राष्ट्रवादी या राष्ट्रद्रोही : सुब्रमण्यम स्वामी को जेएनयू के छात्र अनिल पुष्कर की चुनौती

तो हो जाय – हार्वर्ड बनाम जेएनयू

So it happens – Harvard vs JNU

वर्ण व्यवस्था और धूर्त आत्मघाती राष्ट्रवाद का साइकेडेलिक ड्रग्स (The psychedelic drugs of the caste system and sly suicidal nationalism) पीने से तो अच्छा है, जेएनयू जैसे संस्थान से कुछ अच्छी बातें सीखी जाएँ.

जेएनयू छात्र ने सुब्रमण्यम स्वामी को दी राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह पर बहस की चुनौती | JNU student challenges Subramanian Swamy to debate on nationalism and sedition

नई दिल्ली, Sep 27, 2015: भारतीय जनता पार्टी के महाविद्वान नेता सुब्रमण्यम स्वामी को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र अनिल पुष्कर (Anil Pushkar, a student of Jawaharlal Nehru University) ने चुनौती है कि अगर उनमें दम है तो राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह पर उनसे बहस करें वरना राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह की फाएँ-फाएँ करना बंद करे.

अनिल पुष्कर ने कहा कि राष्ट्रद्रोह क्या होता है, यह बात हार्वर्ड भी स्वयम्सेवक और राष्ट्रवादी(?) को नहीं सिखा सका. हाँ एक बार जेएनयू में किसी भी कोर्स में पढ़ाई कर लेते तो शायद थोड़ी बुद्धि-शुद्धि आ जाती. जो आदमी वर्णव्यवस्था को अब तक अपनी चेतना में लादे और रगों में वर्ण व्यवस्था की मलिनता ढो रहा है, उसे जेएनयू के बारे में बात करने का कोई हक़ नहीं है.

पुष्कर ने कहा कि स्वामी की बात से पता चलता है कि अगर नेहरू ने एक प्रगतिशील और दुनिया के महान ज्ञान को समझने के लिए जेएनयू जैसे विवि की नींव रखी तो दूसरी तरफ स्वयंसेवियों ने राष्ट्रवाद के नाम पर जनता के भीतर धर्म, जाति, भेदभाव, हत्या और कर्मकांड का जहर बोया. और स्कूलों के नाम तक में मंदिर शब्द घुसेड़ दिए. बेचारे गरीब सवर्ण तक इस बात को नहीं जान सके कि राष्ट्रवाद का हथियार केवल धनी सवर्णों की रक्षा के लिए ही अब तक इस्तेमाल किया जाता रहा है. गरीब सवर्ण भी इस राष्ट्रवादी चक्की में घुन की तरह पिसते रहे हैं. और यह बात अब तक उनके दिमाग में इसलिए नहीं घुस सकी क्योंकि उन्हें हिन्दू धर्म की घुट्टी पिलाकर उन्हें कुंद बुद्धि बनाए रखा गया. उन्होंने पूछा क्या कोई बतायेगा इन तमाम राष्ट्रवादी ताकतवर अमीर लोगों के बच्चे कभी उन स्कूलों में पढ़े जिन्हें ज्ञान मंदिर, बाल विद्या मंदिर और न जाने किन किन मंदिरों के नाम पर खोला गया. और गरीब सवर्णों को धर्म और वर्णव्यवस्था की शिक्षा देकर उन्हें मान्सिल तौर से अपाहिज बनाया गया.

श्री पुष्कर ने सवाल किया कि कोई गरीब सवर्ण बताये कि धर्म और वर्णव्यवस्था की राजनीति करने वालों ने उन्हें क्या दिया? अगर ये स्वामी जैसे लोग जो खुद को असली राष्ट्रवादी मानते हैं, तो बतायें कि दलितों, आदिवासियों, और अल्पसंख्यकों के बारे में बात करने की बजाय वह शख्स केवल एक जनवादी संस्था जेएनयू के पीछे ही क्यों पड़ा है? वैसे वर्णव्यवस्था और धूर्त आत्मघाती राष्ट्रवाद का साइकेडेलिक ड्रग्स पीने से तो अच्छा है, जेएनयू जैसे संस्थान से कुछ अच्छी बातें सीखी जाएँ. उन्होंने कहा कि रहा सवाल जेएनयू का, तो वहां आज भी बिना किसी भेदभाव के सामान रूप से हर तरीके से दुनिया भर में चल रही गतिविधियों की गहरी और वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित शिक्षा दी जाती है. सबसे अधिक बुद्धिजीवी इसी संस्थान से निकले हैं. चाहे वह वामपंथी रहे हों या फिर जनसेवक.

पुष्कर ने मांग की कि स्वामी इस बात का भी खुलासा करें कि किस कोर्स में कौन सी ऐसी किताबें हैं जो जेएनयू में राष्ट्रद्रोह बनाने के लिए पढ़ाई जाती है? कौन से अध्यापक हैं जो राष्ट्रद्रोह की शिक्षा देते हैं? अभी तो गनीमत समझिये कि जेएनयू के अध्यापकों ने मिलकर इन जैसे वर्णव्यवस्था के कुपमंडूक लोगों पर कुछ कहा नहीं है, वरना सारे अध्यापकों की एक आवाज़ से पूरी दुनिया में हंगामा मच सकता है. इन अध्यापको की आवाज में इतना दम है कि वे दुनिया को यह बता सकते हैं कि स्वयंसेवक और जनवादी ताकतों में क्या फर्क है और यह स्वामी अभी तक तो केवल देश भर में आलोचना का पात्र बना है अध्यापकों की एक आवाज़ इसे पूरी दुनिया में बेनकाब कर देगी.

सोचिये अभी तक जेएनयू के अध्यापकों का कोई बयान स्वामी के खिलाफ नहीं आया है इसका यह मतलब हरगिज नहीं है कि अध्यापक अब और अधिक देर तक खामोश रहेंगे. हमारे प्रिय अध्यापकों ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई राय इसीलिए नहीं दी है क्योंकि वे इस स्वामी को कतई गंभीर तरीके से नहीं ले रहे हैं. जिस दिन स्वामी ने अत्त जोत दी, क्या हमारे अध्यापक चुप बैठेंगे. हरगिज़ नहीं.

पुष्कर ने कहा कि हम शुक्रगुजार हैं जेएनयू के अपने तमाम प्रिय अध्यापकों के, जिन्होंने हमें ऐसी शिक्षा दी है कि हम समाज में हो रहे अत्याचार और हिंसा, साम्प्रदायिकता, धर्मान्धता, और राष्ट्रद्रोह के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर सकें. और यह भी हमें हमारे अध्यापकों ने सिखाया है कि अगर कोई बहरूपिया राष्ट्रवाद और धर्म की बात करे तो उससे कैसे निबटना है. उसे सामाजिक तौर से चुनौती देकर उसकी हर बात का जवाब देकर उसे सही रास्ता बताने की शिक्षा हमें दी गई है. दोगले और पाखंडियों से लड़ने और जीतने की गुणवत्ता हमारी चेतना में भरी हुई है ताकि हम ऐसे राष्ट्रवादी को पहचान सकें जो जनता में पाखंड फैला रहा है और उसे समाज के सामने उसका असली चरित्र उजागर कर सकें.

उन्होंने कहा इस स्वामी को मैं अकेले चुनौती देता हूँ कि ये आये और मुझसे राष्ट्रवाद, धर्म और लोकतंत्र पर बात करे. मैं जेएनयू का छात्र रहा हूँ और मुझे यह बात खूब अच्छी तरह बताई पढाई गई है कि समाज के विकास में किन ताकतों की भूमिका रही है. और किन ताकतों ने देश-दुनिया को बर्बाद किया है. स्वामी के लिए एक छात्र ही काफी है जेएनयू का. अगर दम है तो चुनौती को स्वीकार करे. वरना राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह की फाएँ फाएँ करना बंद करे.