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वैश्विकरण की चुनौती और वैश्विक दुनिया में मुसलमानों के लिए स्थान

वैश्विकरण की चुनौती और वैश्विक दुनिया में मुसलमानों के लिए स्थान
सप्तम डॉ. असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यानमाला – एक रपट
-मीता तारानी
मुंबई के मैक्समूलर भवन में 14 अक्टूबर, 2016 को आयोजित एक कार्यक्रम में जे़न्टुम मोडेना ओरिएंट (जे़डएमओ), बर्लिन के डॉ. डिट्रिक रीट्स ने ‘‘दक्षिण एशिया में मुस्लिम वैश्विक कर्ताः इस्लामिक दुनिया के हाशिए से विश्व निर्माण’’ विषय पर सातवां डॉ. असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान दिया।
डॉ. रीट्स ने कहा कि एक ऐसे समय में, जब इस्लाम और मुसलमानों को लेकर विश्व और भारत की राजनीति में कई तरह के विवाद उठ रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है कि हम इस धर्म के बहुवादी चरित्र को याद करें।
उन्होंने कहा कि वैश्विकरण केवल आर्थिक या वित्तीय परिघटना नहीं है, जैसा कि पश्चिम में माना जाता है। वैश्विकरण की अवधारणा को गैर-आर्थिक परिप्रेक्ष्यों से, जिनमें राजनैतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक व सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य शामिल हैं, से देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कदाचित वैश्विकरण के केवल आर्थिक पक्षों पर ज़ोर दिए जाने के कारण, दक्षिण एशिया के मुसलमान, इस्लामिक वैश्विकरण के मुख्य विमर्श के हाशिए पर आ गए हैं। यह आश्चर्यजनक है क्योंकि दुनिया के कुल मुसलमानों में से 80 प्रतिशत एशिया में रहते हैं और इनमें से 60 करोड़ दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों में निवासरत हैं। दक्षिण एशियायी मुसलमानों की संख्या, अरबी बोलने वाले मुसलमानों की कुल आबादी से दुगनी है।

उन्होंने कहा कि इस्लामिक वैश्विकरण की प्रक्रिया को दो अलग-अलग तरीकों से समझा व देखा जा सकता है।
पहला, सैद्धांतिक/विचाराधात्मक दृष्टि से और दूसरा सांसारिक दृष्टि से। पहले के अंतर्गत आती हैं इस्लाम की विभिन्न आध्यात्मिक और विचाराधात्मक धाराएं जबकि दूसरी, इन धाराओं से उपजे सामाजिक आंदोलनों पर केन्द्रित हैं।
पहले का उदाहरण है सूफीवाद का प्रसार, शिया और सुन्नी सम्प्रदायवाद व उनसे उपजे आंदोलन जैसे अहल-ए-हदीद, देवबंद, नदवा, बरेलवी, तबलीगी जमात, खिलाफत आंदोलन आदि और सैयद अहमद खान, एम. बरकतउल्ला व ओबेदुल्ला सिंधी जैसे कार्यकर्ता और तार्किकतावादी। सांसारिक दृष्टि से इस्लाम के वैश्विकरण की प्रक्रिया के अध्ययन में शामिल है ब्रिटेन के औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना और उसके पश्चात दक्षिण एशिया से मुसलमानों का पश्चिमी देशों में प्रवास। यह धारा प्रवासी मुसलमानों के समुदायों के अंतरसंबंधों पर भी केन्द्रित है।
मुसलमानों द्वारा ‘सांसारिक हस्तक्षेपों’ का एक उदाहरण है तबलीगी जमात द्वारा आयोजित की जाने वाली अंतर्राष्ट्रीय यात्राएं, जिनमें विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को धर्म प्रचार के लिए ले जाया जाता है। यह विश्व निर्माण का एक अलग तरीका है, जिसके अंतर्गत कोई व्यक्ति बिना अपने नैतिक सिद्धांतों से समझौता किए यात्रा कर सकता है।

कई अन्य संस्थाएं जैसे मिनहाजुल कुरान, पश्चिमी देशों में रह रहे प्रवासी मुसलमानों के वहां पुनर्वसन के संबंध में कानूनी और सामाजिक सलाह देते हैं। यह भी विश्व निर्माण का एक तरीका है।
मुस्लिम विश्व निर्माण की प्रक्रिया को आध्यात्मिक और सांसारिक (सामाजिक) अर्थों में समझा जा सकता है। आध्यात्मिक स्तर पर इसका संबंध यह बताने से है कि इस दुनिया में कैसे रहा जाए ताकि मरणोपरांत जीवन अच्छा बन सके। इसी कारण कई लोग ऐसे काम करते हैं जिन्हें ‘सवाब’ माना जाता है और जिससे जन्नत की उनकी यात्रा सुगम बनती है।
डॉ. रीट्स ने इस्लाम की विभिन्न आध्यात्मिक व विचारधारात्मक धाराओं के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया है। इन विभिन्न समूहों के विचारों को समझने के लिए तीन मुख्य मुद्दों पर उनकी सोच का अध्ययन आवश्यक है, एक-इस्लाह, दो-तकलीद और तीन-इज्तीहाद।
इस अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विभिन्न समूहों की सैद्धांतिक सोच दूसरों से अलग और एक ही दिशा में चलने वाली नहीं है। कब-जब वे अपनी सोच में इसलिए भी परिवर्तन लाते हैं ताकि वे अपने ‘‘प्रतियोगियों’’ से अलग दिख सकें।
देवबंदी इस्लाह तो चाहते हैं परंतु वे शरिया व तरीका की एकता में भी विश्वास रखते हैं। वे सूफियों के विरोधी नहीं हैं क्योंकि वे सूफियों के उन आचरणों को मान्यता देते हैं जो शरिया के अनुरूप हैं। परंतु वे सूफीवाद की चुनिंदा बरेलवी परंपराओं के विरोधी हैं, विशेषकर दरगाहों से जुड़ी परंपराओं के।
अहल-ए-हदीद सभी संप्रदायों को स्वीकार करते हैं परंतु वे सूफियों से स्वयं को बिलकुल अलग रखते हैं। वे कहते हैं कि वे सलाफी हैं और उनके सऊदी अरब से निकट संबंध हैं। उनके विरोधी अक्सर उन्हें वहाबी बताते हैं परंतु वे वहाबियों से अलग हैं क्योंकि वहाबी केवल हनबली कानून का पालन करते हें।

जमायत-ए-इस्लामी, सैद्धांतिक दृष्टि से रूढ़िवादी है और इस मामले में देवबंदियों और बरेलवियों जैसी है। परंतु वह दक्षिण एशिया में दलगत राजनीति भी करती है।
अहमदिया, विचारधारा की दृष्टि से रूढ़िवादी हैं परंतु वे सामाजिक आधुनिकता और राजनैतिक वफादारी पर ज़ोर देते हैं। अलीगढ़ की परंपरा केवल कुरान को स्वीकार करती है और हदीस को खारिज करती है।
डॉ. रीट्स का तर्क है कि विभिन्न विचारधाराओं पर आधारित इन समूहों को धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भों में समझा जाना चाहिए क्योंकि उनकी सोच उनके सामाजिक संव्यवहार और सांस्कृतिक आचरण में भी झलकती है। पिछले दशकों में इन सभी का ढांचा लगभग एक-सा हो गया है। इन सभी में महिलाओं, विद्यार्थियों और बच्चों की अलग-अलग शाखाएं हैं और इनके अतिवादी समूह भी उभर आए हैं। ये समूह अपने-अपने केंद्र, आराधना स्थल व शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित कर रहे हैं। इनमें सामाजिक और राजनैतिक दबावों के चलते लगातार परिवर्तन भी हो रहे हैं और उनके बीच वैश्विकृत हो चुकी इस्लामिक दुनिया में अनुयायी और समर्थक जुटाने की प्रतियोगिता भी चल रही है।
उन्होंने इस सिलसिले में देवबंदियों और आधुनिकतावादी अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक विश्वविद्यालयों को दक्षिण एशिया के उन समूहों में शामिल किया, जो इस्लामिक विश्व निर्माण की प्रक्रिया में शामिल हैं।

देवबंदियों का प्रतीकात्मक केन्द्र उत्तर भारत में देवबंद है जबकि आधुनिकतावादियों का केन्द्र है इस्लामाबाद स्थित अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक विश्वविद्यालय।
देवबंदियों में 1982 में इस संप्रदाय के शताब्दी वर्ष के आयोजन के दौरान पारिवारिक विवाद के कारण विभाजन हो गया परंतु इसका दक्षिण एशिया और उसके बाहर देवबंदियों से जुड़े समूहों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
तबलीगी जमात भी मोटे तौर पर देवबंदी परंपरा का पालन करती आ रही है।
देवबंदी संप्रदाय जिस तरह से कार्य करता है, उससे प्रशासन के मुगल तरीकों की झलग मिलती है। देवबंदियों का दक्षिण एशिया से बाहर प्रसार मुख्यतः तबलीगी धर्मप्रचार यात्राओं के ज़रिए हुआ।
दक्षिण एशिया के अन्य इस्लामिक समूहों की तरह, तबलीगी जमात भी प्रतिवर्ष इजतिमा का आयोजन करती है, जिनमें भाषणों के ज़रिए सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों का प्रसार किया जाता है।
जब देवबंदी संप्रदाय की स्थापना हुई थी तब वह तत्कालीन दुनिया की दृष्टि से बहुत आधुनिक था। उसने क्लास रूम में पढ़ाई शुरू करवाई, होस्टलें बनवाईं, पाठ्यक्रमों का निर्धारण किया और अंग्रेज़ों के कालेजों की तरह परीक्षा लेना शुरू की।
देवबंदी मदरसों में पढ़ने वाले अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थियों में अधिकतर अफ्रीका (विशेषकर दक्षिण अफ्रीका), मलेशिया, फ्रांस, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आते हैं।

तबलीगियों की ब्रिटेन, अमरीका और दक्षिण अफ्रीका में भी खासी उपस्थिति है।
इंग्लैंड के ड्यूस बरी के सेवाइल टाउन क्षेत्र में तबलीगी जमात का यूरोपीय मुख्यालय है। इसने उस क्षेत्र की सामाजिक जिंदगी पर गहरा प्रभाव डाला है। कई बार और पब बंद हो गए हैं और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं और पुरूषों के आपसी संव्यवहार में कमी आई है।
इस मुद्दे पर इंग्लैंड और अन्य स्थानों पर बहुत चर्चा हुई है कि इससे दक्षिण एशियायी मुस्लिम प्रवासियों की इंग्लैंड के निवासियों के साथ घुलने-मिलने की प्रक्रिया में रोक लगी है या उसे बढ़ावा मिला है।
इस आंदोलन के पैरोकार कहते हैं कि जमात के प्रभाव के कारण इलाके में अपराध की दर कम हुई है।
दक्षिण एशिया के उन मुस्लिम धार्मिक आंदोलनों, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हैं, में तबलीगी जमात अग्रणी है। वह नस्लीय विभाजनों से ऊपर उठकर कई देशों और क्षेत्रों में अपनी पैठ बनाने में सफल रही है, जिनमें दक्षिण पूर्व एशिया, मध्य एशिया और फ्रांस शामिल हैं।
तबलीगी जमात अपने अनुयायियों को भारतीय परिधान सलवार कमीज़ पहनने के लिए प्रेरित करती है। इससे यह पता चलता है कि किस तरह वैश्विकरण से लोगों के सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ रहा है।
इस्लामाबाद स्थिति अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक विश्वविद्यालय अन्य मदरसों से इस अर्थ में भिन्न है कि वहां के विद्यार्थी या तो सामाजिक विज्ञानों, इंजीनियरिंग इत्यादि के कोर्स कर सकते हैं या धार्मिक कोर्स और इन दोनों कोर्स करने वालों की पढ़ाई में कुछ भी समान नहीं होता। परंतु जो विद्यार्थी सामाजिक विज्ञान, इंजीनियरिंग आदि के कार्स करते हैं उन्हें भी बुनियादी धार्मिक शिक्षा दी जाती है और अरबी भाषा का ज्ञान कराया जाता है।
इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थीसंघों में धार्मिक और गैर-धार्मिक दोनों किस्म के समूह शामिल हैं जो अपने-अपने सिद्धांतों का प्रचार करते हैं।
भारत में भी इसी तरह का एक विश्वविद्यालय है जिसका नाम अलजामिया अल इस्लामिया है। यह केरल के मल्लापुरम में स्थित है।
इन विश्वविद्यालयों की स्थापना का उद्देश्य यह है कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा मिल सके जो उन्हें रोज़गार उपलब्ध करवाए।
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व के विभिन्न देशों के मुस्लिम विद्यार्थियों ने इस विश्वविद्यालय में इस उम्मीद से दाखिला लिया था कि वहां मिलने वाली शिक्षा से उन्हें वैश्विकृत दुनिया में काम ढूंढने में मदद मिलेगी। परंतु उनकी उम्मीद पूरी न हो सकी। यह इससे स्पष्ट है कि विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थियों का प्रतिशत, जो 1999 में 28 था, 2004 में घटकर 12 प्रतिशत रह गया।
डॉ. रीट्स का निष्कर्ष यह था कि दक्षिण एशिया के मुस्लिम वैश्विककर्ताओं के बीच बढ़ते अंतरसंबंधों और पुराने व नए धार्मिक-सांस्कृतिक ढांचों के एक-दूसरे पर प्रभाव के कारण ये सब धीरे-धीरे एकसे बनते जा रहे हैं। वे विचारधारा पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं परंतु साथ ही वैश्विकरण की चुनौती से मुकाबला करने के लिए ज़रूरी कदम भी उठा रहे हैं। कुल मिलाकर इन वैश्विककर्ताओं का लक्ष्य वैश्विक दुनिया में मुसलमानों के लिए स्थान बनाना। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)
संपादक महोदय,                 
 कृपया इस सम-सामयिक लेख को अपने प्रकाशन में स्थान देने की कृपा करें।
– एल. एस. हरदेनिया       
 

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