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शहर से कोई बुरी ख़बर न आये, मोदी जी!

 क़मर वहीद नक़वी
 आपने शायद देखा होगा। बीजेपी के नये पोस्टरों पर अब सिर्फ़ एक ही तसवीर दिखती है। मोदी की! और नया नारा है, अबकी बार, मोदी सरकार! पोस्टरों पर न बीजेपी दिखती है और न बीजेपी के नेता। मोदी, मोदी, मोदी, नमो, नमो, नमो, हर हर मोदी, घर घर मोदी! ये मोदी का अपना इश्टाइल है बाबू! मोदी गली अति साँकरी, तामै समावैं दो नाहिं। न मोदी के आगे कोई, न मोदी के पीछे कोई! न भूतो, न भविष्यति! न कोई भूत बचा है, न भविष्य में कोई होगा। अब यह अलग बात है कि कुछ बड़ेवाले भूत अब भी मोदी बाबा के तमाम मारण मंत्रों के बावजूद कभी-कभी अचानक भूत लीला दिखाने लगते हैं! वरना तो सारे छोटे-मोटे भूत एक झाड़ से ही बिलबिलाते हुए वर्तमान में आ गये। नमो अवतार के प्राकट्य से पार्टी सत्य के प्रकाश से आलोकित हो चुकी है। सारे भूतों को अब सब कुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है। नमो नामावली जपो, उसके प्रताप से चुनाव वैतरणी पार लगेगी।
लेकिन कुछ अड़ियल भूत हैं। विशाल दीर्घाकार! उनके मुखों और नेत्रों से कभी-कभार ज्वालाएँ निकल पड़ती हैं। स्मृति रोग कभी अचानक उनके मस्तिष्क पर हमला कर देता है। पुराने दिन किसी पुरानी फ़िल्म की तरह आँखों के सामने से गुज़रने लगते हैं! वाह, वो भी क्या दिन थे? पूरी पार्टी कोर्निश बजाया करती थी, बाअदब, बामुलाहज़ा! वह तो वही हैं, पार्टी भी वही है, फिर भी वाणी का तेज लुप्त हो चुका है! विकलता बढ़ती है, तो भूत हरहरा कर खड़ा हो जाता है। चुनावी यज्ञ में पार्टी को कोई भूत-बाधा नहीं चाहिए! आनन-फ़ानन में बड़े-बड़े सयाने बुलाये जाते हैं। ओझाई के सारे टोटके आज़माये जाते हैं। कभी एक दिन लगता है, कभी दो दिन तो कभी चार-छह दिन भी। आख़िर भूत उतर ही जाता है!
इस बार भी आख़िर भूत उतरा। लौह पुरुष पिघल गये। वैसे इसमें क्या बड़ी बात है। साँचे में ढालने के लिए लोहे को पिघलाना ही पड़ता है। मोदी जी जो साँचा लेकर आये हैं, उसमें जो ढला, वह सही। जो नहीं ढला, वह कबाड़! बहरहाल, अब लगता है कि भूत-विलाप के सारे मौक़े निपट चुके हैं। बड़े-बड़े टिकट बँट चुके हैं। बखेड़ा ख़त्म समझिए। वैसे भी भूतों का संकट सिर्फ़ चुनाव तक ही है। नतीजे अगर ‘अबकी बार’ वाले आये तो नमो जी एक ही डग में पूरी पार्टी नाप लेंगे। पोस्टरों पर क़ब्ज़ा करके वह पहले ही बता चुके हैं कि पार्टी के अशोक मार्ग मुख्यालय में भी गुजरात माडल ही चलेगा बन्धु! एक नमो राजा, बाक़ी सब प्यादे! लेकिन अगर अबकी बार, मोदी सरकार न बन पायी तो? मोदी के 56 इंच की नाप लेने के लिए पार्टी में बहुत-से सूरमा इंची टेप लेकर अपने हाथ खुजला रहे हैं!
 सच बात यह है कि मोदी अपने राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा दाँव खेल रहे हैं। मोदी अगर लक्ष्य भेद पाये या न भेद पाये, दोनों ही स्थितियों में बीजेपी वैसी नहीं बचेगी, जैसी कि वह मोदी अवतरण के पहले थी! किसी सज्जन ने कुछ दिन पहले एक सवाल पूछा था, अगर राहुल गाँधी अपनी पार्टी को चुनाव नहीं जितवा पाये तो 2019 में उनका और काँग्रेस का कोई भविष्य बचेगा? और अगर मोदी यह चुनाव नहीं जितवा पाये तो पाँच साल बाद उनका और बीजेपी का कोई भविष्य बचेगा? जवाब आसान है। काँग्रेस में राहुल गाँधी का कोई विकल्प नहीं है, प्रियंका के सिवा। हो सकता है कि पाँच साल बाद काँग्रेस आज से कहीं बेहतर स्थिति में हो, क्योंकि तब तक लोग केन्द्र में किसी या किन्हीं सरकारों का कामकाज देख चुके होंगे। लेकिन अगर नमो अबकी बार सरकार बना पाने की स्थिति में न आ पाये तो राजनीति की साँप-सीढ़ी में साँप कहाँ कम हैं! ख़ास कर तब, जब कि संघ की एक लम्बी सीढ़ी से उन्हें सीधे लाँच कर दिया गया हो! बीजेपी तब शायद एक विकट मंथन के दौर से गुज़रेगी। और अगर मोदी सरकार बन गयी, तो कैसे बनी, कितनी पार्टियों के गठबन्धन से बनी, कौन-कौन-सी पार्टियाँ शामिल हुईं, किस-किस को क्या मंत्रालय बाँटे गये, किस-किस से क्या समझौते किये गये, करने पड़े आदि-आदि बहुत-सी बातें तय करेंगी कि सरकार कैसे चलेगी। यूपीए तो चलिए घोषित निकम्मा है, वह अब यहाँ से कैसे भी चलेगा तो उसकी छवि सुधरेगी ही क्योंकि पहले ही वह सबसे निचले पायदान पर है। लोगों को उससे ज़्यादा आशा नहीं है, सो निराशा की गुंजाइश भी नहीं है। लेकिन मोदी ने बड़े-बड़े लहीम-शहीम दावे किये हैं, लोगों ने उनसे ज़रूरत से ज़्यादा उम्मीदें भी लगा रखी हैं, जैसे कि मोदी जादू की छड़ी लेकर आयेंगे और रुपया देखते-देखते मज़बूत हो जायेगा, अर्थव्यवस्था फ़र्राटे भरने लगेगी, चीन-पाकिस्तान सबकी घिग्घी बँध जायेगी! ज़ाहिर है कि पहाड़ जैसी ये उम्मीदें मोदी की सबसे बड़ी चुनौती होंगी।
बहरहाल मोदी नाम में कुछ तो है। चीन-पाकिस्तान डरें न डरें, अपने यहाँ तो चुनावी चक्रव्यूह के लिए सजी सेनाओं पर मोदीमेनिया का असर दिखने ही लगा है। महाराष्ट्र में मौसम की मार से फ़सलें चौपट हुईं। सरकार सोच-विचार करती रही। अचानक याद आया कि कल मोदी आने वाले हैं। वह किसानों का मुद्दा उठा कर वोट लूटने की कोशिश करेंगे। इसलिए रातोंरात राहत पैकेज का एलान हो गया!
मोदी बनारस से लड़ेंगे। वहाँ से हिन्दुत्व का शंखनाद होगा। तो मुलायम सिंह यादव को अचानक आज़मगढ़ याद आ गया! वहाँ यादव तो बहुत हैं, मुसलमानों का भी आज़मगढ़ के साथ गहरा रिश्ता है। तो आज़मगढ़ के ज़रिए मुलायम साहब मुसलमानों को हाँकना चाहते हैं। न मोदी बनारस से लड़ते, न मुलायम को आज़मगढ़ का आइडिया आता! चुनाव आप लड़ रहे हैं, लड़िए। लेकिन देश भर में हिन्दू-मुसलमानों को क्यों लड़ा रहे हैं? मोदी जी के ‘इंडिया फ़र्स्ट’ मार्का सेकुलरिज़्म की यह पहली झाँकी है। बनारस वालों को कल्याण सिंह के ज़माने का वह दंगा शायद भूला न हो, जब शहर में हिन्दू-मुसलिम एकता के सबसे बड़े प्रतीक मशहूर शायर नज़ीर बनारसी की पुलिस ने बेरहम और बेशर्म पिटाई की थी। कल्याण सिंह अब फिर बीजेपी में लौट आये हैं। शहर में अनहोनी आहटें शुरू होने लगी हैं। नमो की पहली चुनौती यही होगी कि शहर से कोई बुरी ख़बर न आये!
(लोकमत समाचार, 22 मार्च, 2014)

About the author

क़मर वहीद नक़वी, वरिष्ठ पत्रकार व हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता के जनक में से एक हैं। हिंदी को गढ़ने में अखबारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सही अर्थों में कहा जाए तो आधुनिक हिंदी को अखबारों ने ही गढ़ा (यह दीगर बात है कि वही अखबार अब हिंदी की चिंदियां बिखेर रहे हैं), और यह भी उतना ही सत्य है कि हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता को भाषा की तमीज़ सिखाने का काम क़मर वहीद नक़वी ने किया है। उनका दिया गया वाक्य – यह थीं खबरें आज तक इंतजार कीजिए कल तक – निजी टीवी पत्रकारिता का सर्वाधिक पसंदीदा नारा रहा। रविवार, चौथी दुनिया, नवभारत टाइम्स और आज तक जैसे संस्थानों में शीर्ष पदों पर रहे नक़वी साहब आजकल इंडिया टीवी में संपादकीय निदेशक हैं। नागपुर से प्रकाशित लोकमत समाचार में हर हफ्ते उनका साप्ताहिक कॉलम राग देश प्रकाशित होता है।

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