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वनाधिकार पर क्षेत्रीय सम्मेलन

दुनिया के मज़दूरों एक हो  एक हो     –   एक हो                                 
जल  – जंगल और ज़मीन हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे
इक देश नहीं इक खेत नहीं हम सारी दुनिया माँगेंगे -फ़ैज़ अहमद ‘‘फै़ज़’’
अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन (कैमूरक्षेत्र) बिहार का
वनाधिकार पर क्षेत्रीय सम्मेलन
दिनांक 21-22 अक्टूबर 2013, कैमूर भभुआ-बिहार
 

प्रिय साथियों!

जैसा कि आप जानते हैं कि देश की संसद को आदिवासी वनाश्रित समुदायों के साथ हुये ऐतिहासिक अन्यायों की बात को स्वीकार करते हुये, देश के इतिहास में पहली बार उनके जंगल पर अधिकारों को मान्यता देने वाला कानून 15 दिसम्बर 2006 को पास करके एक साल बाद  लागू भी कर दिया गया था। चूँकि 66 वर्ष पूर्व देश अंग्रेजों से आज़ाद तो हुआ लेकिन आज़ादी की लड़ाई में सबसे ज़्यादा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाला देश के आदिवासी, अन्य वनाश्रित समुदाय व अपने अधिकारों से वंचित तबके तब भी आज़ादी से महरूम रह गये। खासतौर पर देश के वनक्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी-अन्य वनाश्रित समाज व इस समाज की महिलाओं को और अधिक गुलाम बना लिया गया और अंग्रेजों द्वारा वन-संसाधनों की लूट व लोगों की वनक्षेत्रों से बेदखली के लिये बनाई गयी वनविभाग जैसी संस्था और बड़ी-बड़ी कम्पनियों का वनों पर शासन तन्त्र मज़बूत करने के लिये नए-नए कानून बनाने शुरू कर दिये गये व पुराने 1927 के काले कानून भारतीय वन अधिनियम को और सख्त कर दिया गया। लेकिन दूसरी तरफ आदिवासी-वनाश्रित समाज के अन्दर लगातार फैलते आक्रोश के कारण इन तबकों ने अपने आन्दोलनों को भी तेज़ कर दिया व एक जगह पर इकट्ठा होने लगे। इन्हीं आन्दोलनों के दबाव में सरकार को देश के इतिहास में पहली बार आदिवासी-वनाश्रित समाज के जंगल पर हकों को स्थापित करने की मान्यता देने वाला वनाधिकार कानून बनाना पड़ा और जिसे 15 दिसम्बर 2006 को संसद में पारित भी कर दिया गया और 1 जनवरी 2008 से नियमावली बनाकर लागू भी।

लेकिन आज इस कानून को भी पास हुये लगभग 7 वर्ष बीत जाने के बाद भी (केवल कुछ उन जगहों को छोड़कर जहाँ लोग खुद अपनी सांगठनिक ताक़त से इसे लागू करने के लिये पहल कर रहे हैं व सफलता भी हासिल कर रहे हैं) इस कानून के वास्तविक क्रियान्वयन की प्रक्रिया ना सिर्फ अधर में ही लटकी हुयी है, बल्कि वनविभाग व बड़ी कम्पनियों के नुमाईंदों द्वारा वनाश्रित समाज व इस समाज की महिलाओं पर की जाने वाली जु़ल्म-ओ-ज़्यादती की सारी हदों को पार किया जा रहा है व इस कानून को लागू करने के लिये जिम्मेदार पुलिस व प्रशासन इनको मदद करने में जुटे हुये हैं और केन्द्र सरकार सहित प्रदेश सरकारें इस ओर से पूरी तरह से आँख बन्द किये हुये बैठी हैं।

बिहार, झारखण्ड व उ0प्र0 में कैमूर घाटी की पहाडि़यों पर बसे हमारे कई जनपदों कैमूर भभुआ, रोहताश, गढ़वा सोनभद्र, मिर्जापुर और चन्दौली, जो कि इन प्रदेशों के बड़े वनक्षेत्र वाले जनपद है और इनकी आबादी का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा आदिवासी-वनाश्रित समाज से है, इसके बावज़ूद इनमें कानून के सरकारी क्रियान्वयन की स्थिति कम-ओ-बेश यही बनी हुयी है, लेकिन यहाँ की वनाश्रित समाज की महिलाओं ने संगठित रूप से इस कानून में मान्यता दिये गये अधिकारों को हासिल करने के लिये पहल की व अपने अधिकारों को हासिल करने में सफलता भी प्राप्त की। लेकिन यहाँ वनविभाग, बड़ी कम्पनियाँ और सामन्ती तबकों ने यहाँ के आदिवासी-दलित अन्य वनाश्रित समाज पर तरह-तरह से हमले करने की कार्रवाईयों को तेज़ कर दिया है। यहाँ आन्दोलन के दबाव में वनाधिकार कानून के तहत कुछ गाँवों में ग्राम वनाधिकार समितियों का गठन ज़रूर हुआ, लेकिन इससे आगे की प्रक्रिया को चलाने के लिये प्रशासन हाथ पर हाथ रखकर बैठ गया है। संवैधानिक अधिकार और वनाधिकार कानून में दिये गये 13 विकास कार्यों के अधिकारों में शामिल स्वास्थ्य सुविधाओं को पाने के अधिकार के बावज़ूद जिला कैमूर के अधौरा क्षेत्र में आने वाले आदिवासी बहुल 104 गाँवों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने वाले सरकारी अस्पताल को नक्सलवाद पर नियन्त्रण करने के नाम पर यहाँ बैठायी गयी केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस का कैम्प बना कर उनके हवाले कर दिया गया है। गाँवों तक पहुँचने के लिये सड़कों की और रास्तों की यह स्थिति है कि रास्ते के नाम पर अधिकाँशतः बड़े-छोटे पत्थरों से अटे हुये हैं। ग्राम बड़वान तक पहुँचने के लिये जो रास्ते हैं उनका यह हाल है कि उन पर पैदल चलकर गाँव पहुँचना ही मुहाल है। वहीं हाल शिक्षा का है अधिकाँश स्कूल या तो माओवादियों द्वारा ध्वस्त किये जा चुके हैं जिन्हें अभी तक निर्माण नहीं किया गया है और जो बचे हैं वे स्कूल सेना के कब्ज़े में हैं। ऐसे में आदिवासियों को शिक्षा से वंचित रखने की सोची समझी साजिश की जा रही है।

साथियों! यह स्थिति जब से नई सरकार आयी है पूरे प्रदेश में चल रही है और बिहार में तो कानून के क्रियान्वयन की स्थिति इतनी दयनीय बनी हुयी कि यहाँ के अधिकारी खुले तौर पर कहने में गुरेज़ नहीं कर रहे कि ‘‘यहाँ वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की ज़रूरत ही नहीं है’’। केवल नक्सलवाद का हौवा खड़ा करके करोड़ों रुपये के पैकेज लाकर डकार जाना ही इनका धन्धा बना हुआ है। वनाधिकार कानून का वनविभाग व पुलिस प्रशासन द्वारा खुले आम उल्लंघन किया जा रहा है। वनाश्रित समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने वाले इस क्रान्तिकारी कानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया एकदम ठप कर दी गयी है, वनविभाग द्वारा कहीं हत्या करके, कहीं प्रशासन द्वारा गाँवों में पीएसी फोर्स, सी.आर.पी.एफ आदि लगाकर तो कहीं जापान की जायका कम्पनी द्वारा वृक्षारोपण के नाम पर लोगों के हाथ से उनके हक़ वाली ज़मीनों को छीनने की कोशिश की जा रही है। जबकि वनाधिकार कानून के आने के बाद वनविभाग जंगल क्षेत्र में ऐसी किसी भी कार्रवाई को अंजाम नहीं दे सकता। कैमूरक्षेत्र में एक लम्बे समय तक आदिवासी-वनाश्रित समाज के अधिकारों के लिये जीवनपर्यन्त लड़ने वाले डा0 विनियन ने कैमूर क्षेत्र में स्वायत्त परिषद बनाने व इस क्षेत्र को पाँचवी अनुसूची में शामिल करने की माँग उठायी थी व संघर्ष किया था, यह महत्वपूर्ण मुद्दे भी वहीं अपनी जगह पर आज भी खड़े हुये हैं। लेकिन दूसरी ओर वनाश्रित समुदायों के लोग भी अपने संघर्षों को तेज़ कर रहे हैं और ये सभी संघर्ष महिलाओं की अगुआई में लड़े जा रहे हैं। यहाँ अधौरा ब्लाक के बड़वान गाँव की महिलाओं ने तय किया है कि वे अपने गाँव तक पहुँचने के पथरीले और ऊंचे नीचे पहाड़ी मार्ग को साफ व समतल बनाकर खुद रास्ते का निर्माण करेंगी, इसके लिये उन्हें सरकारी सहायता मिले या नहीं मिले। जैसा कि आपको विदित होगा कि वनाधिकार कानून में सितम्बर 2012 में कुछ संशोधन भी किये गये हैं। इन संशोधनों में वनाश्रित समाज के जंगल व जंगल की तमाम तरह की लघुवनोपज को अपने परिवहन संसाधनों से बे रोक-टोक लाने, स्वयं इस्तेमाल करने व अपनी सहकारी समितियां-फैडरेशन आदि बनाकर बाज़ार में बेचने के मान्यता दिये गये अधिकारों को और अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। चूँकि यहाँ कैमूर क्षेत्र के जंगल में महुआ, प्यार(चिरौंजी) आदि जैसी तमाम लघुवनापजों और जड़ी-बूटियों का अकूत भण्डार है, जिसमें यहाँ के लोगों के लिये आजीविका के असीमित स्रोत छुपे हुये हैं, जिन्हें आज तक वनविभाग व वनमाफियाओं ने अपनी अन्धी कमाई के लिये इस्तेमाल किया है और कर रहे हैं। इस अधिकार को पाने के लिये वनाधिकार कानून की नियमावली संशोधन-2012 में एक और नए तीसरे दावे को वनसंसाधनों पर अधिकार के दावे के रूप में दिया गया है, जिसे सबसे पहले भरकर अपना दावा ग्राम समितियों के माध्यम से उपखण्डस्तरीय समिति को सौंपना नितान्त आवश्यक है। इन सभी कार्यों को करने व अपने संघर्षों की धार को और तेज़ करने के उद्देश्य से यूनियन द्वारा कई तरह के कार्यक्रम भी तय किये जाने हैं।

जैसा कि आपको यह भी विदित है कि हमने संगठन व संगठन के संघर्षों के बढ़ते हुये स्वरूप को देखते हुये इसी वर्ष दिनाँक 3 से 5 जून को पुरी-उड़ीसा में एक सम्मेलन आयोजित करके अपने संगठन राष्ट्रीय वन-जन श्रमजीवी मंच को अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन के रूप में तब्दील कर दिया है। साथियों यूनियन की सारी ताक़त उसके सदस्यों व सदस्यों की संख्या में होती है। हमने पुरी में सामूहिक रूप से यह भी संकल्प लिया था कि हम इस वर्ष के अन्त तक केवल बिहार से 25000 की संख्या में सदस्यता बनायेंगे। यूनियन की मज़बूती के लिये यूनियन के सदस्यता अभियान को तेज़ी देने व अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिये सरकारों पर दबाव बनाने के उदे्श्य से उ0प्र0 के विभिन्न वनक्षेत्रों और प्रदेश के आस-पास के प्रदेशों उत्तराखण्ड, बिहार, मध्य प्रदेश आदि में यूनियन के सम्मेलन आयोजित करना व अन्त में आने वाले लोक सभा चुनावों से पूर्व ही दिल्ली में एक विशाल प्रदर्शन करने का भी यूनियन द्वारा निर्णय लिया गया है। जिसमें देश भर के वनक्षेत्रों से कम से कम एक लाख की संख्या में आदिवासी वनाश्रित समाज की महिलाएं व लोग तथा वनाधिकार कानून के मुद्दों पर काम करने वाले जनसंगठनों व मददगार मित्र संगठनों के लोग इकट्ठा होकर संसद भवन के सामने प्रदर्शन करेंगे व केन्द्र सरकार से सवाल पूछेंगे कि कानून आने के बाद 7 सालों में दोबार सत्ता पर काबिज रहने के बावजूद आखिरकार वनाधिकार कानून को क्यूँ ठण्डे बस्ते में डाला गया है और वन विभाग व सरकारों द्वारा वनाश्रित समाज के बीच फैलाये जा रहे आतंक पर क्यूँ कोई रोक नहीं लगायी जा रही है?

साथियों! इसी कड़ी में हम दिनाँक 21-22 अक्टूबर 2013 को यहाँ कैमूर के वनक्षेत्र में जीवन पर्यन्त आदिवासी वनाश्रित समुदायों के अधिकारों के लिये व वनाधिकार कानून को लाने के संघर्ष में शामिल डा0 विनियन का स्मरण करते हुये अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन का क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित करने जा रहे हैं। इस सम्मेलन में कैमूर क्षेत्र बिहार के अधौरा, रोहताश, झारखण्ड गढ़वा उ0प्र0 के जनपद सोनभद्र, मिर्जापुर, चन्दौली,  व अन्य वन क्षेत्रों तराई लखीमपुर खीरी, गौण्डा, बहराईच, पीलीभीत, बुन्देलखण्ड चित्रकूट कर्वी, मानिक पुर, बांदा, मध्यप्रदेश रीवा, पश्चिमांचल सहारनपुर, उत्तराखण्ड राजाजी नेशनल पार्क व इनके अलावा देश के कई हिस्सों से वनाश्रित समाज के लोग व वनाधिकार के मुद्दों पर काम करने वाले जनसंगठनों व मददगार संगठनों के नेतृत्वकारी प्रतिनिधिगण व संवेदनशील नागरिक समाज के अन्य बुद्धिजीवी वर्ग के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल होंगे। आपसे अपील है कि बड़ी से बड़ी संख्या में इसमें शामिल होकर अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन के बिहार कैमूरक्षेत्र के इस क्षेत्रीय सम्मेलन को ऐतिहासिक रूप से सफल बनाने में हिस्सेदारी निभायें। दोनों दिन के कार्यक्रम जिला कैमूर मुख्यालय भभुआ में आयोजित किये जायेंगे। दिनाँक 21 अक्तूबर 2013 को दिन में हम भभुआ की सड़कों पर एक विशाल रैली निकालेंगे व शाम को 4 बजे यूनियन के सम्मेलन की शुरूआत की जाएगी। 22 अक्तूबर को सम्मेलन में कार्यकर्ताओं के लिये वनाधिकार कानून संशोधन-2012 का दावा भरने के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जायेगा।

ऐ ख़ाकनशीनों उठ बैठो, वो वक़्त क़रीब आ पहुँचा है

जब  तख़्त गिराए  जाऐंगे, जब ताज  उछाले  जाऐंगे – ‘‘फै़ज़’’

 
कैमूर मुक्ति मोर्चा, कैमूर क्षेत्र महिला-मज़दूर किसान संघर्ष समिति, अखिल भारतीय वन-जन श्रमजीवी यूनियन

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