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वाराणसी- चुनावी प्रपंच में फंसा वाम

आन्दोलन और इकंलाब के विकल्प से इतनी दूरी क्यों? #Left, #Modi, #Varanasi, #BJP, #Corporates
सीमा आज़ाद
जबसे मोदी ने बनारस से भी चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, बनारस और उत्तर प्रदेश की प्रगतिशील वाम ताकतें उनके खिलाफ एकजुट हो गयी हैं। कई जिलों की टीमें मिलकर बनारस में मोदी के खिलाफ अभियान चला रही हैं। यह सुखद है। परन्तु मोदी का विरोध करते हुऐ ये लोग जैसे ही उसका विकल्प लोगों को देने लगे, वैसे ही इस विरोध में एकता की बजाय दरार पड़ गयी साथ ही गड़बडि़यों की शुरूआत भी हो गयी। बहुत से वामपंथी कांग्रेस के अजय राय का विकल्प दे रहे हैं तो बहुत से लोग एन.जी.ओ. के साथ मिलकर आप के अरविन्द केजरीवाल का। ऐसा करके वे अनजाने ही मोदी विरोधी मतों को बांटने का काम कर रहे हैं। अगर अब बनारस से मोदी जीतते हैं तो इसके जिम्मेदार खुद ये मोदी विरोधी लोग भी होंगे।
            4 मई को बनारस में मोदी के विरोध में जब देश भर से वामपंथी प्रगतिशील विचारों वाले लोग कबीर मठ में इकट्ठा हुए तो उसमें से एकाध लोगों ने खुले तौर पर कुछ लोगों ने छिपे तौर पर मंच से ही विकल्प के तौर पर अजय राय या केजरीवाल को जिताने का आहवान कर डाला। इनमें से वे लोग जो बनारस जो बनारस में कई दिन से अपनी टीमों के साथ मोदी के विरोध में अभियान चला रहे हैं, से जब मैंने जनता को यूं बांटे जाने का विरोध जताया तो उन्होंने तर्क दिया कि मोदी को हराने के लिए यह जरूरी है, या यह कि ‘हम मजबूर हैं, जनता हमसे विकल्प पूछती है, हमें किसी का नाम लेन ही पड़ता है।’ इस सम्बन्ध में मैं दो बातें कहना चाहती हूं। पहली यह कि इस जगह पर जनता आपसे ज्यादा समझदार है, आपसे विकल्प पूछ कर वह यह टटोलना चाहती है कि आप वास्तव में किसका प्रचार कर रहें हैं। इसकी पुष्टि बनारस में ही हो गयी जब बी.एच.यू. से सटे एक मोहल्ले के लोगों ने मोदी विरोधी लोगों की पहचान इस तरह बतायी कि ‘हां उ अजय राय वाले लोगन आइल रहलें।’
            दूसरी बात यह कि यदि आपको मोदी का विरोध करते हुए विकल्प सुझाना ही है तो आन्दोलन और इकंलाब के विकल्प से इतनी दूरी क्यों? एन.जी.ओ. समूहों की तो इन विकल्पों से दूरी समझ में आती है, पर वामपंथी जो यह मानते और कहते हैं, कि साम्प्रदायिकता सहित तमाम समस्याओं का हल व्यवस्था परिवर्तन ही है, वे इस विकल्प से दूरी क्यों बना रहें हैं। मतलब साफ है कि वे खुद इसी व्यवस्था के प्रपंचों में उलझे हुए हैं। इस प्रपंच में उलझकर और जनता को भी इसमें उलझा कर वे दोनो का नुकसान कर रहें हैं, जनता का भी और खुद का भी। मान लीजिए कि इस बार मोदी नहीं बल्कि अजय राय बनारस से जीत जातें हैं और उनकी सरकार बन जाती है तो क्या कारपोरेटी हितों से पैदा जनविरोधी नीतियां नहीं लागू होंगी? क्या तब जनता की समस्या दूर हो जायेगी और बनारस की दरकती समरसता अक्षुण रहेगी? जाहिर है ‘नही’। ऐसे में बनारस की जनता के पास आप क्या मुंह लेकर जायेंगे।
            मोदी का विरोध होना चाहिए मैं इससे सहमत हूं इसीलिए बनारस के आयोजित सम्मेलन में गयी भी थी। परन्तु इस विरोध से मोदी को हराकर हम कोई बड़ी जंग जीत लेंगे, ऐसा मुगालता मुझे नहीं है। मोदी का विरोध एक प्रतीकात्मक विरोध है उस राजनीति का, जो फासीवाद की ओर बढ़ चुका है और मोदी जिसके सबसे बड़े वाहक हैं पर इसकी जमीन तैयार करने का काम कांग्रेस ने किया है। वास्तव में मौजूदा साम्प्रदायिक फासीवाद वैश्विक आर्थिक मंदी के गर्भ से निकला है। यह आर्थिक मंदी उस मुनाफाखोर अर्थनीति की देन है जो आवश्यक रूप से धरती के हर संसाधन पर कब्जे के एकाधिकार की ओर ही बढ़ती है। इस एकाधिकारी अर्थनीति से ही हर क्षेत्र में एकाधिकार की प्रवृति पनपती है जिससे राजनैतिक और साम्प्रदायिक फासीवाद का जन्म होता है। हमारे देश में इस अर्थनीति की नींव कांग्रेस ने रखी और बाकी चुनावी दलों ने उसका समर्थन किया। परन्तु वैश्विक मंदी के आज के दौर में जब साम्राज्यवादी कारपोरेट घरानों के लिए मुनाफा बढ़ाने का संकट आ खड़ा हुआ है, उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस उनके एजेण्डे को मनचाही गति से लागू नहीं कर पा रहा है। इस कारण उन्होंने ठेकेदार बदलने का निर्णय लिया और भाजपा के तानाशाह नेता मोदी की मीडिया लहर उठाई गयी। मोदी की अब तक की राजनीति यह दिखाती है कि वे इस एकाधिकारी पूंजीवाद को सिर्फ अर्थनीति में ही नहीं बल्कि राजनीति व संस्कृति में भी तेजी से लागू कर रहे हैं। समाज में एक धर्म का एकाधिकार व पार्टी में एक व्यक्ति के एकाधिकार की उनकी राजनीति खुलकर सामने आ चुकी है। इसलिए मोदी का विरोध इसी राजनीति को रोकने के लिए है, न कि उस कांग्रेस को जिताने के लिए है जिसने इस राजनीति की नींव डाली, या उस आप पार्टी को जिताने के लिए जो इस राजनीति में आने वाली बाधा को भ्रष्टाचार का नाम लेकर दूर करना चाहता है।
            मोदी का विरोध हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कारपोरेटी लूट को तेज करने के लिए और शोषण की व्यवस्था को बचाने के लिए उन्हें नये महारथी के रूप में हमारे सामने खड़ा किया गया है। हम इनसे लड़ंेगे, पर पुराने महारथियों या पीछे खड़े महारथियों को छोड़ नहीं देंगे। जबकि बनारस में मोदी का विरोध करने वाले लोग चुनावी भ्रमजाल में उलझकर बाकी महारथियों के साथ खड़े हो गये हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है, इस कवायद से जीते कोई भी, हार तो जनता की ही होगी। मोदी का विरोध करते हुए जरूरी नहीं कि आप चुनावी विकल्प ही दें, बल्कि यह उनके उपर ही छोड़ देना चाहिए और उन्हें यह बताना चाहिए कि तात्कालिक रूप से मोदी को हराने के लिए आप किसी को भी चुन सकते हैं, पर दूरगामी तौर पर समस्या के समाधान के लिए इन सबके खिलाफ जनआन्दोलन और इंकलाब ही एकमात्र विकल्प है। यह बताने का इससे अच्छा मौका भला और क्या होगा?

About the author

सीमा आजाद, लेखिका जानी-मानी सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता व दस्तक पत्रिका की संपादक हैं।

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