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ये मसाइल-ए-तसव्वुफ ये तेरा बयान गा़लिब

सुन्दर लोहिया
जो लोग मोदी सरकार की आलोचना को जल्दबाजी बता रहे हैं उनसे मुझे इतनी कर सहमति तो अवश्य है कि किसी भी नई सरकार को उसके कार्यकाल के पंद्रह बीस दिनों की गतिविधि से आंकना असंगत है। उसे अपने पूरे रंग में आने का अवसर दिया जाना चाहिए। लेकिन मोदी सरकार के साथ एक दिक्कत यह है कि पूरे चुनाव अभियान में एक रट लगा रखी थी कि मोदी आयेंगे और सब ठीक कर देंगे। अब जब मोदी आ गये हैं तो लोगों को लगता है कि अब सब ठीक हो जाना चाहिए। मोदी और उसके प्रचारकों ने लोगों को यह कभी नहीं बताया कि जो वे बोल रहे हैं उसे पूरा करने के उपाय क्या है। लोगों को लगा कि जब गंगा मैया ने मोदी को बुलाया है तो ज़रुर कोई करिश्मा होगा कि मादी आयेंगे और हमारा उद्धार कर देंगे। क्योंकि जैसे गंगा का शुद्धिकरण मोदी के लिए आस्था का प्रश्न है उसी तरह मोदी का प्रधानमन्त्री बनते ही सब प्रकार के संकटों से मुक्ति मिल लायेगी यह उन मतदाताओ की आस्था का सम्बल है जिन्होंने एक करिश्में की उम्मीद में वोट दिया है। बेचैनी भी उन्हें ही है क्योंकि मोदी विरोधियों को किसी करिश्में पर न तब ऐतबार था न अब है।इसलिए वे बेचैन नहीं हैं।
मोदी सरकार ने जो कारनामें शुरु किये हैं उनमें ज़्यादातर ऐसे हैं जिनसे कोई धुर विरोधी भी असहमत नहीं हो सकता। जैसे सांसदों को चरणछूने के बजाये जनता के काम करने का उपदेश सरकारी दफतरों में कार्य संस्कृति के सुधार के लिए बोझ विहीन वातावरण और जनता के कामो को समयबद्ध तरीके से निपटाना। अनावश्यक फाइलों को हटाना लिखित कारवाई को संक्षिप्त बनाना ऐसे ही काम हैं जैसे गंगा नदी का शुद्धिकरण। भला इन कामों को कौन बुरा कह सकता हैं। पिछली सरकार को ऐसा कुछ क्यों नहीं लगा जो किया जाना चाहिये था। शायद इसलिए कि वे अपनी जीत को निजी जीत मानकर उसमें किसी प्रकार की तबदीली सोचना गैरज़रुरी मानते थे और नरेन्द्र मोदी की चिन्ता है कि उन्हंे उम्मीद से ज़्यादा बहुमत मिला है तो लोगों की उम्मीद पर खरा उतरने के लिए कुछ करते रहना ज़रुरी है ताकि जनता को यह लगे कि सरकार कुछ कर रही है। इधर राष्ट्रपति का संसद के संयुक्त अधिवेशन का भाषण भी आ गया जिसे नई सरकार की नीतियों का आईना बताया जाता है। इस आइनें में धंुधलापन कुछ ज़्यादा है। शायद मेरा दृष्टिभ्रम हो लेकिन मुझे इसमें मनमोहन सरकार की झलक दिख रही है। ऐसा भाजपा अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान पहले भी कर चुकी है जैसे कांग्रेस की योजनाओं के नाम बदल कर चालू रखना। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने प्रधानमन्त्री ग्रामीण रोज़गार योजना को प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क योजना करके चालू रखा और बीससूत्री कार्यक्रम को अंत्योदय के नाम से प्रचारित किया। मनमोहन सिंह की सरकार की प्राथमिकता अधोसंरचना यानि इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए विदेशी निवेश पर उम्मीद लगाये हुए थी तो नई सरकार इसे ग्रामीण विकास के नये नाम से प्रचारित करते हुए कृषि उत्पाद को मार्केट तक जल्द पंहुचाने के लिए खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को शत प्रतिशत करने का संकल्प व्यक्त कर चुकी है। लेकिन इसे डर है कि किसान विरोध कर सकते हैं इसलिए किसानों के गुस्से से बचने के लिए हर खेत तक पानी पंहुचाने का सपना बांट रही है। पानी पीने के लिए भी सुलभ नहीं हैं। नदियों का जल स्तर लगातार कम होता जा रहा है और हिमालय की सदानीरा नदियां यमुना की तरह अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं और नई सरकार हर किसान के खेत तक पानी पंहुचाएगी फिलहाल दिवास्वप्न के अतिरिक्त कुछ नहीं। जहां तक जलागम कार्यक्रम का सवाल है उसकी सफलता में काफी समय और संसाधन लगते हैं जो तत्काल कोई दृष्यमान परिणाम नहीं दे सकते। इसलिए किसानों को किये गये वायदे कानों को भले लगते हों लेकिन दिमाग़ के खाने में फिट नहीं होते।
राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस बात का उल्लेख तो हुआ कि कृषि के विकास के लिए अपेक्षित अधोसंरचना के तहत गांव में भण्डार बनाये जायेंगे कोल्डस्टोरेज की व्यवस्था की जायेगी और ट्रक या रेल बैगन के माध्यम से उपज को खेत से बाज़ार जल्द पंहुचाने की व्यवस्था पर बल दिया जायेगा। सुनने में सब अच्छा लगता है लेकिन यह नहीं बताया गया कि इसे पल्बिक प्राइवेट पार्टनरशिप की स्कीम के तहत करेंगे या कोई दूसरा विकल्प होगा। लेकिन ऐसी बातें मोदी सरकार के हिडन एजेण्डे के तहत आती है अतः छिपा कर रखी गई लगती हैं।
ये कुछ ऐसी बातें हैं जिनके प्रभाव के प्रमाण जुटाने में समय लगेगा इसलिए इन्हें केवल आशंकाओं के तौर पर ही देखा जा सकता है। लेकिन इन पंद्रह बीस दिनों के भीतर मोदी सरकार का असल चेहरा भी बेनकाब हुआ है जो देशभक्त तबकों की बेचैनी का कारण बना हुआ है। जिस दिन मोदी का राज्याभिषेक हुआ उसके दूसरे दिन महाराष्ट्र के पुणे शहर में एक अल्पसंख्यक सूचना प्राद्यौगिकी क्षेत्र का कार्यकत्र्ता को हिन्दु रक्षा सेना के कार्यकत्र्ताओं ने नृशंसतापूर्वक मार दिया। महाराष्ट्र सरकार ने कारवाई करके हत्यारों को गिरफतार किया तो केन्द्रीय गृहमन्त्री ने राज्य सरकार से घटना पर अठतालीस घण्टों के भीतर रिपोर्ट भेजने का आदेश जारी कर दिया। इस आदेश का स्वागत इसलिए होना चाहिए कि केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार की ढीली ढाली दीर्घसूत्री कार्यप्रणाली को चुस्तदरुस्त बनाने के लिए आवश्यक कदम था। लेकिन जब राज्य सरकार ने निर्धाकिरत अवधि में केन्द्र को रिपोर्ट भेजी तो उसे चैबीस घण्टों के भीतर ही असंतोषजनक बतादिया। पर बात अब जगजाहिर हो चुकी है और इस मामले पर देश में सरकार की कार्यप्रणाली को भेदभावपूर्ण मान कर जनता आक्रेाशित हो रही है कि हिन्दुत्ववादी संगठन के इस दुष्कर्म को छिपाने के लिए गृहमन्त्री राज्य की रिपोर्ट को मानने से इन्कार कर रहे हैं। लगता है गृहमन्त्री जिस प्रकार की रिपोर्ट चाहते थे राज्य सरकार ने वैसी न भेज कर सच्चाई पर आधारित रिपोर्ट भेजी वे इसमें कुछभी दुपा नहीं सकते थे क्योंकि मामला संचार माध्यमों द्वारा जनता तक पंहुच चुका है। इसी तरह का एक और बयान है जिस पर बुद्धिजीवियों को बहस करने की ज़रुरत है। केन्द्रीय सचिवालय के कर्मचारियों को सम्बोधित करते हुए जहां जनता के कामों को समयबद्ध तरीके से न्यायपूर्ण ढंग से निपटाने का निर्देश दिया गया वहीं उन्हें बताया गया कि वे निर्भय होकर अपना काम करें मोदी ने कहा मैं तुम्हें बचाऊंगा। घड़ी भर तो मुझे श्रीमदभगवदगीता के कवर पर छपी तस्वीर याद आई जिसमें कृष्ण अर्जुन से कहते हैं ‘ अहं तवां सर्व पापेभ्योः मोक्षस्यामी मा शुचः’ फिर एक फिल्म का डायलाग याद आया जिसमें शाहरुख़ खां कहते हैं ‘ मैं हूं न ’। तब सोचने लगा हूं कि नरेन्द्र मोदी का अपने सचिवों को यह कहना कि तुम किसी के दबाव में आये बिना काम करो मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। मेरे विचार से सरकार के कर्मचारी को किसी नेता से डर कर काम करना उसका अपने पद की गरिमा के विरुद्ध आचरण तो है ही लेकिन किसी प्रधानमन्त्री का यह कहना कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा संविधान की अवमानना जैसा है।क्योंकि कर्मचारी काम पर नियुक्त होने के अवसर पर संविधान के प्रति अपनी वफादारी निभाने का संकल्प लेता है। क्योंकि संविधान उसका नियोक्ता है इसलिए उसे बचाने की जिम्मेवारी संविधान की ही बनती है। प्रधानमन्त्री आजतक एक दर्जन से ज़्यादा हो चुके हैं लेकिन संविधान एक सौ संशोधनों के साथ आज भी अपने मूल संकल्पों के साथ जनता को सुरक्षा का आश्वासन देता आया है। इसलिए मैं समझता हूं कि कर्मचारियों को संविधान की सुरक्षा के वचन का पालन करना चाहिए जिसमें उन्हें जनसेवक की संज्ञा से अभिहित किया गया है और संविधान बदले में उनकी उन सभी नेताओं से रक्षा कर सकता है जो कर्मचारियों को अपने स्वार्थपूत्र्ति के लिए इस्तेमाल करने की कुचेष्टा करते हैं। संविधान विशेषज्ञों को इस सवाल पर खुली बहस करके जनता को जागरूक करना होगा क्योंकि जन जागरूकता ही फासीवाद का मुकाबला करने में कारगर हथियार होती है।
एकबार फिर गा़लिब को इस संकटकाल में याद करते हुए ;
ये मस्सायल तसव्वुफ ये तेरा बयान गा़लिब ।
तुझे हम वली समझते जो न वादाख्वार होता।।

About the author

सुन्दर लोहिया, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। आपने वर्ष 2013 में अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं। इनका न केवल साहित्य और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है बल्कि वे सामाजिक जीवन में भी इस उम्र में सक्रिय रहते हुए समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं। अपने जीवन के 80 वर्ष पार करने के उपरान्त भी साहित्य और संस्कृति के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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