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वीरेनदा की कविताएं अँधेरे के खिलाफ उजाले की आकांक्षा की अभिव्यक्ति हैं

आयेंगे उजले दिन जरूर …
कविता आवृत्ति और परिचर्चा सम्पन्न –
नई दिल्ली। जन संस्कृति मंच की ओर से बीती 4 सितंबर को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि वीरेन डंगवाल की कविता आवृत्ति और कविता पर परिचर्चा में कार्यक्रम की शुरुवात करते हुए इरफ़ान ने वीरेन दा की कविता सड़क का पाठ किया। यह कार्यक्रम एम.एम. कलबर्गी की याद को भी समर्पित था, जिनको हाल ही में अन्धविश्वास के खिलाफ लगातार बोलने के कारण कुछ अराजक तत्वों ने हत्या कर दी।

आलोचक आशुतोष कुमार ने वीरेन दा की कविताओं पर बोलते हुए कविता पर अपना लेख पढ़ा और उनकी कविता के हवाले से विस्थापन के दृश्य को चिन्हित किया। समकलीन समय की यह कविता मिथकों की एक खोई हुई दुनिया में प्रवेश करती है। कविता में विस्थापन के शिकार मनुष्य भी हैं और बन्दर भी। यह त्रासदी हिंदी कविता में शायद पहली बार दर्ज हुई है।

कविता आवृत्ति की अगली कड़ी में पंकज श्रीवास्तव और मनीषा ने संयुक्त रूप से उपस्थिति दर्ज कराई और उन्होंने कहा बीस वर्ष बाद यह मौका मिला है कविता गाने का। दो कवितायें हैं जिनको गायेंगे। इसकी धुन मनीषा ने बनायीं है। पहली कविता जिसको उन लोगों ने सांगीतिक रूप दिया वह है ‘ आयेंगे उजले दिन… उन्होंने कविता गीत के माध्यम से यह सिद्ध किया कि कविता की भावना के साथ यदि संगीत का जीवंत रिश्ता हो तो वह पाठक के दिल में उतर जाती है। और सही मायने में उन्होंने कविता गीत के माध्यम से समां बांध दिया और मनुष्य और मनुष्यता के जीत के भाव को मूर्त कर दिया।

दूसरी कविता जिसका उन्होंने संयुक्त पाठ किया वह है- ‘यह कौन नहीं चाहेगा कि’ …  इस कविता के माध्यम से उन्होंने समय के कालेपन को उजागर किया और पूंजीवाद के द्वारा रचे गए ‘काले’ संसार की सच्चाई को भी स्पष्ट कर दिया।

कार्यक्रम में पीपुल्स आर्टिस्ट ग्रुप की ओर से बनायीं गयी पोस्टर प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी जिसके लिए कलाकार अनुपम रॉय और उनके कलाकार साथियों को धन्यवाद दिया गया। राजधानी कालेज की प्रो। और प्रसिद्द कवयित्री सपना चमडिया ने कहा कि मैं कविता की सामाजिक संरचना और स्त्री बोध पर बात करुँगी। एक कविता है जिसमे वह कहते हैं कि मैं धरती के बारे में कुछ नहीं कहूँगा। मुझे दे दो यार मरदाना प्यार… कविता अच्छे ढंग से शुरू हुई है, लेकिन अंत मुश्किल है। ‘हम औरते’ कविता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि कविता केवल उलाहने में बदल जाती है कविता का इरादा ढह जाता है। इन कविताओं पर और भी बात होनी चाहिए।

कविता आवृत्ति की अगली कड़ी के लिए मालविका आयीं। ये लेडी श्रीराम कालेज में हिस्ट्री की स्टूडेंट हैं और थियेटर से जुडी हुई हैं। ‘दुश्चक्र में सृष्टा’ कविता की पंक्ति ‘कमाल है तुम्हारी कारीगरी का भगवान’ से शुरुवात करते हुए का सुन्दर पाठ किया।

वीरेन दा की कविताओं पर युवा आलोचक बृजेश ने कहा इस कालेपन की अंतर्विरोधी स्थिति की पहचान का मतलब क्या है। वीरेन जी की कविताओं में इस युग के मनुष्य की अंतर्विरोधी स्थितिया दर्ज हैं।

वीरेन जी की कविताओं पर बोलते हुए डॉ. उमा ने कहा कि आयोजन में जिस कविता को शीर्षक के बतौर रखा गया है वह पंक्ति एक- डेढ़ साल में कई बार याद आई। अच्छे दिनों के हवाले से वीरेन दा की अनेक कवितायेँ अँधेरे के खिलाफ उजाले की आकांक्षा की अभिव्यक्ति हैं । ऍफ़ टी आई आई जैसी घटनाओं के दौर में वीरेन दा की कविताये याद आती हैं।

वरिष्ठ कवि मदन कश्यप ने भी वीरेन दा की कविताओं पर महत्वपूर्ण बातें कहीं। वीरेन की कविता में साधारण जन के लिए एक ऐसी आत्मीयता है, जो पहले जनवादी कविता में भी दुर्लभ थी। इस आत्मीयता का विस्तार प्रकृति, पशु जगत और भाषा के संसार तक होता है। वीरेन की भाषा ऊपर से खिलंदरी लगती हुई भी अत्यंत गम्भीर आशय समेटे रहती है।

अमृत सागर ने कविता आवृत्ति के तहत ‘राम सिंह’ कविता का पाठ किया ।

लीलाधर मंडलोई ने वीरेन दा की कविताओं पर बोलते हुए कहा- उनकी कविताओं में दृश्य सघन समाज का है। पोलिटिकल विचार को लाने का जो तरीका है वह दूसरे कवियों से उनको अलग करता है। पशुओं का जिक्र जब आता है तो मुक्तिबोध की याद आती है। इतने साउंड्स और इतने विजुअल्स किसी और कवि के पास नहीं हैं।

कार्यक्रम में प्रो. कल्बर्गी की याद में एक मिनट का मौन रखा गया।

उसके बाद वीरेन दा ने खुद की लिखी कविता ‘होरी बाबू और दादू’ पढ़ा

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि असद जैदी ने कहा- बहुत खुशी की बात है कि प्रो. कल्बर्गी की हत्या के खिलाफ उदय प्रकाश ने अपना साहित्य अकादमी का पुरस्कार वापस कर दिया है। यह एक काउंटर रिवोलुशन है। यह अब लिबरल और सेक्युलर इन्टेलिजेंसिया को भी अपनी गिरफ्त में ले रहा है। राज्य मशीनरी तो इसके लिए पहले से ही तैयार हो रही थी। यह उभार सिर्फ हिन्दू-मुस्लिम का मामला नहीं रह गया है, हम ऐसी स्थिति में आ गये हैं कि हिंदू ही हिंदू से डर रहा है। यह एक फाइनल निशानी है फासीवाद की सफलता की। समकालीन कविता की स्थिति यह है कि वह लम्बे अर्से से विचारधारात्मक और राजनीतिक संकट से गुजर रही है।

वीरेन फासिस्ट उभार की आशंका को दिखाने वाले कवि हैं यही ऐतिहासिक स्थिति उनको बड़ा कवि बनाती है। वे सिर्फ आशा को जगाने वाले कवि नहीं हैं। इनकी कविताओं में ऐतिहासिक स्मृति बहुत लम्बी है। समकालीन कविता में समय का बोध कम होता जा रहा है। यह अगर है भी तो पाद टिप्पणियों की तरह ही। वीरेन आने वाले कवियों को एंटीसिपेट करते हैं। उन्होंने मीर तकी मीर की गजल पंक्ति से अपना वक्तव्य समाप्त किया।

अंत में जन संस्कृति मंच दिल्ली के संयोजक प्रसिद्द चित्रकार अशोक भौमिक ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का संचालन कवियित्री अनुपम सिंह ने किया ।

कार्यक्रम में सांस्कृतिक जगत की महत्वपूर्ण हस्तियाँ मौजूद थीं। इसमें कवि, कलाकार, पत्रकार, फ़िल्मकार, साहित्यकार, आलोचक सहित थियेटर से जुड़े हुए लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि मन मोहन, शुभा, विष्णु नागर, इब्बार रब्बी, योगेन्द्र आहूजा, पंकज बिष्ट, आनंद स्वरूप वर्मा, अनिल चौधरी, राधेश्याम मंगोलपुरी, कृष्ण कल्पित, बजरंग बिहारी तिवारी, रवि भूषण, रंजीत वर्मा, रीता डंगवाल, वंदना सिंह, गोपाल प्रधान, शिक्षाविद् राधिका मेनन, पत्रकार पंकज श्रीवास्तव, मनीषा, जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, रेखा अवस्थी, संजीव कुमार, बली सिंह, सुनीता, अनुपम रॉय, रवि प्रकाश, चुनमुन और प्रतिरोध के सिनेमा के संयोजक संजय जोशी आदि उपस्थित थे।

प्रस्तुति

राम नरेश राम

जन संस्कृति मंच, दिल्ली

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