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विमल गुरुंग की घीसिंग दशा अस्मिता राजनीति का नियतिबद्ध हश्र!

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

विमल गुरुंग की घीसिंग दशा अस्मिता राजनीति का नियतिबद्ध हश्र है। अस्मिता और पहचान की राजनीति के तहत बने तीन राज्यों उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड का हश्र यह देश देख चुका है। आदिवासियों की सबसे ज्यादा दुर्गति झारखंड और छत्तीसगढ़ में हो रही है तो उत्तराखंड में दांव पर है हिमालय। असम से अस्मिता और पहचान के आधार पर अलग हुये पूर्वोत्तर के राज्यों से बाकी देश का कोई योगायोग नहीं है, लेकिन वे अलग हुये पूर्वोत्तर के राज्य नगालैंड, मिजोरम, मेघालय और अरुणाचल न केवल अब भी बाकी देश से कटे हुये हैं, वहाँ पहचान की राजनीति केन्द्र की सत्ता पर निर्भर है और उसी के मुताबिक बदलती रहती है। पहचान की राजनीति की अगर बात करें तो सबसे शीर्ष पर है तमिलनाडु, जो द्रविड़ सभ्यता का धारक वाहक है और आर्य वर्चस्व के खिलाफ द्रविड़ राष्ट्रीयता के स्वाभिमान का प्रतीक है। हिंदी विरोधी तमिलनाडु में तमिल के अलावा बाकी सारी भाषाएं वर्जित हैं। लेकिन द्रमुक, अन्नाद्रमुक राजनीति की डोर दिल्ली के हाथों में है और तमिल राजनीति की हैसियत कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं है। गणित के नियम मुताबिक अलग बन रहे तेलंगाना का भी वही हश्र होना है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोमवार को कामतापुर मुक्ति संगठन (केएलओ) को चुनौती दी कि वह उनकी हत्या करे और साथ ही अलगाववादियों को चेतावनी दी कि वह राज्य में निर्दोष लोगों के खिलाफ हिंसा बन्द करें। हाल में सिलिगुड़ी के फूलबाड़ी स्थित कामरांगागुड़ी में मिनी सचिवालय उत्तारकन्या का शुभारंभ करते हुये वह विशाल जनसभा से मुखातिब थीं ममता बनर्जी।… उन्होंने गोरखा आंदोलनकारियों के साथ कामतापुरी आंदोलनकारियों को खुली चुनौती दे ते हुये कहा, ‘अलगाववाद-उग्रवाद किसी समस्या का हल नहीं है। जाति,भाषा व संस्कृति के नाम पर राज्य से अलग होने का वास्ता देकर युवाओं को बंदूक थमाने वालों को मुंहतोड़ जबाव देना होगा। मिनी सचिवालय ‘उत्तार कन्या’ परिसर से युवाओं का आह्वान करती हूं कि वे ऐसे लोगों के बहकावे में न आएं। ऐसे लोगों को समाज के सामने बेनकाब करें’।

बंगाल के पहाड़ों में अस्सी के दशक से अब तक जो हुआ या हो रहा है, उसमें अजूबा कुछ भी नहीं है। पृथक् गोरखालैंड आंदोलन से अलग राज्य तो नहीं मिला, लेकिन दार्जिलिंग लोकसभा क्षेत्र से गोरखों के पर्तिनिधित्व का सिलसिला ही खत्म हो गया। सुबास घीसिंग ने सबसे पहले दार्जिलिंग पत्रकार इंद्रजीत के हवाले कर दिया तो यह सिलसिला चल ही निकला। पिछले लोकसभा चुनावों में अलग राज्य के लिये भाजपा के समर्थन की आस में भाजपा के जसवंत सिंह को दार्जिलिंग का सांसद बना दिया आंदोलनकारियों ने तो इस बार बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ सत्ता में हिस्सेदारी के लिये सिक्किम के बाईचुंग भूटिया को लोकसभा पहुँचाने की गोरखों की मजबूरी है।

बताया जाता है कि बाइचुंग को दार्जिंलिंग से जिताने की दीदी की पेशकश पर विमल गुरुंग ने सहमति दे दी है और बंगाल से एकमात्र भाजपाई सीट बट्टाखाता में तो गयी ही, फिर एक बार गोरखा अस्मिता लोकसभा में अपने प्रतिनिधित्व से हाथ धो बैठी है।

दरअसल सुबास घीसिंग के जमाने में वाम शासन में जैसा कुछ हो गुजरा, हूबहू वही मां माटी मानुष के राज में गुरुंग जमाने में दोहराया जा रहा है। अस्मिता की राजनीति का व्याकरण भी यही है कि बड़ी मछलियाँ जैसे छोटी मछलियों को निगल जाती हैं, ठीक उसी तरह बड़ी अस्मिताएं छोटी अस्मिताओं को निगल जाती हैं और जम्हाई तक नहीं लेतीं। जाति, धर्म, क्षेत्र रंगबिरंगी तमाम अस्मिताओं का यही शाश्वत सच है। सिख अस्मिता का भगवाकरण अकाली राजनीति मार्फत हुआ तो अंबेडकरी बहुजन अस्मिता भी भगवाकरण की प्रक्रिया में है। झारखंडी और छत्तीसगढ़ी अस्मिताओं का तो पहले ही भगवाकरण हो गया है। देश अब लगभग नमोमय है, हो गया तो देखते रहिए भगवा रंग की अखंड क्रांति।

लेकिन बंगाल में अभी सारे रंग दीदी के मनपसंद हैं। दीदी ने हर चीज के रंग बदल दिये हैं। उनका बस चले तो सुहाग का निशान भी हरा बना दें। दाल भात का रंग भी हरा कर दें। क्या पता देर सवेर, वैसा हो भी जाये। बहरहाल, सुबास घीसिंग को पहाड़ से बाहर खदेड़ने वाले विमल गुरुंग, गोरखा आंदोलन के हिसाब से सुबास घीसिंग के ही अवतार में हैं। अश्व डिम्ब का प्रसव सम्पन्न हो रहा है पहाड़ों में। पहले एक स्वाशासी परिषद थी। दीदी ने पहले लेप्चा समुदाय के लिये अलग और फिर तमांग समुदाय के लिये एक और, तीन-तीन स्वशासी परिषद बना दिये। ऐसा खेल उत्तराखंड अलग राज्य बनने से लखनऊ से खूब होता रहा है। विश्वविद्यालय चाहिए तो कुमायूं  का अलग और गढ़वाल का अलग। विकास चाहिए तो कुमायूं विकास निगम अलग, गढ़वाल विकास निगम अलग।तराई हमेशा पहाड़ से अलग। अलग राज्य बन जाने के बावजूद अब भी कुमायूं, गढ़वाल और तराई के दरम्यान अंलघ्य अनंत दीवारें हैं, जिसे उत्तराखंडी अस्मिता तोड़ नहीं सकती।

गोरखालैंड आंदोलन के मध्य बंगाल में पहाड़ की जनता में अब चार चार विभाजक रेखाएं समांतर तैयार हैं, गोरखा, लेप्चा, तमांग और आदिवासी। कम से कम सुबास घीसिंग यह करतब नहीं कर सके जो विमल गुरुंग ने करके दिखा दिया।

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