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Baba Saheb Ambedkar The biggest hero of the social revolution in India बाबा साहेब अंबेडकर : भारत में सामाजिक क्रांति के सबसे बड़े नायक

वो कौन सी विचारधारा के लोग थे, जिन्होंने अम्बेडकर को हिन्दू कोड बिल नहीं लाने दिया

मल्लिकार्जुन खड़गे देश के अनार्यों के नए हीरो के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं

लुटियंस के टीले से नागपुर के केशव भवन को मिला अब तक का सबसे कड़वा जवाब

अम्बेडकर पर संसद में चर्चा – विचार दरकिनार, सिर्फ गुणगान !

भंवर मेघवंशी

भारतीय संसद ने संविधान निर्माण में अम्बेडकर के योगदान (Ambedkar’s contribution in constitution making) पर दो दिन तक काफी सार्थक चर्चा करके एक कृतज्ञ राष्ट्र होने का दायित्व निभाया है। इस चर्चा ने कुछ प्रश्नों के जवाब दिये हैं तो कुछ नए प्रश्न खड़े भी किये हैं, जिन पर आगे विमर्श जारी रहेगा।

दो दिन तक सर्वोच्च सदन का चर्चा करना अपने आप में ऐतिहासिक माना जायेगा। यह इसलिये भी महत्वपूर्ण हो गया कि जो पार्टियाँ गाहे-बगाहे अब तक डॉ. अम्बेडकर के संविधान निर्माता होने पर संदेह प्रकट करती रही,  आलोचना करती रही, उनके भी सुर बदले हैं तथा उन्होंने भी माना कि संविधान निर्माण में डॉ. अम्बेडकर का योगदान अतुलनीय है, उसको नकारा नहीं जा सकता है।

जो लोग यह कहकर अम्बेडकर का महत्व कम करने की कोशिश करते हैं कि संविधान सभा के अध्यक्ष तो डॉ राजेन्द्र प्रसाद थे, अम्बेडकर तो महज़ ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे। जिसमें उनके समेत कुल 9 सदस्य थे, जिसमें के एम मुंशी, गोपाल स्वामी अयंगार और कृष्ण स्वामी अय्यर जैसे विद्वान भी शामिल थे। अकेले अम्बेडकर ने क्या किया।

अम्बेडकर के आलोचकों को संविधान सभा की बहस और कार्यवाही का अध्ययन करना चाहिए ताकि अम्बेडकर के योगदान को समझा जा सके।

अब यह ऐतिहासिक सत्य है कि जो 9 लोग प्रारूप समिति में थे, उनमें से एक ने त्यागपत्र दे दिया था। एक अमेरिका चला गया। दो सदस्य अपने स्वास्थ्य कारणों से दिल्ली से दूर रहे। एक राजकीय मामलों में व्यस्तता के चलते समय नहीं दे पाया और शेष लोग भी अपने-अपने कारणों से प्रारूप निर्माण में अपनी भागीदारी नहीं निभा सके। इसलिए संविधान का प्रारूप तैयार करने का सारा उत्तरदायित्व अकेले डॉ. अम्बेडकर के कन्धों पर आ पड़ा, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। इसीलिए उन्हें भारतीय संविधान का असली निर्माता कहा जाता है।

संसद में पहले दिन की बहस का आगाज़ करते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथसिंह ने कहा कि अम्बेडकर का इस देश में बहुत अपमान हुआ, लेकिन उन्होंने कभी देश छोड़ने की बात नहीं सोची। वे सच्चे अर्थों में राष्ट्रऋषि थे।

दूसरे दिन बहस का समापन करते हुए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अम्बेडकर ने जहर खुद पिया और अमृत हमारे लिए छोड़ गए।

गृहमंत्री का डॉ. अम्बेडकर को राष्ट्रऋषि कहना और प्रधानमंत्री का उन्हें हलाहल पीने वाला नीलकंठ निरूपित करना कई सवाल खड़े करता है।

जब राजनाथ सिंह कहते हैं कि देश में अम्बेडकर का बहुत अपमान हुआ, तो उन्हें और साफगोई बरतनी चाहिये और देश को यह बताना चाहिये था कि आखिर वो कौन लोग थे, जिन्होंने अम्बेडकर को अपमानित किया। तत्कालीन व्यवस्था और धार्मिक कारण तो थे ही जिनको अम्बेडकर ने आगे चलकर ठुकरा दिया था, लेकिन आज़ादी के आन्दोलन के कई चमकते सितारों ने भी अम्बेडकर को अपमानित करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। उन पर कालाराम मंदिर प्रवेश आन्दोलन के वक़्त पत्थर बरसाने वाले कौन लोग थे ? उनकी उपस्थिति के बाद उन स्थानों को गंगाजल और गौमूत्र छिड़क कर पवित्र करने वाले लोग कौन थे ? वो कोन थे जिन्होंने अछूतों से पृथक निर्वाचन का हक छीन लिया था और डॉ. अम्बेडकर को खून के आंसू रोने को विवश किया था। वो कौनसी विचारधारा के लोग थे जिन्होंने अम्बेडकर को हिन्दू कोड बिल नहीं लाने दिया और अंततः उन्हें भारी निराशा के साथ केन्द्रीय मंत्रिमंडल छोड़ना पड़ा था। इससे भी आगे बढ़ कर एक दिन उन्हें देश ना सही बल्कि धर्म को छोड़ना पड़ा। इन बातों पर भी चर्चा होती तो कई कुंठाओं को समाधान मिल सकता था।

जब प्रधानमन्त्री यह स्वीकारते हैं कि डॉ. अम्बेडकर को जहर खुद पीना पड़ा तो वो क्या जहर था, उससे देश को अवगत होना चाहिये। यह देश को जानने का हक है कि किन परिस्थितियों में अम्बेडकर ने अपना सार्वजनिक जीवन जिया और सब कुछ सहकर भी देश को अपना सर्वश्रेष्ठ देने की महानता दिखाई।

संसद में यह पहली बार हुआ कि एक कांग्रेसी सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने बामसेफ के संस्थापक बहुजन राजनीति के सूत्रधार कांशीराम के केडर केम्पों की भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने राजनाथ सिंह को जोरदार जवाब देते हुए एक नयी बहस को जन्म दिया है। हालाँकि मीडिया ने उसे बहुत खूबसूरती से दबा दिया है। आश्चर्य होता है कि असहिष्णुता पर आमिर खान के बयान को तिल का ताड़ बनाने वाला मीडिया, हर छोटी छोटी प्रतिक्रिया को विवादित बयान में बदलनेवाला मीडिया मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर कैसे मौन रह गया। देश भर से कोई नहीं उठ खड़ा हुआ कि खड़गे ने ऐसा क्यों कहा कि –“आप विदेशी लोग हैं, आप आर्य हैं, बाहर से आये हैं। अम्बेडकर और हम लोग तो इस देश के मूलनिवासी हैं, पांच हजार साल से मार खा-खा कर भी हम यहीं बने हुए हैं।“

खड़गे के बयान में इस देश में बर्षों से जारी आर्य-अनार्य, आर्य-द्रविड़, यूरेशियन विदेशी आर्यन्स की अवधारणा पर नए सिरे से विमर्श पैदा कर दिया है, लेकिन सत्तापक्ष और मीडिया ने बहुत ही चालाकी से खड़गे के बयान को उपेक्षित कर दिया है ताकि इस बात पर कहीं कोई बहस खड़ी ना हो जाये और सच्चाई की परतें नहीं उतरने लगे। यह विचारधाराओं के अवश्यम्भावी संघर्ष को टालने की असफल कोशिश लगती है।

इस एक बयान से मल्लिकार्जुन खड़गे देश के अनार्यों के नए हीरो के रूप में उभरते दिखाई दे रहे हैं, हालाँकि वे अपने इस प्रकार के बयान पर कितना मजबूती से टिके रहते हैं, यह तो भविष्य में ही पता चल पायेगा मगर खड़गे की साफगोई ने दलित बहुजन मूलनिवासी आन्दोलन में नई वैचारिक प्राणवायु संचरित की है।

इस बहस का सबसे बड़ा फलितार्थ आरक्षण और संविधान को बदलने की दक्षिणपंथी बकवास को मिला एक मुकम्मल जवाब माना जा सकता है।

लुटियंस के टीले से नागपुर के केशव भवन को मिला यह अब तक का सबसे कड़वा जवाब है, जिसमें संघ के प्रचारक रह चुके स्वयंसेवक प्रधानमन्त्री ने परमपूज्य सरसंघचालक मोहन राव भागवत को दो टूक शब्दों में कह दिया है कि ना तो आरक्षण की व्यवस्था में कोई बदलाव किया जायेगा और ना ही संविधान बदला जायेगा, क्योंकि ऐसा करना आत्महत्या करने के समान होगा। इस कड़े जवाब से देश के वंचित समुदाय में एक राहत देखी जा रही है।

अभी यह कहना जल्दबाजी ही होगी कि ऐसा कह कर मोदी देश के दलित वंचितों का भरोसा जीत पाने में वे कामयाब हो गए है, लेकिन जिस तरह से बिहार चुनाव परिणाम से लेकर भारतीय संसद की बहस ने भागवत की किरकिरी की है, उससे हाशिये का तबका ख़ुशी जरूर महसूस कर रहा है।

संसद में हुयी दो दिवसीय चर्चा और राष्ट्रव्यापी संविधान दिवस का मनाया जाना भारतीय राष्ट्र राज्य के लिए एक ऐतिहासिक आयोजन है, मगर इन सबके मध्य बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को अतिमानव बना कर उनके अवतारीकरण की कोशिशों को खतरे के रूप में देखने की जरूरत है। अम्बेडकर को भगवान बनाना उनके उस विचार की हत्या करना है जिसमे वे सदैव व्यक्तिपूजा के विरोधी रहे। उन्हें मसीहाकरण से सख्त ऐतराज़ रहा, मगर आज हम देख रहे है कि लन्दन से लेकर मुंबई के इंदु मिल तक स्थापित किये जा रहे स्मारकों के पीछे वही हीरो वर्शिपिंग का ही अलोकतांत्रिक विचार काम कर रहा है। कहीं ऐसा ना हो कि अम्बेडकर के विचारों को पूरी तरह दफन करते हुए कल उनके मंदिर बना दिये जाये, उन्हें विष्णु का ग्यारहवां अवतार घोषित कर दिया जाये और मंदिरों में पंडित लोग घंटे घड़ियाल बजा कर आरतियाँ उतारने लगे। यह खतरा इसलिये बढ़ता जा रहा है क्योंकि कोई उन्हें आधुनिक मनु तो कोई राष्ट्रऋषि और कोई जहर पीनेवाला नीलकंठ बताने पर उतारू है।

आज सब लोग एक रस्म अदायगी की तरह डॉ. अम्बेडकर की प्रशंसा में लगे है, पर 26 नवम्बर 1949 को संविधान सौंपते हुए उनके द्वारा कही गयी बात पर चर्चा नहीं हो रही है कि आर्थिक एवं सामाजिक गैर बराबरी मिटाये बगैर यह राजनीतिक समानता स्थायी नहीं हो सकती है। काश, इस विषय पर देश की संसद विचार विमर्श करती, मगर अफ़सोस कि अम्बेडकर की व्यक्ति पूजा चालू है, उनका अनथक गुणगान जारी है. बड़ी ही चालाकी से उनके विचारों को दरकिनार किया जा रहा है।

एक राष्ट्र के नाते बाबा साहब जो चाहते थे क्या हम वो लक्ष्य प्राप्त करने में सफल रहे है ? इस सवाल पर मेरे देश की संसद मौन है !

भंवर मेघवंशी, ( स्वतंत्र पत्रकार )

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