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रक्षक या भक्षक दिल्ली पुलिस

नई दिल्ली।  ‘दिल्ली पुलिस सदैव आपके साथ’ कहने का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस के करनामे तो हम सभी समय समय पर देखते-सुनते आये हैं। दिल्ली पुलिस ने ऐसे समय में बहादुरी पेश की है जब अच्छा सुशासन देने के नाम पर केन्द्र सरकार सत्ता में आयी है और दिल्ली पुलिस की कमान सीधे केन्द्र सरकार के हाथ में है। इस बार बेलगाम वर्दी वालों का निशाना बना 9 माह का गोपाल। सरस्वती और गोपाल के जन्म के बाद मां ने नसबंदी करा ली थी। यह सोचकर कि हम दो हमारे दो के साथ परिवार सुखी होगा। हम मेहनत मजदूरी करके दोनों बच्चों को पढ़ा-लिखा कर एक अच्छा इंसान बनायेंगे।
गोपाल के पिता संतोष व मां अनिता बिहार के सहरसा व दरभंगा जिला के रहने वाले हैं। दोनों पढ़े-लिखे नहीं है और बचपन से मजदूरी करते रहे हैं। संतोष 6-7 साल की उम्र से ही बंगाल व उसके बाद हरियाणा में जा कर काम करने लगे थे। शादी होने के बाद वो पत्नी के साथ दिल्ली रहने लगे। शादी के बाद दो बच्चे हुए संतोष चाहते थे कि बेटा-बेटी पढ़े। वह अपनी तरह का जीवन अपने बच्चों को नहीं देना चाहते थे। वे मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते रहे। अनिता की मां जानकी देवी बताती हैं कि उनका परिवार 50 साल से दिल्ली में रह रहा है। पहले उनकी झुग्गी तोड़ी गयी और अब रोजगार करने नहीं दिया जा रहा है। वह पूछती है की ‘‘रोजगार करना पाप है कि उनके नाती (बेटी का लड़का) की जान पुलिस वालों ने ले ली?’’
सराये काले खां से अक्षयधाम मंदिर के तरफ नेशनल हाइवे 24 पर जाते समय यमुना को पार करते ही रेनी वेल नं. 3 है। हाईवे 24 के दोनों किनारों पर फूल और सब्जी की खेती की जाती है। आफिस से घर जाते समय लोग यहां से ताजी सब्जियां लेकर घर जाते हैं और स्वादिष्ट भोजन बना-खा कर अपनी थकान दूर करते हैं। उन लोगों का क्या जो यह सब्जियां उगाते हैं? वो वहीं यमुना के किनारे आने वाले बाढ़-कीचड़, बड़े-बड़े मच्छरों के बीच अपनी दो-तीन पुश्त बिता चुके हैं। ये लोग जमीन लीज पर लेकर खेती करते हैं। कभी नुकसान, कभी फायादा झेलते हुए पुश्त दर पुश्त इसी में लगे हुए हैं। यहां इतने बड़े-बड़े मच्छर लगते हैं कि जानवरों को भी बड़ी-बड़ी मच्छरदानी में रखा जाता है। बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल नहीं है इसलिए ज्यादा बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं। लक्ष्मी के मां-पिता बिहार के सहरसा जिले के हैं। लक्ष्मी का जन्म दिल्ली का है, वह 16 साल की हो चुकी है। लेकिन वह कभी स्कूल पढ़ने के लिए नहीं जा पाई, परिवार के साथ खेती में हाथ बंटाती रही। वह अनुभव के आधार पर किसी तरह से हिसाब जोड़ लेती है।
लक्ष्मी अब भी पढ़ना चाहती है। उसकी इच्छा है कि कोई आये और उसको पढ़ाये। वह कहती है कि यहां काफी बच्चे इकट्ठे हो जायेंगे पढ़ने के लिए। जब उसका जन्म हुआ तब अपनी झुग्गी हुआ करती थी। लेकिन अब वह उन्हीं खेतों में रहती है जिन पर उनके परिवार लीज पर लेकर खेती करते हैं। लक्ष्मी का जिस स्थान पर जन्म हुआ था वहां आज झुग्गी की जगह भव्य मंदिर (अक्षय धाम) का निर्माण हो चुका है। वहां पर करोड़ों रू. चढ़ाये जाते हैं। उसके परिवार वालों के हाथ में एक कागज का टुकड़ा थमा दिया गया कि प्लाट मिलेगा और सपना दिखाया गया कि तुम्हारे भी अच्छे दिन आयेंगे जिसमें अच्छे मकान होगें। लेकिन आज तक अच्छे दिन नहीं आये। जानकी देवी कागज के टुकड़े को सम्भाल कर रखी हुई हैं। उनका परिवार अपनी झुग्गी की जगह लीज के जमीन पर रहने लगा और इसी जमीन से अपनी जन्म भूमि को देखते हैं जहां पर एक भव्य ईमारत खड़ी है। उसमें उन भगवानों को रखा दिया गया है जिनका जन्म पता नहीं कहां हुआ था।
यमुना खादर रेनी वेल नं. 3 पर चार मछली, एक मुर्गा व दो सब्जी की दुकानें हुआ करती थीं जिसके लिए 2000 रू. प्रति माह, प्रति दुकान मण्डावली थाने की पुलिस ले जाया करती थी। अच्छी सरकर के आने के बाद अगस्त से उनके दुकान को बंद करा दिया गया, लेकिन पेट की आग और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ये लोग चोरी-छिपे दुकान लगा लिया करते थे। यही कारण था कि पुलिस वाले इनसे मुफ्त में सब्जियां और मछलियां खाया करते थे और पैसे का डिमांड भी करते थे। प्राप्त जानकारी के अनुसार 28 दिसम्बर, 2014 को दिल्ली सर्दी में ठिठुर रही थी। उस दिन दिल्ली पुलिस के चार बहादुर (अशोक, प्रकाश, प्रदीप और एक अज्ञात) सिपाही कार (एच आर 35 एफ 6703) से आये और रेनी वेल नं 3 के कमरे में शराब (प्रदीप सुबह 9 बजे से पी रहा था) पिये। शराब पीते पीते इनको मुफ्त का मछली खाने का दिल कर बैठा और संतोष से इन्होंने मछली फ्राई करने को कहा। संतोष के मना करने पर वे आग बबूला हो गये और प्रदीप ने इनको धमकी दी कि तुमको मजा चखायेंगे। ये शराब पीने के बाद तीन बजे निकले और संतोष के बेटे गोपाल (9 माह) पर कार चढ़ा दी। लोगों के चिल्लाने पर कार को बैक कर के चढ़ाया गया जिससे गोपाल की मौत हो गई और बचाने के क्रम में एक बुर्जुग महिला डोमनी देवी घायल हो गई। इसके बाद लोगों ने शोर मचाया और भागते हुए सिपाही अशोक को पकड़ लिया। इंसाफ के लिये वे नेशनल हाईवे 24 को जाम कर दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई करने की मांग करने लगे। इंसाफ की मांग कर रहे लोगों पर पुलिस ने लाठियां बरसाई इसके बाद अशोक को ले गयी।
मण्डावली पुलिस थाने में एक पुलिस (अशोक) वाले पर मनमाने तरीके से एफआईआर दर्ज की गई जिसमें आईपीसी की धारा 302 दर्ज नहीं लगाई गई। बाकी पुलिस वालों को साफ-साफ बचा लिया गया। जबकि मुख्य गुनाहगार प्रदीप ने कुछ दिन पहले ही शीला की सब्जी की दुकान पर इसी जगह पर गाड़ी चढ़ा दी थी जिसमें शीला किसी तरह बच गई लेकिन उनकी चीजें तहस-नहस हो गईं।
मीडिया में खबर आ जाने के कारण एफआईआर दर्ज तो हुई लेकिन वह सही आईपीसी धारा के अन्तर्गत नहीं हुआ, और दूसरे पुलिसकर्मियों को बचा लिया गया। इस पर दिल्ली के सभी सामाजिक-नागरिक-मानवाधिकार संगठन चुप्पी साधे रहे। न्याय की मांग में गोपाल के मां-बाप, नानी इस अधिकारी से उस अधिकारी के पास दौड़ रहे हैं। पेशावार घटना पर मोमबत्ती जलाने वाले क्रांतिकारी-सामाजिक संगठनों को अपनी शहर की घटना दिखाई नहीं दी। पेशावार में तो दहशतगर्द थे लेकिन यहां तो लोगों की ‘सुरक्षा’ देनी वाली दिल्ली पुलिस के जवान हैं। तो क्या यह घटना अत्यधिक चिंतनीय नहीं है जहां ‘रक्षक’ ही भक्षक बन गया? क्या इसी तरह का सुशासन आने वाला है? 28-30 नवम्बर को मोदी ने राज्यों, केन्द्र शासित प्रदेशों व अर्द्धसैनिक बलों के मुखिया के वार्षिक सम्मेलन में पुलिस को स्मार्ट बनाने की बात कही। इस पुलिस को आधुनिकीकरण से लेकर सेंसिटिव व एकाउंटेब्लिटि की बात कही गई है। क्या यही सेंसिटिव व एकाउंटेब्लिटि है कि एक बच्चे को कुचल दिया जाये और बाकी पुलिस बल उसको बचाने में लग जाये? इसके बावजूद पुलिस को स्मार्ट बनाने वाले ‘प्रधान सेवक’ और उनका मंत्रीमंडल गूंगा, बहरा बना हुआ है। इन गरीब मां-बाप को संत्वाना देने के लिए कोई भी सांसद, विधायक या नेतागण नहीं पहुंचे!
सुनील कुमार
 

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सुनील कुमार, लेखक राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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