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वह ‘बदमाश लोग’ कौन थे, जनाब भागवत ?

आईने में अपना अक्स !
सुभाष गाताडे
(समकालीन तीसरी दुनिया के आगामी अंक में प्रकाशित)
‘बिल्ली आँख मूँद कर दूध पीती है और सोचती है कि दुनिया उसे देख नहीं रही है’
– मराठी कहावत
ऐसे मौके कम ही आते हैं कि एक अदद ‘साक्षात्कार’ लगभग नौ दशक पुराने संगठन में हड़कम्प मचा दे !
पिछले दिनों ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला, जब ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ और उसके आनुषंगिक संगठन, बदहवासी के साथ एक के बाद एक प्रतिक्रिया करते दिखे। हुआ यूँ कि संघ प्रचारक के तौर पर अपनी सामाजिक जिन्दगी शुरू किये एक शख्स स्वामी असीमानन्द- जो इन दिनों आतंकी घटनाओं में शामिल होने के चलते सलाखों के पीछे है- ने एक अग्रणी अंग्रेजी पत्रिका को अपना साक्षात्कार दिया, जिसमें उसने यह बताया कि किस तरह उसके द्वारा अंजाम दी गयी आतंकी घटनाओं में संघ के वरिष्ठ नेताओं, खासकर संघ सुप्रीमो मोहन भागवत की मिलीभगत थी। (http://www.caravanmagazine.in/reportage/believer )
साक्षात्कार फरवरी माह के अंक में प्रकाशित हुआ और गोया हड़कम्प मच गया। हाल के समयों में यह पहली दफा था कि आतंकी घटनाओं में संलिप्तता के लिये खुद सरसंघचालक का नाम उछला हो। यूँ तो देश के अलग अलग भागों में हुयी आतंकी घटनाओं के लिये – जिनमें हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ताओं की सहभागिता नज़र आयी थी – वहाँ ऐसी जमातों के कई अग्रणियों के नाम सामने आते थे, मगर वर्तमान संघ सुप्रीमो का नाम सीधे पहली बार सुनने को मिल रहा था।
बाद में संघ की तरफ से कहा गया कि यह साक्षात्कार ‘मनगढ़ंत’ है और उसकी तरफ से कथित तौर पर असीमानन्द की लिखी एक हस्तलिखित प्रति भी जारी की जिसमें इसी बात की ताईद की गयी थी, जबकि पत्रिका अपने दावे पर अडिग रही और उसने इस संघ प्रचारक से आतंकवादी बने इस शख्स के साथ हुयी बातचीत के टेप तथा अन्य विवरण भी सार्वजनिक कर दिये।
अब इतना होने के बाद संघ के लिये कमसे कम मामला समाप्त होना चाहिए था। मगर मामला रूका नहीं। इस बात को तो संघ के अग्रणी ही बता सकते हैं कि किस वजह से उन्होंने इस साक्षात्कार में- जिसे उन्होंने मनगढ़ंत करार दिया था- उभरे विभिन्न पहलुओं को लेकर अपना ‘स्पष्टीकरण’ देना जरूरी समझा और फिर एक बार स्वामी असीमानन्द उर्फ नबा कुमार सरकार, जो तीन दशक तक संघ का अनुशासित कार्यकर्ता था, उससे अपने सम्बन्ध समाप्ति का ऐलान करना जरूरी समझा।
जानकारों की बात करें तो इस विचित्र से लगने वाले व्यवहार की वजह समझ में आ जाती है। जैसा कि हम पहले ही उल्लेख कर चुके हैं कि हाल के समयों में यह पहली दफा था कि संघ सुप्रीमो पर ऐसे आरोप लगे हैं। यह वही सुप्रीमो हैं जो कुछ माह में ‘किंगमेकर’ घोषित किये जा सकते हैं बशर्ते उनके द्वारा वज़ीरे आज़म के पद के लिये जिस अन्य प्रचारक पर दांव लगाया गया है, वह उस स्थान पर पहुँच सके। जाहिर था सुप्रीमो खुद सन्देह के घेरे में हो और विभिन्न पार्टियों द्वारा पूरे मामले की गहराई में जाँच करने की माँग की जा रही हो, तब ‘परिवारी’ संगठनों में बदहवासी कोई अनोखी बात नहीं थी। उदाहरण के तौर पर संघ द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि ‘असीमानन्द कभी भी संघ में नेता नहीं था’ और ‘ऐसी रिपोर्टें शरारतपूर्ण और गुमराह करनेवाली’ हैं। डॉ. मनमोहन वैद्य, जो इन दिनों अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख हैं, उन्होंने कहा कि ‘स्वामी असीमानन्द ने कभी भी संघ में जिम्मेदारी का पद नहीं लिया’      (http://www.truthofgujarat.com/orphaning-swami-aseemanand-nathuram-godse-typical-tales-disownment-rss/selection_256/ ) । जनाब वैद्य के बारे में यह तथ्य भी गौरतलब है कि इसके पहले वह संघ की तरफ से गुजरात के प्रभारी थे, यह वही दौर था जब स्वामी असीमानन्द डांग जिले में ईसाई विरोधी मुहिम का संचालन कर रहा था और मक्का मस्जिद, समझौता बम धमाका या अजमेर शरीफ बम धमाकों की साजिश रच रहा था।
वैसे जनाब वैद्य को यह सूचना किसी को देनी चाहिए थी कि कुछ साल पहले संघ ने असीमानन्द के मसले पर जवाब देने के लिये उसके अन्य प्रवक्ता राम माधव को खड़ा किया था, और तब उन्होंने संघ के ‘आधिकारिक वक्तव्य’ के तौर पर कुछ अलग बात की थी। यह उन दिनों की बात है जब अजमेर शरीफ बम धमाका, मक्का मस्जिद विस्फोट, समझौता एक्स्प्रेस बम धमाके आदि कई अन्य धमाकों में संलिप्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ताओं के आतंकी मोडयूल का पर्दाफाश हुआ था – जिसमें देवेन्दर गुप्ता, लोकेश शर्मा, रामजी कलासांगरा, असीमानन्द, संदीप डांगे, सुनील जोशी आदि शामिल रहे थे, लम्बे समय से फरार चल रहे असीमानन्द को पकड़ा गया था। रामजी कलासांगरा, संदीप डांगे फरार ही चल रहे थे। उन्हीं दिनों फरवरी 2011 के दूसरे सप्ताह में आयोजित प्रेस सम्मेलन में राम माधव ने असीमानन्द प्रसंग पर बिल्कुल अलग किस्म की रौशनी डाली थी। माधव ने कहा था कि वर्ष 2006 में ही असीमानन्द ने संघ से नाता तोड़ दिया था।
किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि आखिर संगठन छोड़ने की सूचना तब क्यों दी गयी, जब खुद असीमानन्द पुलिस के शिकंजे में पहुँच गया। क्या यही बात पहले नहीं कही जा सकती थी जब वह भगौड़ा बना घूम रहा था ?
2.
 असीम आतंकवाद
इन्द्रेशजी मुझे वर्ष 2005 में शबरी धाम पर मिले। उनके साथ संघ के तमाम अग्रणी नेता थे। उन्होंने मुझे कहा कि बम फोड़ना मेरा काम नहीं है और मुझे आदिवासी कल्याण कामों पर केन्द्रित रहने को कहा गया। उन्होंने मुझे बताया कि इस काम के लिये (आतंकी हमले) उन्होंने सुनील जोशी को नियुक्त किया है और वह जो चाहिए वैसी मदद उसे करेंगे।
असीमानन्द की स्वीकृति, दिल्ली मैजिस्ट्रेट के सामने 18 दिसम्बर 2010
वैसे यह समझना अधिक मुश्किल नहीं है कि अचानक संघ ने बाहरी दुनिया को यह बताना क्यों जरूरी समझा कि असीमानन्द ने 2006 में ही संघ को छोड़ा था। एक वक्त था जब अख़बारों में इस आतंकस्वामी को लेकर ख़बरें छपती थीं, उस वक्त संघ बिल्कुल मौन रहा। उसके प्रवक्ता खामोश रहे। मगर जब कानून का शिकंजा कसने लगा तब आप बोलने लगते हैं तो इसके अलग निहितार्थ होते हैं। दरअसल टेरर गुरू असीमानन्द को लेकर अस्पष्टता आज तक चली आ रही है। उदाहरण के तौर पर देखें कि
क्यों आज तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने असीमानन्द को दिये गये सम्मान- स्पेशल गुरूजी सम्मान- को वापस नहीं लिया जो उसे ‘संघ की निष्ठा से सेवा’ करने के लिये गोलवलकर की जन्मशती पर दिया गया था (2005) ?
आखिर क्यों आज तक संघ से जुड़े वकील उसे कानूनी सहायता प्रदान कर रहे हैं, जब जोधपुर की अपनी पाँच दिनी बैठक के बाद (2010) -जबकि पुलिस ने उसके कई सारे कार्यकर्ताओं को आतंकी घटनाओं में संलिप्तता के चलते जेल में डाला था- उसने यह ऐलान किया था कि वह ऐसी गतिविधियों में मुब्तिला पाये गये किसी को कानूनी सहायता प्रदान नहीं करेगी ?
वे ‘बुरे तत्व’ कौन थे जिनके बारे में संघ ने जोधपुर मीटिंग के बाद सफाई दी थी, जिन्होंने या तो ‘संगठन को त्याग दिया’ या ‘जिन्हें संघ छोड़ने के लिये कहा गया’ और क्यों आज तक संघ से जुड़े और समविचारी संगठनों ने मिल कर – इस आपराधिक और आतंकी गठजोड से तौबा नहीं किया अर्थात् अपने सम्बन्धों की समाप्ति का ऐलान नहीं किया।
संघ-भाजपा नेताओं से असीमानन्द की नज़दीकी के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। डांग जिले में जब असीमानन्द सक्रिय था तब उसके द्वारा आयोजित शबरी कुंभ में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, संघ के पूर्व सुप्रीमो के एस सुदर्शन, और वर्तमान सुप्रीमो मोहन भागवत ने हाजिरी लगायी थी। इण्टरनेट पर ऐसे तमाम फोटोग्राफ्स आसानी से उपलब्ध है जो बताते हैं कि किस तरह संघ-भाजपा के यह तमाम महारथी असीमानन्द के आतिथ्य का लाभ उठाते रहे हैं। यह अकारण नहीं था कि नरेन्द्र मोदी की अगुआई वाली गुजरात सरकार ने संघ द्वारा ‘ढूँढे’ इस नए कुंभ के लिये आसानी से फंड उपलब्ध कराए।
अब जहाँ तक संघ का नज़रिया है, तो असीमानन्द का रिकॉर्ड ‘शानदार’ ही था। गुजरात के आदिवासीबहुल डांग में ‘ईसाई मिशनरियों के खिलाफ संघर्ष’ करने के पहले, उसने संघ की तरफ से कई स्थानों पर काम किया था और वह अंदमान में भी सक्रिय रहा था। निश्चित ही संघ के कर्णधारों के लिये यह सोचना भी मुश्किल रहा होगा कि अलसुबह वह अपने तथा अपने सहकर्मियों के अपराधों को लेकर मैजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 के अन्तर्गत लिखित स्वीकृति देगा – जिसे अदालत में सबूत के तौर पर रक्खा जा सकेगा। और इस अपराध स्वीकारोक्ति के बाद संघ के लिये हालात चुनौतीपूर्ण होने वाले थे। (देखें यह स्वीकारोक्ति www.tehelka.com पर)
हम देख सकते हैं कि इस स्वीकारोक्ति ने, इस कबूलनामे ने कुछ बातें स्पष्ट की थीं:
1. संघ के प्रचारकों का एक समूह निम्नलिखित बम धमाकों में शामिल था: मालेगांव 2006, अजमेर शरीफ धमाका 2007, समझौता एक्स्प्रेस ब्लास्ट 2007, मक्का मस्जिद बम धमाका 2007 और मालेगांव विस्फोट 2008
2. असीमानन्द द्वारा हस्ताक्षरित बयान के मुताबिक यह बम धमाके किन्हीं नामालूम अतिदक्षिणपंथी संगठनों की तरफ से नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य इन्द्रेश कुमार द्वारा अंजाम दिये गये थे जिसने इन आतंकी हमलों के लिये संघ प्रचारकों की एक टोली को तैयार किया था।
3. इन्द्रेश कुमार ने ही संघ प्रचारक सुनील जोशी को यह जिम्मा दिया था कि वह इन आतंकी हमलों की योजना बनाये और उन पर अमल करे और इसके लिये उसने तमाम मदद उपलब्ध करायी थी।
4. इन्द्रेश कुमार द्वारा उपलब्ध किये गये मुस्लिम युवकों ने अजमेर में बम रखे थे।
5. असीमानन्द को इस बात का डर था कि इन्द्रेश कुमार सुनील जोशी को मरवा सकता है।
( इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि बाद में असीमानन्द ने कहा कि उस पर दबाव डाल कर यह बयान दिलवाया गया, जो बात किसी को पचने वाली नहीं थी।)
संघ के लिये यह उसी किस्म की स्थिति थी, जिस किस्म की स्थिति से उसका साबिका महात्मा गांधी की हत्या के बाद पड़ा था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गोडसे तीस के दशक में संघ से जुड़ा था और वह संघ के संस्थापक-सुप्रीमो हेडगेवार के साथ दौरे पर भी जाता था। गांधीहत्या के बाद चले मुकदमे में उसने भले ही अदालत में यह कहा हो कि उसने संघ को छोड़ा था, मगर नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे ने ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका को दिये अपने साक्षात्कार में बाद में बताया था कि नथुराम का यह बयान संघ को बचाने के लिये था और उन भाइयों ने कभी भी संघ को छोड़ा नहीं था।( जनवरी 28, 1994, अरविन्द राजगोपाल)
अगर हम असीमानन्द की इस विस्फोटक स्वीकारोक्ति को फिर देखें तो पता चलता है कि वह हर कदम पर खुद को (अर्थात् असीमानन्द को भी) ‘लपेटती है’, यह जानते हुये कि अपनी इन करतूतों के लिये उसे सज़ा ए मौत भी हो सकती है। यह जानना अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि असीमानन्द की स्वीकारोक्ति में यह बात भी कबूल की गयी थी कि संघ प्रचारकों के बड़े नेटवर्क ने इन आतंकी हमलों को अंजाम दिया बल्कि संगठन के अन्य हिस्सों ने उन्हें कठिन समय में आसरा भी प्रदान किया।
राम माधव का वह वक्तव्य कि असीमानन्द ने संघ को छोड़ दिया था, दरअसल बहुत सुचिन्तित सा बयान था। उसमें एक ही बात स्पष्ट हो रही थी: केन्द्र और राज्यों की पाँच अलग अलग एजेंसियों द्वारा हिन्दुत्व के आतंकी नेटवर्क की जो उन दिनों जाँच चल रही थी और आए दिन जो नए नए खुलासे हो रहे थे, यहाँ तक कि सुनील जोशी हत्याकाण्ड में भी संघ प्रचारकों की संलिप्तता उजागर हुयी थी, उन सब घटनाक्रमों ने संघ को काफी चिन्तित किया था। एक क्षेपक के तौर पर यह जोड़ा जा सकता है कि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने इन तमाम आतंकी घटनाओं की जाँच का काम अभी हाथ में नहीं लिया था।
3.
प्यादों को छोड़ो, असली कर्णधारों का बचा लो
अजमेर दरगाह बम धमाके (2007) को लेकर राजस्थान पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) द्वारा पाँच अभियुक्तों के खिलाफ दायर आरोपपत्र में (22 अक्तूबर 2010) संघ के नेता इंद्रेश कुमार के बारे में कहा गया है कि- देश के अलग अलग शहरों में बम रखने की अतिवादी तत्वों की साजिश में – उसका ‘मार्गदर्शन’ प्राप्त था।
( देखें, ‘द हिन्दू, 24 अक्तूबर 2010)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों की अनियंत्रित भीड़ झण्डेवालान क्षेत्र के विडियोकॉन टावर्स के इलाके में बेकाबू हो गयी। टीवी टुडे नेटवर्क और मेल टुडे अख़बार के कार्यालयों पर तीन हजार से अधिक की भीड़ ने पथराव किये और शीशे तोड़े।
(मेल टुडे, नई दिल्ली 17 जुलाई 2010)
कितने लोगों को 16 जुलाई 2010 को राष्ट्रीय टीवी चैनल ‘हेडलाइन्स टुडे’ के दफ्तर पर हुये हमले की याद होगी जब हिन्दुत्ववादी संगठनों के हजारों कार्यकर्ताओं ने इस चैनल के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया था, क्योंकि उसका आरोप था कि पुलिस के पास उपलब्ध कुछ टेपों को इन चैनलों ने प्रदर्शित किया था।
दरअसल इन टेपों के जरिए यह बात स्पष्ट दिख रही थी कि अजमेर बम धमाके की योजना बनाते वक्त संघ नेता इंद्रेश कुमार की सहभागिता थी। इन टेपों के जरिए यह सच्चाई भी उद्घाटित हो रही थी कि किस तरह किन्हीं डॉ. आर. पी. सिंह ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति डॉ. हामिद अन्सारी की हत्या करने की योजना बनायी थी। ‘हेडलाइन्स टुडे’ ने 16 जुलाई 2010 को प्रसारित इस कार्यक्रम में मुसलमानों की सार्वजनिक सभाओं में किस तरह आतंकी हमले किये जाये इसके बारे में गोपनीय बैठकों के टेपों को भी दिखाया था। चैनल ने इस समय जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया था कि उसने जो विडिओ और आडियो टेप जारी किये हैं उन्हें जाँच एजेंसियों ने मालेगांव बम धमाके के एक अभियुक्त, शंकराचार्य दयानन्द पांडेय के लैपटॉप से हासिल किया था।
हमले के प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि हमले को अंजाम देने के पीछे सुविचारित रणनीति काम कर रही थी। स्पष्ट था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह कभी दावा नहीं किया कि उसके कार्यकर्ता इन हमलों में शामिल थे या उन्होंने उसमें हिस्सा लिया था, हालांकि उसने स्पष्ट कहा कि वह हमलावरों के ‘सरोकारों’ के प्रति हमदर्दी रखती है।
यह बात अब इतिहास हो चुकी है कि किस तरह संघ परिवार ने इंद्रेश कुमार के बचाव के काम को अंजाम दिया। ‘हेडलाइन्स टुडे’ चैनल पर हमले को एक तरह से हौसला हार चुके उसके कार्यकर्ताओं को सन्देश था कि उन्हें अब आक्रामक पैंतरा अख्तियार करना चाहिए। नवम्बर 2010 में संघ की पहल पर, संप्रग सरकार की ‘बदले की भावना का विरोध करने के लिये’ तथा ‘हिन्दुओं को बदनाम करने की उसकी नीति के खिलाफ’ एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। संघ के इतिहास में यह पहली दफा था कि संघ सुप्रीमो और उनके करीबियों ने विभिन्न रैलियों में साझेदारी की। इस मामले में गति बनाये रखने के लिये संघ ने फरवरी 2011 में राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रचार मुहिम भी चलायी जिसमें लोगों को यह बताया गया कि ‘संघ के खिलाफ लगाए गये आरोप कांग्रेसी षडयंत्र’ का नतीजा हैं।
यह कहना मुश्किल है कि संघ किस तरह अपने कार्यकर्ताओं/हमदर्दों को अपने कार्यकर्ताओं को लेकर दोहरे रूख को लेकर समझाता है। साधारण कार्यकर्ताओं के लिये एक किस्म के नियम बल्कि ऊँचे ओहदे पर पहुँचे कार्यकर्ताओं के लिये दूसरे तरह के नियम। मध्यप्रदेश में संघ के साधारण कार्यकर्ताओं ने संघ प्रचारक सुनील जोशी की हत्या को लेकर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा अपनाये ‘मौन’ पर सवाल उठाए थे।
हिन्दुत्व आतंक को लेकर हुये खुलासों को लेकर प्रतिक्रिया में, संघ परिवार एक बेहद दिग्भ्रमित तथा असंगत तथा बेहद निरूत्साहित जमावड़ा

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