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रातों-रात तामझाम खड़ा हो गया कारपोरेट के पेट से पैदा पार्टी का

श्रम वंचितों का है, संसाधन प्रकृति के और मौज-मजा शासक वर्ग का
गरीब हमेशा पिटते और सहते ही जाएंगे, यह ध्रुव सत्य नहीं है
कारपोरेट कपट का बढ़ता कारोबार-5
प्रेम सिंह

देश के श्रम और संसाधनों की लूट के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी-सड़क जैसी नागरिक सुविधाओं के निजीकरण में तेजी आई है। ग्रामीण और कस्बाई भारत सहित बड़े नगरों में अधिकांश आबादी न्यूनतम नागरिक सुविधाओं के अभाव में जीवन यापन करने को अभिशप्त है। गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में फैलाया जा रहा पूंजीवादी विकास का मॉडल उन्हें गंदी बस्तियों में तब्दील कर रहा है। इस सबके बीच तरह-तरह के सौदर्यीकृत आलीशान भवन, होटल, रिजोर्ट, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, हवाई अड्डे, हाई वे, मैट्रो रेल, पार्क, स्टेडियम आदि बन रहे हैं। दिल्ली में स्थित विभिन्न राज्यों के भवन-सदन अपनी नई छटा में होटलों को मात करने वाले हैं। देश की संसद को भी नया बनाने का प्रस्ताव है। कल राष्ट्रपति भवन भी नया बनाया जाएगा। देश के समस्त संसाधन और श्रम इस विकास कार्य में खप रहे हैं। श्रम वंचितों का है, संसाधन प्रकृति के और मौज-मजा शासक वर्ग का। मजेदारी यह है कि इस पूंजीवादी विकास से तबाह जनता से ही विकास की पुकार कराई जाती है।

विकास का यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है।  दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही उसे रोका जा सकता है। राजनीतिक इच्छाशक्ति राजनीतिक मानस से ही पैदा हो सकती है। राजनीतिक मानस के निर्माण की चुनौती नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से कठिन से कठिनतर होती गई है। एनजीओ आधारित जनांदेालनों ने न केवल अपने को अराजनीतिक रखने की जिद ठानी हुई है, राजनीति को बुरा बताने का भी बड़ा प्रचार किया है। उनके इस अड़ंगे से नवउदारवाद के विकल्प की राजनीति तो नहीं ही खड़ी हो पाती, मुख्यधारा राजनीति में जो नवउदारवाद विरोध की गुंजाइश होती है, वह भी ताकत नहीं पकड़ पाती। ये जनांदोलनकारी उल्टा सरकारों से संपर्क बना कर कुछ कानून बनाने की अपील करते हैं। विदेशी और कारपोरेट घरानों का धन लेने वाले एनजीओ आधारित जनांदोलनों का आधा बल सामने पड़ते ही सरकार के शरीर में चला जाता है। काफी जद्दोजहद के बाद नवउदारवाद से तबाह जनता की दिखावे की भलाई के कुछ कानून बन जाते हैं। लेकिन इसी बीच परमाणु करार, खुदरा में विदेशी निवेश, शिक्षा के कंपनीकरण, स्वास्थ्य समेत सभी नागरिक सुविधाओं के निजीकरण के कानून भी पास हो जाते हैं। इस तरह नवउदारवाद और उसकी समर्थक की राजनीति मजबूत होती चली जाती है और विरोध की राजनीति खड़ी ही नहीं हो पाती।

किशन पटनायक ने जनांदोलनों के राजनीतिकरण का सिद्धांत ही नहीं दिया, उस दिशा में सक्रिय प्रयास भी किए। 1995 में समाजवादी जन परिषद के गठन में समता संगठन के साथ इक्का-दुक्का जनांदोलनकारी समूह शामिल हुए। बाद में लगातार कोशिश की गई कि वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों का विरोध करने वाले ज्यादा से ज्यादा समूह जनपरिषद में शामिल होकर संघर्ष को राजनीतिक बनाएं। जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) को राजनीतिक बनाने के लिए किशन जी ने काफी प्रयास किया। ऐसा नहीं हो पाया और हालात बदतर होते चले गए। इसके दो प्रमुख कारण समझ में आते हैं। जनांदोलनकारियों की व्यक्तिवादिता और विदेशी फंडिंग। आज मेधा पाटकर ज्यादा जोर से नारा लगवाती हैं – ‘राजनीति धोखा है, धक्का मारो मौका है’। लेकिन केजरीवाल की राजनीति से उन्हें परहेज नहीं है।

कारपोरेट के पेट से पैदा पार्टी का रातों-रात तामझाम खड़ा हो गया है और उसके साथ भारत का नागरिक समाज भी। इस पार्टी ने स्थापना दी है कि राजनीतिक संघर्ष नहीं, सीधे चुनाव जीतने की स्ट्रेटेजी होनी चाहिए। इस राजनीति में किसी भी मोर्चे पर संघर्ष करने की जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि सत्ता मिलने पर काम तो कारपोरेट का करना है। मोदी ने यह काम बखूबी कर दिखाया है। मोदी और केजरीवाल की राजनीति से अराजनीतिकरण की प्रक्रिया और तेज होगी। कारपोरेट और नौकरशाही हलकों में पिछले दिनों यह चर्चा चली चुकी है कि देश में नेताओं की जरूरत नहीं है। कंपनियों के सीईओ को सब तय करने की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए। राजनीति का स्वरूप बदलने के साथ नेता की परिभाषा और छवि बदलना स्वाभाविक है। कुछ लोगों ने कहना शुरू भी कर दिया है कि मुकाबला केजरीवाल और नीलकरणी के बीच है।

अब रास्ता सीधे स्वतंत्रता और समाजवादी आंदोलन की विरासत और संविधान में प्रस्थापित समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के आधार पर राजनीतिक विकल्प बनाने की जरूरत है। अभी तक की राजनीति से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में प्रगतिशील-परिवर्तकारी पार्टियों के लिए लोकतांत्रिक समाजवाद की स्थापना ही लक्ष्य हो सकता है। और, जैसा कि रविकिरण जैन कहते हैं, वह बिना सत्ता के विकेंद्रकरण के संभव ही नहीं है जिसका प्रावधान संविधान में ही है।

देश में गरीब रहेंगे तो उनके हितों को लेकर संघर्ष करने वाले कुछ लोग हमेशा बने रहेंगे। लेकिन नागरिक समाज उन्हें नेता नहीं मानेगा। कारपोरेट की गोद में बैठ कर भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके मजमा जमाने वाले नेता माने जाते हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर अपना पहला लेख हमने लोहिया के इस कथन से शुरू किया था: ‘‘भारतीय समाज के पास अभी तक कोई राजनीतिक मानस नहीं है। जातियों, राजनैतिक परिवर्तनों से अक्षुण्ण जीवनयापन आदि का लंबा अतीत उस पर मजबूती से हावी है।’’ (राममनोहर लोहिया, ‘एंड पावर्टी’, 1950) अराजनीतिकरण की इस चुनौती का सामना करना ही होगा। गरीब हमेशा पिटते और सहते ही जाएंगे, यह ध्रुव सत्य नहीं है। वर्ग-स्वार्थ की प्रबलता में जो एका शासक वर्ग ने किया है, उससे सबक लेकर हो सकता है मेहनतकश वर्ग भी संगठित हो जाए और सत्ता पर अपना कब्जा जमा ले। किसान मजदूरों के बुद्धिजीवी बेटे, जिनके बारे में हमने एक ‘समय संवाद’ में किशन पटनायक के हवाले से बताया था, शासक वर्ग का साथ छोड़ कर अपने स्वाभाविक वर्ग के साथ आ जाएं तो उन्हें रोकने का माद्दा किसमें होगा?

(समाप्त)

पिछली किस्तें यहां पढ़ें-
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About the author

समाजवादी चिंतक डॉ. प्रेम सिंह सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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