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वंशवाद विरोधी केजरीवाल का गांधीवाद !

देवेन्द्र सुरजन
आपा ने दिल्ली की पूर्वी दिल्ली सीट से महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी को कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित के विरुद्ध लड़ाने का निश्चय किया है। राजमोहन गांधी पहली बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। 80के दशक में वे भाजपा या जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप जबलपुर से लोकसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। काफी दिनों तक चुनावी समर में उन्होंने सपत्नीक बड़ी मेहनत की लेकिन विजयी सेहरा बिहार के मूल निवासी कांग्रेस प्रत्याशी मुंदर शर्मा के सर बंँधा।
मुंदर शर्मा जबलपुर से प्रकाशित एक दैनिक के सम्पादक हुआ करते थे। इसके पहले वे जबलपुर के महापौर भी हुआ करते थे। प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी वे रहे। लेकिन राजमोहन गांधी जो कि स्वयं भी पत्रकार थे और एक अंग्रेजी साप्ताहिक बम्बई से निकालते थे – शर्माजी के आगे टिक नहीं सके। शर्माजी ने उनके खिलाफ बहुत सा सप्रमाण सामान जुटा रखा था। उनमें से उन दिनों जो सबसे अधिक कारगर साबित हुआ वह श्री गांधी का एक सिन्धी महिला जिनका नाम शायद उषा था, से विवाह करना था।
चुनाव के दौरान श्री गांधी मेरे दफ्तर में दो बार आये और पर्याप्त समय लेकर आये लेकिन बापू के पौत्र होने का जादू चलाने में वे बिलकुल असफल हुए। चुनाव हारने के बाद वे एक बार फिर सक्रिय हुए जब आसाम में अगप का आन्दोलन चल रहा था और प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृत्व में हिंसक रूप ले रहा था। तब वे उस आन्दोलन के समर्थक बन गए और इतना कहने की हद तक चले गए कि असमिया लोग तो अपने चेहरे- मोहरे से भारतीय लगते ही नहीं और इस बिना पर उनकी भारत से अलग होकर एक नए सार्वभौमिक देश की मांग करना बिलकुल वाजिब है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनका इस तरह का खुला समर्थन देशद्रोह ही कहलाता लेकिन इस पर तब किसी ने अधिक तवज़्ज़ो नहीं दी और बात आई गई हो गई।
तीसरी बात जो मुझे राजमोहन गांधी के विषय में याद आती है वह है उनका दक्षिण अफ्रीक़ी राष्ट्रपति स्व. नेल्सन मंडेला का जेल से रिहाई के बाद भारत आना और उस यात्रा के दौरान उनका श्री राजमोहन गांधी द्वारा दूरदर्शन के लिए साक्षात्कार लेना। उस इंटरव्यू के लिए दूरदर्शन ने खासतौर से सेट बनाया था, उसमें कुछ बच्चों को भी रखा था और उन्हें अफ्रीक़ी गांधी से मिलवाया था। राजमोहन गांधी ने यों तो मंडेला से बड़ी सहजता से सवाल किये थे लेकिन जवाब देते समय शायद मंडेला ही इस बात से अनभिज्ञ थे कि भारत के लोग उन्हें कितना चाहते हैं। आशय यह कि न मंडेला मन से खुल पाए और न ही राजमोहन गांधी उन्हें सहज कर पाए। ज़ाहिर है दूरदर्शन ने यह काम उन्हें गांधी होने के नाते इस अपेक्षा से दिया था कि अफ़्रीकी गांधी – गांधी पौत्र से अपने अनुभव खुल कर सहज सरल और मुखरित होकर भारतवासियों से बाँट पायेंगे, लेकिन गांधी पौत्र दूरदर्शन के इस निश्छल प्रयोग में असफल रहे।
अपनी उम्र के अंतिम दौर में राजमोहन गांधी एक बार फिर चुनाव मैदान में उतर रहे हैं – बिना किसी अपेक्षा के उनकी जीत की कामना करना चाहिए जबकि आआपा बस उन्हें इस्तेमाल ही कर रही है।
फेसबुक पर राजमोहन गांदी के विषय में दिलचस्प टिप्पणियाँ आई हैं। मसलन -DrAshok Kumar Tiwari के अनुसार अभी तक राजमोहन गांधी का सामाजिक या राजनैतिक योगदान शून्य रहा है। मैंने इनकी पुस्तकें पढ़ी हैं और समझ में आया कि इनको इतिहास का एकपक्षीय ज्ञान है। इन्होंने अपने नाना राजगोपालाचारी की जीवनी लिखी थी और उस पर साहित्य अकादमी पुरूस्कार भी लिया। ये जबलपुर से चुनाव हारे थे और एक बार अमेठी से राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ कर भी हारे थे। ये सभी पार्टियों की गोद में बैठ चुके हैं, इस बार आम आदमी पार्टी की गोद में बैठ कर अपने पुराने चुनावी इतिहास को दोहराने वाले हैं।
Bhupendra Gupta Agam के अनुसार- राजमोहन गांधी ने जितने बार भी राजनीति में प्रयास किया वे असफल हुए हैं, क्योंकि वे उपयोग के मोके पर ही आते हैं, जब उपयोगकर्ता उपलब्ध होते हैं। इस बार भी उनका उपयोग हो रहा है और वंशवाद को घोर गलियाँ देने वाले केजरीबाल ने विशेष रूप से टिकट देते समय यह बताया कि वे गांधी जी के पोते हैं, इस तरस से उन्होंने बंशवाद का अपने हित में उपयोग भी कर लिया है।
Vir Vinod Chhabra लखनऊ के अनुसार- आप पार्टी राजमोहन गांधी को ऐसे क्षेत्र से चुनाव में उतार रही जिन्हें वहाँ के लोग नहीं जानते और वह वहाँ के लोगों को नहीं जानते। ऐसे में मुक़ाबला ऐसे व्यक्ति से हो जो पिछले दस साल से वहाँ का सांसद तो नाकों चने चबाने पड़ सकते हैं। फिर आप पार्टी ने दिल्ली वालों का दिल भी तो तोड़ा है। मुक़ाबला ज़बरदस्त होगा।
अभिनव मल्लिक, सुपौल बिहार ने लिखा है कि- दरअसल राजमोहन गांधी वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए बने हैं… अपने दादा, ‘महात्मा गांधी’ व् नाना ‘राजगोपालाचारी’ जैसे “अद्वितीय व्यक्तित्व” के पोता व् नाती होने के वावजूद राजमोहन गांधी के “जीन” में कुछ ट्रान्सफर नहीं हुआ… सचमुच नोबेल प्राइज से ऊपर का वैज्ञानिक खोज होगा।

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देवेन्द्र सुरजन, लेखक प्रतिष्ठित “देशबंधु” अखबार समूह के पूर्व निदेशक हैं।

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