लोकतंत्र और आंबेडकर

आम्बेडकर ने संसदीय लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए क्या लिखा? अंबेडकर के अनुसार संसदीय लोकतंत्र का अर्थ क्या है? मजदूर के लिए स्वाधीनता का अर्थ क्या है?
 | 
लोकतंत्र और आंबेडकर

बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर की पुण्यतिथि पर विशेष | Special on the death anniversary of Babasaheb Bhimrao Ambedkar

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर को हमें आधुनिक मिथभंजक के रूप में देखना चाहिए। भारत और लोकतंत्र के बारे में परंपरावादियों, सनातनियों, डेमोक्रेट, ब्रिटिश बुद्धिजीवियों और शासकों आदि ने अनेक मिथों का प्रचार किया है। ये मिथ आज भी आम जनता में अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। बाबासाहेब ने भारतीय समाज का अध्ययन करते हुए उसके बारे में एक नयी सोच पैदा की है। भारतीय समाज के अनेक विवादास्पद पहलुओं का आलोचनात्मक और मौलिक विवेचन किया है। भारत में भक्त होना आसान है समझदार होना मुश्किल है। बाबासाहेब ऐसे विचारक हैं जो शूद्रों के सामाजिक ताने-बाने को पूरी जटिलता के साथ उद्घाटित करते हैं। बाबासाहेब के भक्तों में एक बड़ा तबका है जो दलित चेतना और दलित विचारधारा से लैस है।

आम्बेडकर की साफ धारणा थी कि संसदीय जनतंत्र, जनता की मूल समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। सन् 1943 में इंडियन फेडरेशन के कार्यकर्ताओं के एक शिविर में भाषण करते हुए आम्बेडकर ने कहा

“हर देश में संसदीय लोकतंत्र के प्रति बहुत असंतोष है। भारत में इस प्रश्न पर विचार करना अत्यंत आवश्यक है। भारत संसदीय लोकतंत्र प्राप्त करने के लिए बातचीत कर रहा है। इस बात की बहुत जरूरत है कि कोई यथेष्ठ साहस के साथ भारतवासियों से कहे-संसदीय लोकतंत्र से सावधान। यह उतना बढ़िया उत्पाद नहीं है जितना दिखाई देता था।”

इसी भाषण में आगे कहा ‘संसदीय लोकतंत्र कभी जनता की सरकार नहीं रहा, न जनता के द्वारा चलाई जाने वाली सरकार रहा। कभी ऐसी भी सरकार नहीं रहा जो जनता के लिए हो।’

भीमराब आम्बेडकर ने 1942 के रेडियो भाषण में स्वाधीनता,समानता और भाईचारा, इन तीन सूत्रों का उद्भव फ्रांसीसी क्रांति में देखा। उन्होंने कहा

“मजदूर के लिए स्वाधीनता का अर्थ है जनता के द्वारा शासन । संसदीय लोकतंत्र का अर्थ जनता के द्वारा शासन नहीं है।”

आम्बेडकर ने संसदीय लोकतंत्र की व्याख्या करते हुए क्या लिखा

“संसदीय लोकतंत्र शासन का ऐसा रूप है जिसमें जनता का काम अपने मालिकों के लिए वोट देना और उन्हें हुकूमत करने के लिए छोड़ देना होता है।”

आम्बेडकर ने लोकतंत्र को मजदूरवर्ग के नजरिए से देखा और उस पर अमल करने पर भी जोर दिया।

नेतागण जिस लोकतंत्र की बात कर रहे हैं वो मालिकों का जनतंत्र है। वे जिस तथाकथित लोकशाही की बार बार दुहाई दे रहे हैं वो मालिकों की लोकशाही है। इसके विपरीत भीमराव आम्बेडकर का मानना था जब तक पूँजीवाद कायम है तब तक सही मायनों में न स्वतंत्रता संभव है और न समानता। वास्तव अर्थ में समानता हासिल करने के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को बदलना होगा उसके बाद ही वास्तविक अर्थ में समानता प्राप्त की जा सकती है।

     इसके विपरीत नेतागण पूंजीवाद को बनाए रखकर ही नियमों में सुधार की बात कर रहे हैं।

आम्बेडकर की नजर में वास्तविक स्वतंत्रता का अर्थ है सभी किस्म के विशेषाधिकारों का खात्मा। नागरिक सेवाओं से लेकर फौज तक,व्यापार से लेकर उद्योग धंधों तक सभी किस्म के विशेषाधिकारों को खत्म किया जाए। वे सारी चीजें खत्म की जाएं जिनसे असमानता पैदा होती है।

आम्बेडकर की धारणा थी कि ‘लोकप्रिय हुकूमत के तामझाम के बावजूद संसदीय लोकतंत्र वास्तव में आनुवंशिक शासकवर्ग द्वारा आनुवंशिक प्रजा वर्ग पर हुकूमत है। यह स्थिति वर्णव्यवस्था से बहुत कुछ मिलती जुलती है। ऊपर से लगता है कोई भी आदमी चुना जा सकता है, मंत्री हो सकता है, शासन कर सकता है। वास्तव में शासक वर्ग एक तरह वर्ण बन जाता है। उसी में से,थोड़े से उलटफेर के साथ,शासक चुने जाते हैं। जो प्रजा वर्ग है, वह सदा शासित बना रहता है।’

O- जगदीश्वर चतुर्वेदी

पाठकों से अपील

Donate to Hastakshep

नोट - 'हस्तक्षेप' जनसुनवाई का मंच है। हम किसी भी राजनीतिक दल या समूह से संबद्ध नहीं हैं। हमारा कोई कॉरपोरेट, राजनीतिक दल, एनजीओ, कोई जिंदाबाद-मुर्दाबाद ट्रस्ट या बौद्धिक समूह स्पाँसर नहीं है, लेकिन हम निष्पक्ष या तटस्थ नहीं हैं। हम जनता के पैरोकार हैं। हम अपनी विचारधारा पर किसी भी प्रकार के दबाव को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए, यदि आप हमारी आर्थिक मदद करते हैं, तो हम उसके बदले में किसी भी तरह के दबाव को स्वीकार नहीं करेंगे।

OR

भारत से बाहर के साथी Pay Pal के जरिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।

Subscription