Home » शराब की दुकान में घुस कर गुड़ माँग रहा डिब्बा

शराब की दुकान में घुस कर गुड़ माँग रहा डिब्बा

डिब्बे की हकीकत देखें
चंचल
यह डिब्बा न देसी है न देश का है। यह लूट की संस्कृति पर उतारी गयी जहर की पुड़िया है। और यह सब इसकी मजबूरी है। ठीक उसी तरह जैसे शराब की दूकान में जाकर आप पाव भर गुड़ माँगें। वह कहाँ से देगा? यह उसकी मजबूरी है। कमोबेश अब यह मजबूरी समूची मीडिया की बन चुकी है। गुस्साइये मत… ज़रा गौर से इनके करतब देखिये।
देश की आबादी है एक सौ सत्ताईस करोड़। इस सवा सौ करोड़ की आबादी का वर्गीय चरित्र देखिये। अस्सी फीसद आबादी रिहाईश के आधार पर रोजगार के आधार पर खेत और खलिहान से जुड़ी है। बाद बाकी चौदह फीसद श्रम से जुड़ा है और बेकार हैं। सात फीसद कलम तोड़ रहे हैं। मुठी भर सियासत में हैं उतने ही जरायाम पेशे से जुड़ कर ऐश कर रहे हैं। उँगलियों पर गिने जा सकते लोग उद्योग पर काबिज हैं। अब हम आप से ही पूछते हैं यह डिब्बा किसके साथ है ? साथ हो या न हो इसके यहाँ किसकी खबर प्राथमिकता पर बैठने की हकदार बनती है ? देश का प्रतिनिधित्व तो वही करेगा। लेकिन डिब्बा उलटा चलता है। यह अस्सी फीसद को या तो परे ढकेल देता है या फिर उसे लूटता है। इसके पीछे का एक वाकया सुन लीजिए। (हम भी मीडिया से रहे हैं और आज भी हूँ ) 1982 में दिल्ली में एक सेमिनार में हमने मीडिया (उस समय डिब्बे का खौफ नहीं था ) से पूछा था- किस अखबार के पास खेत और खलिहान का ‘ब्यूरो’ है ? किस अखबार के पास इस अस्सी फीसद ज़िन्दगी का ब्योरा रखने वाला विभाग है ? फिर कितने अखबार हैं जो श्रम की दिक्कतों पर नजर रखते हैं ? जवाब नहीं था क्यों कि यह सच है। हर अखबार के पास ‘क्राइम’, नृत्य, संगीत, साहित्य के संवाददाता हैं। राजनीतिक दलों को देखने वालों का कार्य क्षेत्र बँटा है। यहाँ तक कि सिनेमा और शराब व जवानी के बीट हैं जिन्हें पेज नंबर तीन कहते हैं। लेकिन इनके पास खलिहान नहीं है। इनके पास किसान के आत्महत्या की चटख खबर जरूर है क्यों कि वह सियासत का हिस्सा मानी जा चुकी है। तो जनाबे आली ! यह डिब्बा किसका है ? यह डिब्बा उनका है जो उँगलियों पर गिने जाने वाले धन पशु हैं।
अभी इस वक्त को देखिये। जब देश में चुनाव होने जा रहा है दैविक आपदा ने किसान को पीट कर रख दिया। बारिश ने ओले ने किसान की फसल को बर्बाद कर दिया। यह डिब्बे की खबर नहीं है। डिब्बे की खबर बनती है- “भागो रे ! महँगाई आयी” और महँगाई पर समूचा मीडिया लामबंद हो गया। दिखाया जाने लगा महँगाई। सबूत में उतारा गया- आलू, प्याज, बैगन, मिर्चा। यानी खलिहान का उत्पाद महँगा है। इनसे भी आगे गए प्रिंट मीडिया ‘बॉक्स’ में रंग डाल कर सब्जियों की तस्वीर के साथ उनकी बढ़ी कीमतों का खुलासा। आलू आठ रूपये किलो जो बाजार में आया उसकी कितनी कीमत किसान को मिली होगी ? उसे छोड़ दीजिए। आलू का चिप्स तीन सौ रूपये किलो में बिके, उस पर ऐतराज नहीं है। सड़े चावल से बने कुरकुरे की कीमत चार सौ रूपये के ऊपर क्यों कि उसे रानी मुखर्जी खाती है और डिब्बा दिखाता है। छप्पन किलो लोहे की कीमत अस्सी हजार रूपये। बाजार में बाइक है। मीडिया का पहला पेज बाइक के साथ उघार टाँग दिखा रहा है।
मीडिया ने कभी महँगाई पर गंभीर चर्चा की ? खेत और कारखाने के बीच क्या रिश्ता बने, इस पर किसी राजनीतिक दल से पूछा गया ?
दोस्त हम जम्हूरी निजाम में हैं, हम कसी से नफ़रत नहीं करते। लेकिन इतना शऊर तो होना ही चाहिए कि शराब की दूकान में घुस कर गुड की माँग तो न करें। यह उनकी मजबूरी है। लेकिन हम मजबूर नहीं हैं। हमें ऐतराज है कि डिब्बा अस्सी फीसद के खिलाफ ही नहीं रहता उसे लूटता भी है। जब ऐश्वर्या राय बोलती हैं कि हमारी ख़ूबसूरती का राज ‘फलाने’ साबुन है ‘ तो गाँव की लाछ्मीना भी लकड़ी बेच कर खूबसूरत होने लगती है।

About the author

चंचल। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चित्रकार व समाजवादी आंदोलन के कर्णधार हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे चंचल जी रेल मंत्रालय के सलाहकार भी रहे हैं।
चंचल जी की फेसबुक वॉल से

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: