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वर्धा में ‘मृच्छकटिक’

संस्कृत के कालजयी नाटक
‘मृच्छकटिक’ का हिंदी वि.वि.में मंचन
चौदह सौ वर्ष के सामाजिक परिदृश्‍य को छात्रों ने किया प्रस्‍तुत
बी. एस. मिरगे
वर्धा, दि.31 अक्‍तूबर 2013: इतिहास में करीब चौदह सौ बरस पहले राजा व नाटककार शूद्रक द्वारा रचित संस्कृत के कालजयी नाटक ‘मृच्छकटिक’ (मिट्टी की गाड़ी) का मंचन महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के नाट्यकला एवं फ़िल्म अध्ययन विभाग ने विवि के हबीब तनवीर सभागार के प्रांगण में बुधवार को किया गया। मूल में यह नाटक तकरीबन 11 घंटे का है जिसका हिंदी में अनुवाद हिंदी सुविख्‍यात नाटककार मोहन राकेश ने किया। इस नाटक का निर्माण नाट्कला एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. सुरेश शर्मा ने तथा संपादन, पुनर्लेखन एवं निर्देशन विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. सतीश पावडे का था।

नाटक के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि एक व्‍यापारी आर्य चारुदत्‍त और नगरवधु वसंत सेना इनके बीच प्रेम पनपता है। तब का राजा पालक और उसका शालक शकार की अत्‍याचारी सत्‍ता के खिलाफ गोपालक आर्यक संघर्ष करता है। इनके इर्दगिर्द नाटक की पूरी कहानी प्रस्‍तुत की गयी है। नाटक में सतही प्रेम और गहरी क्रांति के साथ सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक जीवन के संघर्ष को उतारा गया है। नाटक की विशेषता है कि इसमें वेश्‍या को नायिका के रूप में प्रस्‍तुत किया है। परंपरागत नियमों को लांघता यह नाटक तत्‍कालीन संघर्ष की छटा बिखेरता है।

नाटक का सह निर्देशक और नृत्य निर्देशन विभाग की शोधार्थी सुरभि विप्लव ने किया। सहायक निर्देशन तथा रूप और वस्त्र विन्यासन सुनीता थापा का था। इस नाटक में विभाग के छात्र कृष्ण मोहन, प्रीतेश पाण्डेय, कविता सिंह चौहान, प्रखर सक्सेना, अनिल शर्मा, मृदुल शर्मा , मुकेश जयसवाल,  गौरव जांगिड, प्रेम कुमार, रंजित मोहने, गौरी शंकर ठाकुर, मेघा दत्त, पियूष पाण्डेय ने अभिनय किया। मंच विन्यास, प्रकाश योजना धर्मप्रकाश ‘मंटो’ का था। संगीत निर्देशन रवीन्द्र मुंडे का था। रूप-वस्त्र सज्जा में नितप्रिया प्रलय, रश्मि पटेल ने सहायता की। मंच सज्जा सहायक के रूप में विवेक कुमार, जफर पठान तथा प्रस्तुति सहायक के रूप में प्रगति मिरगे, सौरभ पांडे, हेमा ठाकरे, आश्विन श्रीवास व प्रमोद चौहान अदि ने भूमिका निभाई। प्रस्तुति मार्गदर्शन डॉ. ओमप्रकाश भारती, डॉ. विधु खरे-दास, डॉ.रयाज हसन, डॉ. हिमांशु नारायण का रहा।

नाटक के निर्देशक डॉ. सतीश पावडे ने प्रभावी रूप से इस नाटक का पुनर्लेखन कर हिंदी में  छह घंटे के इस नाटक को मात्र एक घंटा तीस मिनट में प्रस्तुत किया। उन्‍होंने निर्देशन द्वारा चौदह सौ वर्ष पूर्व का वातावरण तैयार कर श्रोताओं को उस परिस्थिति का आभास कराया। नाटक के आशय और प्रासंगिकता को छात्रों ने बखूबी प्रस्तुत किया। मंचन के दौरान हिंदी के प्रसिद्ध कवि एवं आवासीय लेखक ऋतुराज, मुंबई विश्वविद्यालय के थिएटर अकादमी के असोसिएट प्रोफेसर डॉ. मंगेश बनसोड, मुक्त फोटो पत्रकार शेखर सोनी, साहित्‍य विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. के.के. सिंह, प्रो. अनिल पांडे, डॉ. रामानुज अस्थाना, डॉ. अशोक नाथ त्रिपाठी, डॉ. बीरपाल सिंह यादव, डॉ. प्रीति सागर, डॉ. रूपेश कुमार सिह, डॉ. अवंतिका शुक्ला, जनसंपर्क अधिकारी बी.एस. मिरगे सहित बड़ी संख्‍या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

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