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वैचारिक प्रतिबद्धता बनाम एआईएसफ की “इमेज” बचाओ अभियान

 अविनाश कुमार चंचल
13 फरवरी की बात है। एआईएसएफ के एक सदस्य द्वारा एआईएसएफ के ही कुछ सदस्यों के साथ मारपीट और गाली-गलौच किया जाता है। मारपीट और गाली-गलौच दो महिला साथियों के साथ भी होता है। घटना अब तक के सबसे जनवादी कैम्पस जेएनयू में होती है। ठीक गंगा ढ़ाबा पर।
  उस समय संगठन के लोगों द्वारा मामले को आपस में सुलझा लेने का निर्णय किया जाता है लेकिन 48 घंटे के बाद भी सार्वजनिक रूप से अंजाम दी गयी घटना के खिलाफ सार्वजनिक रूप से एक कठोर मैसेज तक देने में संगठन असफल रहता है। दो दिन तक बैठकें होती रहती हैं….दयावाद और अपराध के कारणों पर चर्चा होती रहती है। कुल मिलाकर मामले को रफा-दफा करने की सड़ी-गली पद्धति की तरफ बढ़ा जाता है।
हर तीसरे दिन सड़कों पर छात्रों के सवाल पर लाठी खाने वाला, पटना से लेकर भोपाल तक हर मुद्दे पर मुखर होकर बोलने वाला एक जुझारु वामपंथी छात्र संगठन को जब अपने ही पार्टी कॉमरेड के द्वारा महिला कॉमरेडों के साथ किये दुर्व्यवहार पर 48 घंटे तक कोई सार्वजनिक कार्रवायी करने की बजाय मामले को बाहर न जाने दिया जाय, पर ज्यादा चिंतित होते दिखता है।
यकीन मानिये अभी भी इसी संगठन से जनता के मुद्दों पर खड़े होने की उम्मीद है…
उल्टे मेरे सवाल उठाने के बाद आप  मेरी पूरी समझ को कटघरे में खड़ा कर रहे हों लेकिन मेरा स्पष्ट मानना है कि न तो आपका पुलिसिया डंडे से खाया चोट दिखावा है और न ही आपके विचार।
लेकिन साथी, क्या बेहतर न होता कि एक सार्वजनिक रूप से घटी घटना के खिलाफ आप सार्वजनिक रुप से एक कठोर कार्रवायी करके मैसेज देते बजाय इसके कि दूसरे लोगों के सामने संगठन की इज्जत चली जाएगी- जैसे मुद्दों को तवज्जो देने के।
और आपके इस तर्क को कि पीड़ित संगठन के एक्शन से संतुष्ट है – तो मैं क्यों लिख रहा हूँ- के तर्क को भी मैं नहीं मानता।
अगर ऐसा है तो आप भी आगे से पीड़ितों के पक्ष में बोलना बन्द कर दें- क्या गलत निर्णयों के खिलाफ बोलने के लिये पीड़ितों की सहमति आवश्यक है ?
और रही बात व्यक्तिगत रूप से एफआईआर करने का तर्क देने के का। तो सुन लीजिए….ये बिल्कुल भी व्यक्तिगत मामला नहीं है..एक संगठन के लोग ने संगठन की वजह से संगठन के महिलाओं पर हमला किया है तो ये अगर व्यक्तिगत मामला है तो आप भी आईंदा से पीड़ित महिलाओं के मुद्दे पर बोलना छोड़ दीजिए उनको “व्यक्तिगत” हाल पर छोड़ दीजिए।
हाँ, मुझे बहिष्कृत करने की बजाय अगर संगठन कार्रवायी करने में ऊर्जा खपत करे तो बेहतर।
 “संगठन का कुछ नहीं बिगड़ेगा। हाँ, तुम्हारा और संगठन का रिश्ता खराब होगा”
मेरे फेसबुक पर स्टेट्स को पढ़ने के बाद उक्त संगठन के नेताजी का फोन आया… चलिये इसे धमकी नहीं माना जाय…बड़ा भाई मानता रहा हूँ उन्हें अब तक तो प्यार भरा उलाहना के बतौर ही लेता हूँ।
लेकिन बड़े भैया, गजब कह रहे हैं आप- रिश्ते खराब मेरे हो जायेंगे संगठन से और वो जो सरेआम गंगा ढाबा पर महिलाओं के साथ मारपीट किया है, गाली गलौज किया है उससे सम्बंध आप लोग बेहतर बनाये रखिये संगठन का।
जानता हूँ…मैं बेहद अदना सा आदमी हूँ… संगठन का कुछ बिगाड़ पाने की न तो क्षमता है और न ही मंशा।
ये भी जानता हूँ कि आप लोग एकजुट होकर सोशल मीडिया से लेकर हर मंच पर मेरी अवसरवादिता से लेकर मेरे मां-बहन सबको कैरेक्टर सर्टिफिकेट भी बँटवाने की क्षमता रखते हैं। लेकिन मैं बड़े ही मजबूती के साथ सोचता हूँ कि इस घोर सामंती घटना के खिलाफ खुलेआम न खड़े होकर आप सांगठनिक संड़ाध को ही बढ़ावा दे रहे हैं।
सार्वजनिक रूप से संगठन की आलोचना तब तक नहीं होती जब तक आप इस घटना के खिलाफ एक कठोर मैसेज देने का काम करते। लेकिन उल्टे आप मेरे साथ संगठन के रिश्ते खत्म होने की धमकी दे रहे हैं।
ठीक है साथी, आपकी अगर ये समझ है तो हमें कबूल है। आईये कुछ गाली दे जाईये…हमें गंभीर परिणाम भुगता जाईये।
वैसे भी ऐसे संगठन के साथ सम्बंध का आचार तो डालेंगे नहीं…आप हो सके तो मोरब्बा ही बना लीजिए।

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