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राजनैतिक पुनर्वास का अड्डा बना दिया गया महिला आयोग

वसीम अकरम त्यागी
महिला आयोग क्या सिर्फ एक छलावा है ? महिला आयोग और महिला संस्थाओं के गठन के पीछे महिलाओं को सशक्त भूमिका में लाने के उद्द्येश्य को पुख्ता करना था इसके पीछे यह सोच थी कि एक महिला ही महिला के दर्द को अच्छी तरह समझ सकती है। इसलिए एक महिला ही महिला के विभिन्न सामाजिक शोषणों, शोषकों से बचाने, निकालने में ईमानदार भूमिका निभा सकती है। वस्तुतः बदलते वक्त के साथ महिला आयोग तथा अन्य महिला संस्थाओं की कहानी भी तालाब में बड़ी और छोटी मछली की हो गई। यह सही है कि महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के लिए महिला आयोग प्रतिबद्ध है लेकिन दिल्ली पुलिस के खिलाफ धरने पर बैठे केजरीवाल को चारों तरफ से घेरने की तैयारी में कहीं न कहीं यह भी एक राजनीतिकरण नीति नजर आते हैं। आए दिन महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में महिला आयोग कहीं नजर नहीं आईं (शायद ही कभी इस तरह की प्रमुख भूमिका में नजर आती हैं)। अभी पिछले दिनों एक विदेशी महिला के साथ बलात्कार के मुद्दे पर भी महिला आयोग कहीं नजर नहीं आई। मुजफ्फनगर के दंगा पीड़ित महिलाओं में 13 बलात्कार के मामले थे, जिनमें सामूहिक बलात्कार भी शामिल थे लेकिन महिला आयोग की ओर से किसी तरह की कोई हलचल नहीं हुई, जिनके साथ बलात्कार हुआ वे आज भी शिविरों में हैं, मगर महिला आयोग के किसी भी सदस्य ने उनकी सुध लेने की तकलीफ महसूस नहीं की। क्या केवल देश में दामिनी ही एक लड़की थी जिसके साथ बलात्कार जैसा शर्मनाक अपराध किया गया था ? क्या मुजफ्फरनगर, कश्मीर, छत्तीसगढ़ में होने दुष्कर्म जिनमें अधिकतर सीआरपीएफ के जवान आरोपी होते हैं क्या उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बनाने या न्याय दिलाने के लिये महिला आयोग आया ?
वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ शुक्ल कहते हैं कि-
 “आज दिल्ली में महिला आयोग की अध्यक्षता को लेकर घमासान जारी है। दोनों ही पक्षों में राजनीति हो रही है। लेकिन कभी सोचा गया कि महिला आयोगों और महिला संगठनों ने अब तक महिलाओं के हित के लिए किया क्या है? आज एक महिला मेघना पटेल निर्वस्त्र होकर नरेंद्र मोदी के प्रचार में उतरी है और इसे वह अपना अधिकार बताती है। क्या किसी महिला संगठन ने इसका विरोध किया कि यह किस तरह का महिला अधिकार है? कभी-कभी कुछ घटनाओं में ऐसे महिला संगठनों की आँख खुलती है और वे सड़क पर उतर आती हैं। पर उनका यह उत्साह देर तक नहीं रुकता। नतीजा यह होता है कि जैसे ही समय पर उसका खुमार उतर जाता है ये महिला संगठन उस घटना पर क्या सरकारी कार्रवाई हुई, इसे फालोअप करना भूल जाते हैं। दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को जिस लड़की के साथ गैंगरेप हुआ था और बाद में उसकी मौत हो गई थी, उस मामले में उस समय जिस तरह सैलाब उमड़ा था उससे लगा कि अब शायद ऐसी घटनाएं रुक जाएंगी और महिला अपराधों पर रोक लगेगी। लेकिन एक वर्ष से अधिक का समय हो गया। हालात जस के तस हैं और फिर वैसी ही घटनाएं हो रही हैं। ऐसे में इन महिला संगठनों के वजूद पर सवाल तो उठता ही है।”
सामाजिक कार्यकर्ता जिया उल इस्लाम, शंभू नाथ के वक्तव्य में सुर मिलाते हैं और भावुक हो कर कहते हैं कि यूँ तो भारत में महिला मानवाधिकार संगठनों का बहुत बोलबाला है, ये संगठन महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, भेदभाव, दहेज हत्या, शिक्षा में बाधा आदि के उन्मूलन हेतु काम करते हैं ! भारत में बलात्कारों की लिस्ट दिनों दिन लम्बी होती जा रही है, इसके विरोध में इन संगठनों ने कई धरने दिए, रेलियाँ निकाली, मेमोरेंडम दिए, बहुत हो हल्ला किया। एक दामिनी के लिए पूरा भारत हिल गया, हर टीवी चैनल, रेडियो, अख़बार, सोशल मीडिया दामिनी के इन्साफ के लिए कराहता नज़र आया। वहीँ दूसरी ओर मुज़फ्फर नगर में दर्जनों दामिनी बलात्कार का शिकार हुई, एक एक मासूम दामिनी पर परिवार के सदस्यों के सामने कई-कई बार बालात्कार हुए। फिर भी इन पिशाचों का मन नहीं भरा तो उन दामिनियों को जला दिया गया। ये हेवानियत का नंगा नाच हुवा। पूरा मीडिया खामोश, नेता चुप, क़ानून के रखवाले इन भक्षकों के सपोर्ट में। और तो और “महिला मानवाधिकार संगठनों” को भी जैसे सांप सूंघ गया। अरे हमदर्दी के झूठे ढकोसले करने वालों, अपनी दुकानें और कुर्सियां कितनी दामिनियों के मुर्दा शरीर पर रख कर चलाओगे?
मुजफ्फरनगर राहत शिविरों में कार्या करने वाले एशियन मानवधिकार आयोग के कार्यकर्ता अवनीश पांडे समर कहते हैं कि देश और प्रांतों में महिला आयोग बनाये जाने के पीछे एक बड़ी वजह थी। यह कि यौन हिंसा और यौन उत्पीड़न एक बेहद कड़वा और तकलीफदेह सच हैं और इनसे निपटने के लिए एक स्वतंत्र आयोग की जरूरत थी। अपने अधिकारों की सीमाओं के बावजूद शुरुआत में उन्होंने यह बखूबी किया भी। पर फिर धीरे धीरे न केवल महिला आयोग राजनैतिक पुनर्वास का अड्डा बना दिया गया बल्कि उनकी दिखावे की कार्यवाहियां भी एक ख़ास वर्ग तक सिमटती चली गयीं। फिर यह दुष्प्रभाव एक तरफ ‘सेक्सी’ तो तारीफ़ है से लेकर पीड़िताओं का नाम जारी कर देने तक की मर्दवादी मानसिकताओं में दिखने लगे और दूसरी तरफ सिर्फ मध्य या उच्च वर्ग की महिलाओं पर हुए हमलों का संज्ञान लेने में। सोचिये कि दिल्ली की घटनाओं का स्वतः संज्ञान ले लेने वाले महिला आयोग को मुज़फ्फरनगर के सामूहिक बलात्कार क्यों नहीं दीखते? या दिल्ली के क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती को स्त्रीविरोधी टिप्प्णी के लिए नोटिस भेज देने वाला महिला आयोग दूरदराज के इलाकों में सत्ताधारी नेताओं के बलात्कारों तक में शामिल होने पर क्यों चुप रह जाता है ? अगर यह कह दिया जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि महिला आयोग या महिला अधिकारों की रक्षा के लिये थोक के भाव बनने वाले संगठन केवल उन्हीं मामलों को जोर-शोर से उठाते हैं जिनमें कोई राजनेता, या फिल्मी अभिनेता संलिप्त होता है, इसके अलावा गांवों में होने वाले महिलाओं के साथ दुर्व्यहार, दबंगों द्वारा दलित युवती के साथ होने वाले बलात्कार के मामले इन संगठनों को कभी बोलते या मोमबत्ती जलाते नहीं देखा गया।
हाल में मुजफ्फरनगर दंगे में 13 बलात्कार के मामले सामने आये थे जिनकी रिपोर्ट मुजफ्फनगर जनपद के विभिन्न थानों में दर्ज है, लेकिन चौंकाने वाला तथ्य है कि इनमें से केवल चार मुकदमे ही अदालत तक पहुंचे हैं बाकी को पीड़ित परिवारों ने बेइज्जती होने के डर से वापस ले लिया। जबकि होना तो यह चाहिये था कि महिला अधिकारों की रक्षा के लिये बने संगठन इनके मुकदमों की पैरवी करते और पीडितों को इंसाफ दिलाने के लिये वही मुहिम शुरु करते जो पिछले वर्ष दिसंबर में दिल्ली की सड़कों पर शुरु की गई थी। लेकिन इन्होंने ऐसा नहीं किया क्या ये समझ लिया जाये कि महिला आयोग, और महिला अधिकारों की रक्षा के नाम पर चलने वाले संगठनों को केवल दिल्ली में होने वाली घटनाऐं दिखाई पड़ती हैं। अगर ऐसा नहीं है तो क्यों नहीं उठाते आवाज मुजफ्फरगर, कश्मीर, छत्तीसगढ़ में महिलाओं के साथ होने वाली हैवानियत के खिलाफ ?

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वसीम अकरम त्यागी, लेखक साहसी युवा पत्रकार हैं।

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