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व्यंग्य – आओ वार्ता करें

रतन जैसवानी

वार्ता करना अच्छी बात है, कहावत है कि कुछ चीजों का हल सिर्फ वार्ता से ही संभव है। जैसे कोई आपको गालियां दे, तो उसे भला बुरा कहने की बजाय वार्ता कीजिए, पीट-पाट दे तो भी वार्ता करिए और अगर आपको धोबी पछाड़ देकर अस्पताल भी पहुंचा दे, तब भी वार्ता करना ही उचित है ! क्योंकि हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। लादेन का जो हश्र अमेरिका ने किया, वह तो ओबामा ताउ की दादागिरी है। भारतीय शैली से अपरिचित ओबामा जी क्या जानें कि प्रेम भी कोई चीज है, वार्ता से हल निकलेगा ही, आज नहीं तो कल सही। ठीक वैसे ही, जैसे अचानक आंधी-तूफान की तरह देश में शुरू हुए भ्रष्टाचार आंदोलन पर सरकार ने वार्ता करने की बात कही, बाद में सिविल सोसायटी और सरकार के प्रतिनिधियों की वार्ता फेल हो गई। अमेरिका के पहले राष्ट्रपति महान अब्राहम लिंकन की कहानी ने हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया है। लिंकन ने कई बार फेल होने के बाद आखिरकार सफलता हासिल कर ही ली। इसी तरह वार्ता फेल होने पर आने वाले समय में उसके सफल होने की संभावना बनी ही रहती है। ऐसे मौकों पर घबराना नहीं चाहिए। मैं एैसी स्थिति से गुजर चुका हूं, इसलिए समझ सकता हूं कि वार्ता कितनी महत्वपूर्ण चीज है।
मेरे एक परिचित को शहर के दबंग ने पीट दिया, उसने मुझसे गुहार लगाई, मैं ठहरा कलमकार, कलम चलाना आता है, हाथ पैर चलाने के गुर सीखे ही नहीं। सो मैने उसे सलाह दी कि उस दबंग से वार्ता करूंगा। परिचित ने मामले में रिपोर्ट दर्ज करा दी। थानेदार साहब ने भी उसे वही सलाह दी कि दबंग को बुलाकर बातचीत करेंगे। दोनों से असंतुष्ट परिचित महोदय आखिरकार मंत्री जी के पास पहुंच गए, मंत्री जी ने भी उसे वार्ता करने का आश्वासन दिया। अंत में दबंग से पिट चुका परिचित वार्ता करने को सहमत हो गया।
वैसे भी हमारे देश की कमान संभालने वाले वार्ता को कुछ अधिक महत्व देते आए हैं। मामला चाहे आतंकवाद का हो, मुंबई बम विस्फोट का या फिर अन्य किसी खतरे का। सरकार वार्ता करना चाहती है, वार्ता होती है पर फेल हो जाती है। भला इसमें किसी का क्या दोष ? वार्ता तो फेल होने के लिए ही होती है, अगर पास हो जाती तो देश की आधी समस्याएं खुद ब खुद दूर हो जाती। भले ही इन वार्ताओं के मायने गांव में रहने वाले भोले भाले टेटकू, समारू, मंटोरा, बुधवारा के समझ में न आएं। लेकिन उनकी आगामी पीढ़ी सरकारी योजनाओं से लाभान्वित होकर ऐसी चीजों का महत्व समझ सकेंगी, यह उम्मीद है। सरकार के खिलाफ लंगोटी कसकर राजनीति के मैदान में उतरने को तैयार बाबा रामदेव के शंखनाद ने सियासी फिजां का तापमान भले ही बढ़ा दिया है। लेकिन सरकार के कारिंदों ने उनकी मांगों को बैरंग लिफाफे में भरकर कूड़ेदान के डिब्बे में डाल दिया, यानि वार्ता फेल हो गई है। ये वार्ताओं का देश है, जहां विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का उदाहरण दिया जाता है, हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, आपस में सब भाई-भाई। इसीलिए वार्ताएं जरूरी हैं, अगर वार्ता फेल होती है तो फिर से वार्ता करनी चाहिए, करते रहनी चाहिए, इसका कोई अंतिम परिणाम भले न निकले, लेकिन कुछ न कुछ तो हासिल होगा ही। मैं तो अब यह सोचने लगा हूं कि वार्ता के मामले में भी अपना देश गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज करा सकता है। वार्ता होती रहेगी, फेल भी होगी, फिर वार्ता होगी। बढ़ती उम्र के साथ-साथ मेरे सुपुत्र को दुनियादारी की थोड़ी समझ आने लगी है, कभी-कभी वह मुझसे पूछने लगता है आखिर वार्ता नाम का यह पप्पू कब पास होगा पिताश्री?

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