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वाराणसी लोकसभा चुनाव अभियान- बनारस न हार जाए कहीं

शेष नारायण सिंह
नई दिल्ली। बनारस के अस्सी घाट की पप्पू की चाय की दूकान एक बार फिर चर्चा में है। पता चला है कि बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के दावेदार, नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी के प्रस्तावक के रूप में पप्पू को भी जिला निर्वाचन अधिकारी के सामने पेश किया जायेगा। पप्पू की चाय की दूकान का ऐतिहासिक, भौगोलिक और राजनीतिक महत्त्व है। अपने उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ में काशी नाथ सिंह ने पप्पू की दूकान को अमर कर दिया है। “काशी का अस्सी” को आधार बनाकर एक फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्म का निर्माण लखनऊ के किसी व्यापारी ने किया है। डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी इस फिल्म के निदेशक हैं। नामी धारावाहिक “चाणक्य” की वजह से दुनिया भर में पहचाने जाने वाले डॉ चन्द्र प्रकाश द्विवेदी ने जब अमृता प्रीतम की कहानी के आधार पर फिल्म ‘पिंजर’ बनाई थी तो भारत और पाकिस्तान के बँटवारे के दौरान पंजाब में दर्द का जो तांडव हुआ था, वह सिनेमा के परदे पर जिंदा हो उठा था। छत्तोआनी और रत्तोवाल नाम के गावों के हवाले से जो भी दुनिया ने पिंजर फिल्म में देखा था, उस से लोग सिहर उठे थे। जिन लोगों ने भारत-पाकिस्तान के विभाजन को नहीं देखा उनकी समझ में कुछ बात आई थी और जिन्होंने देखा था उनका दर्द फिर से ताज़ा हो गया था। मैंने कई ऐसी बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ भी फिल्म “पिंजर” को देखा जो 1947 में 15 से 25 साल के बीच की उम्र की रही होंगीं। उन लोगों के भी आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। फिल्म बहुत ही रियल थी। लेकिन उसे व्यापारिक सफलता नहीं मिली।
काशी नाथ सिंह का उपन्यास “काशी का अस्सी” पप्पू की दूकान के आस-पास ही मंडराता रहता है। बताते हैं कि शहर बनारस के दक्खिनी छोर पर गंगा किनारे बसा ऐतिहासिक मोहल्ला अस्सी है। अस्सी चौराहे पर भीड़-भाड़ वाली चाय की एक दुकान है। इस दूकान पर रात दिन बहसों में उलझते, लड़ते- झगड़ते कुछ स्वनामधन्य अखाडिये बैठकबाज़ विराजमान रहते हैं। न कभी उनकी बहसें ख़त्म होती हैं, न सुबह शाम। कभी प्रगतिशील और लिबरल राजनीतिक सोच वालों के केंद्र रहे इसी अस्सी को केंद्र बनाकर इस बार नरेंद्र मोदी की पार्टी वाले वाराणसी का अभियान चला रहे हैं। इस अभियान में वाराणसी में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल को मोदी के समर्थक भगा देने के चक्कर में हैं। अरविन्द केजरीवाल जहां भी जा रहे हैं बीजेपी कार्यकर्ता उनके ऊपर पत्थर, टमाटर आदि फेंक रहे हैं। इन कार्यकर्ताओं के इस कार्यक्रम के चलते केजरीवाल का नाम देश के सभी टी वी चैनलों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया हुआ है। हालांकि सच्चाई यह है कि बनारस की ज़मीन पर अभी केजरीवाल का कोई नाम नहीं है।
बनारस में रहने वाले और पप्पू की दूकान को राजनीतिक समझ की प्रयोगशाला मानने वाले एक गुनी से बात हुयी तो पता चला कि अरविन्द केजरीवाल के साथ आये हुए लोग भी बनारस में अजनबी ही हैं। वाराणसी के पत्रकारों से चर्चा करने पर पता चला है कि नरेंद्र मोदी का मीडिया प्रोफाइल इतना बड़ा है कि उनकी हार के बारे में सोचना भी अजीब लगता है लेकिन यह असंभव भी नहीं है। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के मज़बूत उम्मीदवार हैं। समाजवादी पार्टी ने एक मंत्री को चुनाव में उतार दिया है। पूरे सरकारी तामझाम के साथ यह मंत्री चुनाव लड़ रहा है। जानकारों की राय है कि ज्यों-ज्यों चुनाव आगे बढ़ेगा, अरविन्द केजरीवाल की टीम को अंदाज़ लग जाएगा कि मीडिया में चाहे जितना प्रचार कर लें लेकिन बनारस की ज़मीन पर उनके लिए मुश्किलें पेश आयेगीं और आती ही रहेगीं।
अभी यह प्रचार कर दिया गया है कि मुसलमानों का वोट थोक में अरविन्द केजरीवाल को मिल रहा है। इसके कारण बीजेपी के रणनीतिकारों में खुशी है। उनको मालूम है की अगर बीजेपी विरोधियों के वोट बिखरते हैं तो नरेंद्र मोदी की लड़ाई बहुत आसान हो जायेगी।
लेकिन यह अभी बहुत जल्दी का आकलन है। काशी में कई दशक से पत्रकारिता कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि वाराणसी में नरेंद्र मोदी को सही चुनौती केवल अजय राय ही दे सकते हैं। वाराणसी के अलग-अलग चुनावों में अजय राय बड़े बड़े महारथियों को हरा चुके हैं। बनारस के कवि, व्योमेश शुक्ल बताते हैं कि ओम प्रकाश राजभर, ऊदल, सोनेलाल पटेल आदि कुछ ऐसे लोग हैं जिनको अजय राय ने हराया है। जिस तरह से अरविन्द केजरीवाल को हर चौराहे पर नरेंद्र मोदी के समर्थक अपमानित कर रहे हैं, उनकी हिम्मत नहीं पड़ेगी कि अजय राय के समर्थकों के खिलाफ हाथ उठायें। अजय राय के बारे में कहा जाता है कि उनको वाराणसी में हरा पाना बहुत मुश्किल है। एक बार तो किसी उपचुनाव में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री, मायावती ने अपने 23 मंत्रियों को वाराणसी में चुनाव प्रचार के काम में लगा दिया था लेकिन अजय राय निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत गए थे।
वाराणसी में यह चर्चा है कि अगर मुलायम सिंह यादव अमेठी और रायबरेली की तर्ज़ पर वाराणसी में भी अपना उम्मीदवार हटा लें तो मोदी की काशी की लड़ाई बहुत ही मुश्किल हो जायेगी। आज़मगढ़ से अपना परचा दखिल करके आज़मगढ़ और वाराणसी कमिश्नरी में मुलायम सिंह यादव ने बीजेपी उम्मीदवारों की जीत की संभावना को बहुत ही सीमित तो पहले ही कर दिया है।
बहरहाल इस चुनाव में हार जीत चाहे जिसकी हो, काशी वालों को डर है कि कहीं बनारस न हार जाए। यहाँ भलमनसाहत की एक परम्परा रही है। 1809 में पहली बार यहाँ एक बहुत बड़ा साम्प्रदायिक दंगा हुआ था। अंग्रेजों का राज था और कई महीनों तक खून खराबा चलता रहा था। लाट भैरो नाम के इस साम्प्रदायिक बवाल से हर बनारसी डरता रहा है। बनारस के पुराने प्रमियों से बात करके पता चलता है कि पिछली पीढ़ियाँ आने वाली पीढ़ियों को साम्प्रदायिक दहशत से आगाह कराती रहती हैं। यहाँ के लोगों को मालूम है कि चुनावों की तैयारियों में मुज़फ्फरनगर के दंगों का कितना योगदान रहा है। ख़तरा यह है कि राजनेता बिरादरी चुनाव जीतेने के लिए कहीं वैसा ही कुछ यहाँ न कर बैठे। बाकी भारत की तरह राजनीतिक बिरादरी को बनारस में भी शक की निगाह से देखा जाता है और यह माना जाता है कि नेता अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
पिछले कुछ दिनों से पप्पू की चाय की दूकान पर जिस तरह की राजनीतिक चर्चा चल रही है उस से साफ़ है कि इस बार का चुनाव बिलकुल वैसा नहीं होगा जैसा होना चाहिए, जैसा आम तौर पर बनारस में चुनावों में होता है।
आम बनारसी की इच्छा है कि चुनाव में मुख्य मुकाबले में ऐसा एक व्यक्ति ज़रूर होना चाहिए जिसको बनारस से मुहब्बत हो, जो बनारस की इज्ज़त और शान बचाए रखने के लिए चुनाव में हार जाना भी ठीक समझे। बनारस वास्तव में गरीब लोगों का शहर है। हालांकि यहाँ संपन्न लोगों की भी खासी संख्या है लेकिन शहर के मिजाज़ का स्थाई भाव गरीबी ही है। यहाँ गरीबी को भी धकिया कर मज़ा लेने की परम्परा है। कमर में गमछा, कंधे पर लंगोट और बदन पर जनेऊ डाले अपने आप में मस्त रहने वाले लोगों का यह शहर किसी की परवाह नहीं करता। कहते हैं कि लंगोट और जनेऊ तो आजकल कमज़ोर पड़ गए हैं लेकिन गमछा अभी भी बनारसी यूनीफार्म का अहम हिस्सा है। बिना किसी की परवाह किये मस्ती में घूमना इस शहर का पहचान पत्र है। अस्सी घाट की ज़िंदगी को केंद्र में रख कर लिखा गया काशी नाथ सिंह का उपन्यास और उसकी शुरुआत के कुछ पन्ने बनारस की ज़िंदगी का सब कुछ बयान कर देते हैं लेकिन उन सारे शब्दों का प्रयोग एक पत्रकार के लेख में नहीं किया जा सकता।

वास्तव में अस्सी बनारस का मुहल्ला नहीं है, अस्सी वास्तव में “अष्टाध्यायी” है और बनारस उसका भाष्य। पिछले पचास वर्षों से ‘पूंजीवाद’ से पगलाए अमरीकी यहाँ आते हैं और चाहते हैं कि दुनिया इसकी टीका हो जाए।। मगर चाहने से क्या होता है ?
इसी बनारस की पहचान की हिफाज़त के लिए गंगा के किनारे से तरह तरह की आवाजें आ रही हैं। लोगों की इच्छा है की मुख्य मुकाबले में कम से कम एक बनारसी ज़रूर हो। सबको मालूम है कि नरेंद्र मोदी तो हटने वाले नहीं हैं क्योंकि उनको प्रधानमंत्री पद के लिए अभियान चलाना है। इसलिए लोग उम्मीद कर रहे हैं कि अरविन्द केजरीवाल ही हट जाएँ क्योंकि वे बनारस में नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रचार करके, किसी गली मोहल्ले में थोडा बहुत पिट पिटा कर केवल ख़बरों में बने रह सकते हैं लेकिन बनारस के हर मोड़ पर वे मोदी वालों का रोक नहीं पायेंगे। मोदी और केजरीवाल को इस बात की परवाह नहीं रहेगी कि बनारस की इज्जत बचती है कि धूल में मिल जाती है। इसलिए अस्सी मोहल्ले के आस पास मंडराने वाले संत, असंत और घोंघाबसंतों की तमन्ना है कि मुकाबला नरेंद्र मोदी का ज़बरदस्त हो लेकिन उनके खिलाफ कोई बनारसी ही मैदान ले।
इस सन्दर्भ में मैंने एक बुढ़ऊ कासीनाथ से बात की। वे इन्भरसीटी में मास्टर थे, कहानियां-फहानियाँ लिखते थे और अपने दो चार बकलोल दोस्तों के साथ मारवाड़ी सेवा संघ के चौतरे पर अखबार बिछाकर उसपर लाई दाना फैलाकर, एक पुड़िया नमक के साथ भकोसते रहते थे। पिछले दिनों इन महोदय के बारे में प्रचार कर दिया गया था कि यह मोदी के पक्ष में चले गए थे लेकिन वह खबर झूठ फैलाने वालों की बिरादरी का आविष्कार मात्र थी। वे डंके की चोट पर नरेंद्र मोदी को हराना चाहते हैं और उनकी नज़र में कांग्रेसी उम्मीदवार अजय राय मोदी को एक भारी चुनौती दे सकता है। काशी नाथ सिंह ने बार-बार यह कहा है कि नरेंद्र मोदी को खांटी बनारसी चुनौती मिलनी चाहिए और वह इसी अस्सी की सरज़मीन से मिलेगी। उन्होंने मुझे भरोसा दिलाया कि बनारस में अस्सी के बाहर भी तरह की चर्चा सुनने में आ रही है।

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