालात को काबू में रखने के लिए बीजेपी के नेता तरह तरह की कोशिश कर रहे हैं। बीजेपी का नियंत्रक संगठन आरएसएस है. आरएसएस की पूरी कोशिश है कि नितिन गडकरी को डंप न किया जाए। शायद इसी मंशा से उन्होंने अपने खास सदस्य और चार्टर्ड अकाउन्टेंट, एस गुरुमूर्ती को पेश किया और उन्होंने बीजेपी के कोर ग्रुप को बता दिया कि नितिन गडकरी बिलकुल निर्दोष हैं। यह अलग बात है कि सार्वजनिक रूप से उनकी बात को स्वीकार कर लेने के बाद भी बीजेपी के नेता गडकरी को दोषमुक्त नहीं मान पा रहे हैं। आरएसएस की पोजीशन गडकरी ने बहुत ही मुश्किल कर दी है। आर्थिक भ्रष्टाचार के मामलों से वे जूझ ही रहे थे कि उन्होंने स्वामी विवेकानंद की अक्ल की तुलना दाऊद इब्राहीम की अक्ल से करके भारी मुश्किल पैदा कर दी। आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप तो आरएसएस बर्दाश्त भी कर लेता लेकिन जिन स्वामी विवेकानंद जी के व्यक्तित्व के आसपास,  आरएसएस ने अपना संगठन खड़ा किया हो उनकी तुलना दाऊद इब्राहीम जैसे आदमी से कर देना  आरएसएस के लिए बहुत मुश्किल है। हालांकि पूरे भारत में कोई भी दाऊद इब्राहीम को सही नहीं  ठहरा पायेगा लेकिन आरएसएस के लिए किसी ऐसे आदमी को महिमामंडित करना असंभव है जो मुसलमान हो, पाकिस्तान का दोस्त हो और मुंबई में शिवसेना के खिलाफ बहुत सारे अभियान चला चुका हो। गडकरी ने भ्रष्टाचार के कथित काम करके बीजेपी की वह अथारिटी तो छीन ही ली कि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बना सके, उन्होंने देश के नौजवानों के संघप्रेमी वर्ग को भावनात्मक स्तर पर भी तकलीफ पहुंचाई। बीजेपी और आरएसएस के लिए विवेकानंद का अपमान करने वाले को बर्दाश्त कर पाना बहुत मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। बीजेपी की परेशानी को समझने के लिए आज़ादी की लड़ाई के इतिहास पर एक नज़र डालनी होगी। भारत की आज़ादी की लड़ाई की पहली कोशिश १८५७ में हुई थी। कहीं कोई संगठन नहीं था लिहाजा वह संघर्ष बेकार साबित हो गया। लेकिन जब १९२० में महात्मा गांधी के नेतृत्व में आज़ादी की कोशिश शुरू हुई तो पूरा देश उनके साथ हो गया। लेकिन महात्मा गांधी के साथ कोई भी ऐसा आदमी नहीं था जिसका आरएसएस से किसी तरह का सम्बन्ध रहा हो। आरएसएस वाले बताते हैं कि इनके संस्थापक डॉ हेडगेवार ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। अगर उनकी बात को मान भी लिया जाए तो यह पक्का है कि आरएसएस वालों के पास महान पूर्वजों की किल्लत है।

सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने वी.डी. सावरकर को आजादी की लड़ाई का हीरो बनाने की कोशिश की थी। बीजेपी ने सावरकर की तस्वीर संसद के सेंट्रल हाल में लगाने में सफलता भी हासिल कर ली लेकिन बात बनी नहीं क्योंकि 1910 तक के सावरकर और ब्रिटिश साम्राज्य से मांगी गई माफी के बाद आजाद हुए सावरकर में बहुत फर्क है और पब्लिक तो सब जानती है। सावरकर को राष्ट्रीय हीरो बनाने की बीजेपी की कोशिश मुंह के बल गिरी। इस अभियान का नुकसान बीजेपी को बहुत ज्यादा हुआ क्योंकि जो लोग नहीं भी जानते थे, उन्हें पता लग गया कि वी.डी. सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी और ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा करने की शपथ ली थी। 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी ने गांधी को अपनाने की कोशिश शुरू की थी लेकिन गांधी के हत्यारों और संघ परिवार के कुछ सदस्यों संबंधों को लेकर मुश्किल सवाल पूछे जाने लगे तो परेशानी पैदा हो गयी और वह प्रोजेक्ट भी ड्राप हो गया।

1940 में संघ के मुखिया बनने के बाद एम एस गोलवलकर भी सक्रिय रहे लेकिन जेल नहीं गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में जब पूरा देश गांधी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई में शामिल था तो आर.एस.एस. के गोलवलकर को कोई तकलीफ नहीं हुई, वे आराम से अपना काम करते रहे। ज़ाहिर है उनको भी आज़ादी की लड़ाई  का हीरो नहीं साबित किया जा सकता। कुछ वर्ष पहले सरदार पटेल को अपनाने की कोशिश शुरू की गई। लालकृष्ण आडवाणी लौहपुरुष वाली भूमिका में आए और हर वह काम करने की कोशिश करने लगे जो सरदार पटेल किया करते थे। लेकिन बात बनी नहीं क्योंकि सरदार की महानता के सामने लालकृष्ण आडवाणी टिक न सके। बाद में जब उन्होंने पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिनाह को महान बता दिया तो सब कुछ हवा हो गया। जिनाह को सरदार पटेल ने कभी भी सही आदमी नहीं माना था। ज़ाहिर है जिनाह का कोई भी प्रशंसक सरदार पटेल का अनुयायी नहीं हो सकता। वैसे सरदार पटेल को अपनाने की आर.एस.एस. की हिम्मत की दाद देनी पडे़गी क्योंकि आर.एस.एस. को अपमानित करने वालों की अगर कोई लिस्ट बने तो उसमें सरदार पटेल का नाम सबसे ऊपर आएगा। सरदार पटेल ने ही महात्मा गांधी की हत्या वाले केस में आर.एस.एस. पर पाबंदी लगाई थी और उसके मुखिया एम एस गोलवलकर को गिरफ्तार करवाया था। बाद में मुक़दमा चलने के बाद जब हत्या में गोलवलकर का रोल साबित नहीं हो सका तो उन्हें रिहा हो जाना चाहिए था लेकिन सरदार पटेल ने कहा कि तब तक नहीं छोड़ेंगे जब तक वह अंडरटेकिंग न दें। बहरहाल अंडरटेकंग लेकर आरएसएस के प्रमुख एम एस गोलवलकर को छोड़ा। साथ ही एक और आदेश दिया कि आरएसएस वाले किसी तरह ही राजनीति में शामिल नहीं हो सकेंगे। जब राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की बात हुई तो सरदार पटेल की मृत्यु के बाद भारतीय जनसंघ की स्थापना की गयी और उसके बाद चुनावी राजनीति करने के रास्ते खुले। इसी भारतीय जनसंघ की उत्तराधिकारी पार्टी आज की बीजेपी है।

ज़ाहिर है कि बीजेपी और आरएसएस में ऐसे महान लोगों की कमी है जो समकालीन इतिहास के हीरो हों और उन पर गर्व किया जा सके। ऐसी हालत में बीजेपी ने १९२० के पहले के कुछ महान लोगों को अपना बनाने का अभियान चला रखा है। ऐसे महान लोगों में स्वामी विवेकानंद का नाम सबसे ऊपर है। यह अलग बात है कि स्वामी विवेकानंद के ऊपर बाकी देश का भी बराबर का अधिकार है। ऐसी हालत अगर बीजेपी या आरएसएस का कोई नेता स्वामी विवेकानंद की शान में गुस्ताखी करता है तो उसका समर्थन कर पाना बहुत मुश्किल होगा। आज नितिन गडकरी की नाव भंवर में है और उनके लिए बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रह पाना बहुत मुश्किल है। गडकरी के समर्थन में कोई नहीं है लेकिन आरएसएस के सामने बहुत मुश्किल है। नागपुर वाले कभी नहीं चाहते कि नरेंद्र मोदी या उनका कोई करीबी दोस्त पार्टी का अध्यक्ष बने। बताया तो यह भी जा रहा है कि नितिन गडकरी के भ्रष्टाचार के कारनामे के दस्तावेज़ भी उनके विरोधी खेमे के किसी बड़े नेता ने मीडिया को दिया है। नरेंद्र मोदी को रोक पाना अब नितिन गडकरी के बस की बात नहीं है लेकिन आरएसएस जब तक मोदी विरोधी किसी बड़े बीजेपी नेता की तलाश नहीं कर लेता तब तक नितिन गडकरी का अध्यक्ष बने रहना मुश्किल हालात के बावजूद भी संभव लगता है।

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