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लोकसभा चुनाव के बाद और मजबूत बनेगा पूंजीवादी-सांप्रदायिक गठजोड़

पूंजीवाद के समर्थक बन कर उतरे हैं गांधीवादी, समाजवादी और मार्क्‍सवादी एक्टिविस्ट, जनांदोलनकारी और बुद्धिजीवी
मतदाता ही मुकाबला करें पूंजीवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ का
नई दिल्ली। सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और प्रवक्ता डॉ. प्रेम सिंह ने कहा है कि गांधीवादी, समाजवादी और मार्क्‍सवादी एक्टिविस्ट, जनांदोलनकारी और बुद्धिजीवी पूंजीवाद के समर्थक बन कर उतरे हैं इसलिए पूंजीवादी.सांप्रदायिक गठजोड़ का मतदाता ही मुकाबला करें।
सोशलिस्ट नेता ने कहा, “अभी तक कांग्रेस,भाजपा और उद्योंपतियों से लेकर बुद्धिजीवियों तक सक्रिय नवउदारवाद समर्थक लॉबी कहती रही है कि देश में नवउदारवादी व्यवस्था पर सर्वानुमति बन चुकी है। नवउदारवाद के साथ सांप्रदायिकता की मजबूती पर उन्हें ऐतराज नहीं है। फर्क इतना है कि भाजपा कट्टर सांप्रदायिकता को आधार बनाती हैए कांग्रेस नरम सांप्रदायिकता को। राजनीति की तीसरी शक्ति कहलाने वाली पार्टियां, जो अपने सामाजिक आधार के चलते कुछ न कुछ सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का निर्वाह करती हैं, उनका मोर्चा नहीं बन पा रहा है। ऐसे में सोश्‍लिस्ट पार्टी का मानना है कि अगले महीने होने वाले लोकसभा चुनाव के बाद पूंजीवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ और मजबूत बनेगा।“
 सोशलिस्‍ट पार्टी यह भी मानती है कि नर्इ बनी आम आदमी पार्टी (आप) पूंजीवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ को मजबूत करने वाली है। भारतीय उद्योग परिसंघ में आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल उद्योगपतियों की मौजूदगी में साफ कह चुके है कि वे पूंजीवाद के पक्षधर हैं। आप में शामिल होने वाले गांधीवादी, समाजवादी और मार्क्‍सवादी एक्टिविस्टों, जनांदोलनकारियों और बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल द्वारा पूंजीवाद का समर्थन किए जाने पर आपत्ति उठाना तो दूर, सवाल भी नहीं उठाया है। जाहिर है, वे सब इस चुनाव में पूंजीवाद के समर्थक बन कर उतरे हैं। यह सफार्इ निरर्थक है कि वे संसद में पहुंच कर पूंजीवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ का विरोध करेंगे। श्आप के नेता प्रशांत भूषण का उदाहरण देखा जा सकता है। उनके सार्वजनिक क्षेत्र को वरीयता देने के विचार को केजरीवाल ने तत्काल खारिज कर दिया था।
डॉ. प्रेम सिंह ने कहा दरअसल, आप में शामिल गांधीवादी, समाजवादी और मार्क्‍सवादी उन हजारों कार्यकर्ताओं को ही धोखा नहीं दे रहे हैं जिन्होंने उनके साथ जीवन लगा दिया, संविधान को भी धोखा दे रहे हैं। जहां तक सांप्रदायिकता का सवाल है, आप स्‍पष्‍ट तौर पर भाजपा की बी टीम है। अरविंद केजरीवाल के नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने से इस सच्चार्इ में कोर्इ फर्क नहीं पड़ने वाला है। दोनों में मुकाबला अपने को बेहतर पूंजीवादी सिद्ध करने को लेकर हैए सांप्रदायिकता विरोध को लेकर नहीं। केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी के सांप्रदायिक फासीवादी चरित्र पर कभी उंगली नहीं उठार्इ है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के लिए यह गंभीर चुनौती और समाज के लिए गंभीर खतरे का समय है। पूंजीवादी.सांप्रदायिक गठजोड़ की जीत से अधिकांश आबादी की आर्थिक तबाही ही नहीं होगी, नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन तेज होगा और धार्मिक अल्पसंख्यक और ज्यादा असुरक्षित होंगे। सोशलिस्‍ट पार्टी का मानना है कि इस गंभीर चुनौती और खतरे का भारत के 80 करोड़ मतदाता ही मुकाबला कर सकते हैं। वे अपना मतदान संविधान की उद्देशिका में उल्लिखित समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र तथा संविधान में निहित नीति-निर्देशक तत्वों की कसौटी पर करेंगे तो अगली संसद में पूंजीवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ के के बरक्स कुछ स्वर बचे रह सकते हैं। सोशलिस्‍ट पार्टी इसी कसौटी पर आपसे वोट मांगने के लिए सीमित सीटों पर लोकसभा चुनाव में उतरी है।

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