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लोहिया का समाजवाद और ‘आज़ादी टूटी-फूटी’

लोहिया, आंबेडकर और गाँधी
कॅंवल भारती
(यह आलेख रोशन प्रेमयोगी के उपन्यास ‘आजादी: टूटी फूटी’ की समीक्षा नहीं हैं, पर उसके बहाने लोहिया के समाजवाद की आलोचना है।)
अगर मैं 25 सितम्बर को लखनऊ पुस्तक मेले में नहीं जाता और वहाँ भी अपने पत्रकार-उपन्यासकार मित्र रोशन प्रेमयोगी से भेंट न होती, तो मैं उनके नये उपन्यास ‘आज़ादी टूटी-फूटी’ से वंचित रह जाता। यह उपन्यास डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवाद की कहानी लगभग उन्हीं की जुबानी कहता है, जिसे प्रेमयोगी ने अपनी विशिष्ट कथा शैली में लिखा है। लेखक ने अपनी कल्पना में लोहिया जी के साथ उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों की यात्राएँ की है, जिनमें वे इतिहास की यात्रा भी करते हैं। एक पत्रकार के रूप में वे लाहिया जी से उनके समाजवाद पर सवाल करते हैं, और लोहिया जी उनके जवाब देते हैं, जो काफी विचारोत्तेजक हैं। चूँकि उपन्यास सन्दर्भ ग्रन्थ नहीं होता, इसलिए यह मानकर चला जा सकता है कि लोहिया के विचारों में लेखक ने ही अपने को व्यक्त किया है।
       उपन्यासकार ने लोहिया से अपनी बातचीत इक्कासवीं सदी के दूसरे दशक में की है, इसलिए यह दिखाना भी उपन्यासकार का मकसद लगता है कि लोहिया आज होते, तो आज के राजनीतिक हालात पर वे किस तरह सोचते। उपन्यास के नायक तो लोहिया ही हैं, पर उनसे संवाद उमाशंकर वर्मा करते हैं, जो पेशे से पत्रकार हैं। उमाशंकर लखनऊ के हजरतगंज में टहलते हुए डॉ. राममनोहर लोहिया से संवाद आरम्भ करते हैं। लोहिया अपने संवाद में हजरतगंज पर टिप्पणी करते हैं कि वह पूँजीवाद और लूटवाद का मिक्स वेंचर है। जहाँ वह वर्ग आता है, जिसके पास बहुत पैसा है। ऐसा पैसा जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में ब्लैक मनी कहते हैं। गरीबों, मजदूरों, किसानों की योजनाओं में से लूटा गया पैसा। आगे राजनीतिक चर्चा है, जो विमर्श को बाध्य करता है। लोहिया पत्रकार के बताने पर भी यह जानने की कोशिश नहीं करते कि कौन उनकी खड़ाऊं सिर पर लेकर चल रहा है और कौन उनके विचारों पर साम्प्रदायिकता का महल बनवा रहा है। वे उमाशंकर को बताते हैं- ‘जब मैंने इस देश में नेहरू के ‘राजतन्त्र’ के विरुद्ध संग्राम छेड़ा, तो मेरे मन में उन्हें हटाकर प्रधानमन्त्री बनने…की महत्वाकांक्षा नहीं थी। मैं सिर्फ इतना चाहता था कि यदि अमीरों की रसोई में पनीर पक रहा है तो गरीब को भी रोटी के साथ नमक मिला मट्ठा खाने का अवसर मिले।’ वे आगे बताते हैं- ‘मुझे पता था, संसद में सरकार से मेरे भिड़ने से क्रान्ति नहीं होगी। लेकिन मैं लड़ता रहा। नेहरू में इस बात का दम्भ था कि उन्होंने अपनी कूटनीति से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस से लेकर डॉ. आंबेडकर तक को किनारे लगा दिया, तो यह लोहिया किस खेत की मूली है। आज देखो, इस देश में नेहरू के गुलाब को पछाड़ कर, लोहिया के बबूल और हरसिंगार हरियाली का बाग बन रहे हैं।’
वे अपना संवाद जारी रखते हैं, ‘नेहरूवाद का शीशमहल समाजवाद की आँधी में चूरचूर हो गया, और कम्युनिस्टों के कहवाघरों के आगे लोहिया के विचारों के डाक बंगले बन गए। माना कि इस देश में बड़े कद के नेता नहीं हैं, लेकिन यह क्या कम है, एक अकेली गौरैया (ममता बनर्जी) ने इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में वामपंथियों को राजमहल से निकालकर उसी तरह बाहर कर दिया, जिस तरह लोहिया के विचारों ने संसद भवन से पंडित नेहरू के काँग्रेसवाद को बीसवीं सदी के 80 वें दशक में निकाला था। डॉ. भीमराव आंबेडकर की असमय मौत न होती तो दिल्ली में कश्मीरी गेट के पास काँग्रेस पार्टी की मजार बनवाकर मैं महात्मा गाँधी के सपने को पूरा करता। ऐसा करने से मुझे सोवियत रूस भी न रोक पाता।’ (पृष्ठ 6)
इस पर पत्रकार उमाशंकर लोहिया को आंबेडकर और गाँधी के बीच लम्बे वैचारिक संघर्ष की याद दिलाते हैं, ‘बाबासाहेब आंबेडकर ने तो पंडित नेहरू को वॉकओवर दे दिया था। उनकी लड़ाई तो महात्मा गाँधी से थी, जब तक जिन्दा रहे, वह गाँधीवाद से लड़ते रहे।’ लोहिया जवाब देते हैं, ‘वह देश और समाज की लड़ाई नहीं थी डियर, वह तो दो राजनेताओं का अन्तर्द्वन्द्व और हितों का टकराव था।..’ उमाशंकर लोहिया की बात से सहमति जताते हैं, तो लोहिया आगे कहते हैं- ‘महात्मा गाँधी कभी इस देश की संसद में कानून बनाने के लिए नहीं बैठे। प्रधानमन्त्री या फिर कैबिनेट मन्त्री बनकर उन्होंने देश का संचालन भी नहीं किया। उनसे फिर डॉ. आंबेडकर क्यों लड़ रहे थे, यह वे ही जानें, लेकिन मेरी राय यह है कि यदि महात्मा गाँधी ने गरीबों-दलितों-पिछड़ों और शोषितों के लिए पगडंडियों का निर्माण किया, तो डॉ. आंबेडकर को आगे बढ़कर राष्ट्रीय राजमार्ग बनाना चाहिए था। अक्तूबर 1947 में हम लोग मुम्बई में एक जलसे के बहाने मिले थे। मैंने उनसे अनुरोध किया कि चलिए गरीबों और वंचितों के हक के लिए मिलकर लड़ते हैं। मेरी भविष्य की आन्दोलन-नीति से वह सहमत थे। जातिवादी हाथियों को ट्रैंक्युलाइज करके उनकी शक्ति क्षीण करने के मेरे विचार भी उन्हें पसन्द आए थे। इससे मुझे उम्मीद बॅंधी थी एक नई जनवादी क्रान्ति की, जिसकी स्क्रिप्ट महात्मा गाँधी लिखते, और सूत्रधार डॉ. आंबेडकर व डॉ. लोहिया बनते। परन्तु शायद डॉ. आंबेडकर में ज्योतिबा फुले के विचारों पर आधारित रोडमैप पर मेरे साथ मिलकर आगे बढ़ने को लेकर हिचक थी, इसलिए एक दिन वह खुले तौर पर पं. नेहरू के पहलू में जाकर बैठ गए। यह वकील आंबेडकर की जीत और जननेता आंबेडकर की हार थी। उनकी तो धार्मिक भविष्यवाणी भी झूठी साबित हुई, सदी बीत गई परन्तु अब तक कोई बौद्ध क्रान्ति नहीं हुई है, और न आसार दिख रहे हैं।’
यहाँ ज्योतिबा फुले का जिक्र एकदम अप्रासंगिक है। जब स्क्रिप्ट गाँधी को लिखनी थी, तो रोडमैप भी गाँधी के विचारों पर ही बनना था। फिर फुले यहाँ किस अर्थ में आए हैं, जबकि इससे पूर्व लोहिया के सम्पूर्ण संवाद में कहीं भी ज्योतिबा फुले का प्रसंग नहीं आया है। सम्भवतः यह ड्राफ्ट की गलती है, जिसे नजरअन्दाज किया जा सकता है। 
…….. जारी
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