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शिक्षाविदों तथा राजनैतिक कार्यकर्ताओं को उत्पीड़ित कर रही है छत्तीसगढ़ सरकार

नई दिल्ली। देश के जाने-माने बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, लेखकों और कलाकारों ने दिल्ली से एक संयुक्त बयान जारी करके हाल ही में छत्तीसगढ़ गई शिक्षाविदों तथा राजनैतिक कार्यकर्ताओं की एक टीम के सदस्यों को राज्य सरकार द्वारा डराए-धमकाए जाने और उत्पीड़ित किये जाने की कड़ी निंदा की है. इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में सचिदानंद सिन्हा, चमन लाल, राम पुनियानी, हर्ष मंदर, शबनम हाशमी, एम के रैना, राम रहमान, इरफ़ान हबीब, शमसुल इस्लाम, प्रभात पटनायक, जयति घोष सहित देश के करीब 80 जाने-माने शिक्षाविद, लेखक और कलाकार शामिल हैं. यह बयान इस प्रकार है :
हम छत्तीसगढ़ सरकार तथा उसकी पुलिस की कड़ी निंदा करते हैं, जो राज्य के दक्षिणी हिस्सों और ख़ास तौर से बस्तर और दंतेवाडा में मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच कर रहे शिक्षाविदों तथा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की धमकियां दे रही हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की प्रो. अर्चना प्रसाद, दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की प्रो. नंदिनी सुंदर तथा सीपीआई के जोशी-अधिकारी संस्थान के शोधार्थी विनीत तिवारी की एक तथ्यान्वेषी टीम ने हाल ही में 12-16 मई के बीच 5 दिन तक इस क्षेत्र का दौरा किया था. सीपीआई(एम) के छत्तीसगढ़ राज्य सचिव संजय पराते भी उनके साथ थे.
इस दौरे के बाद टीम पर सुरक्षा एजेंसियों में असंतोष फैलाने और “माओवादियों” का समर्थन करने का आरोप लगाया गया. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित राज्य के गृह मंत्री रामसेवक पैकरा के एक बयान में दिल्ली के इन तीनों प्रतिष्ठित शिक्षाविदों को जिस तरह से “देशद्रोही” और “माओवादी” करार दिया गया है, वह राजनैतिक  विरोध पर राज्य के दमन के जरिये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा आंदोलन को कुचलने की हाल में सामने आई प्रवृत्ति का ही हिस्सा है. उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और उन्हें और उत्पीड़ित करने का खतरा सामने है.
स्थानीय संपर्कों, टीम के साथ गए लोगों और टीम की मेजबानी करने वाले ग्रामीणों को उत्पीड़ित किया जा रहा है और झूठे सबूतों के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए पुलिस उन्हें डरा-धमका रही है, ताकि भविष्य में वे किसी भी अध्ययन दल की मदद न करें.
इससे पहले इस टीम द्वारा जारी प्रेस बयान में छत्तीसगढ़ राज्य व माओवादियों को साफ़ तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया है और यह बताया गया है कि कैसे आम आदिवासी एक गरिमापूर्ण जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का विरोध कर रहे हैं., जिसने जायज शिकायतों को उठाने के लिए कोई जगह ही नहीं छोड़ी है.
विरोध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा आंदोलन को अपराध बना देने और घटनाओं की निष्पक्ष रिपोर्टिंग को दबा देने की करतूतों, जो कि छत्तीसगढ़ सरकार की पहचान ही बन गई है, की लंबी सूची की यह सबसे ताज़ा घटना है.
हम तमाम जनवादपसंद लोगों से अपील करते हैं कि राज्य तथा उसकी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा डराए-धमकाए जाने की इस नंगईपूर्ण कोशिशों की निंदा करें.
हस्ताक्षरकर्ता :  विष्णुप्रिया दत्त, रंजनी मजुमदार, सुरिंदर जोधका, नीलाद्री भट्टाचार्य, जयवीर सिंह, विवेक कुमार, सचिदानंद सिन्हा, रवि श्रीवास्तव, अतुल सूद, आर. महालक्ष्मी, टिप्लुत नोंगब्री, उत्सा पटनायक, सुरजीत मजुमदार, जयति घोष, रितू एम. जेरथ, डॉ. राजर्षि दासगुप्ता, मोहिंदर सिंह, विकास रावल, उदय कुमार, चमन लाल, डॉ. मल्लारिका सिन्हा रॉय, जी. अरुणिमा, आयेशा किदवई, प्रभात पटनायक, सी पी भाम्बरी, लता सिंह (सभी जेएनयू), डॉ. सी सदासिव, रजनी पलरिवाला, बीपी साहू, वीएम झा, अमर फारूकी, नीना राव, बिस्वमोय पाती, मदनगोपाल सिंह (सभी डीयू), सुकुमार मुरलीधरन, सत्यम, हर्ष कपूर (सभी पत्रकार), राम पुनियानी, फराह नकवी, तीस्ता सीतलवाड़, हर्ष मंदर, कात्यायनी, गीता हरिहरन, शबनम हाशमी, सुभाष गाताडे (सभी लेखक-कार्यकर्ता), प्रबीर पुरकायस्थ, रूपसिंह चौहान, सारिका श्रीवास्तव (भाकपा), राजन क्षीरसागर (खेत मजदूर यूनियन), एम के रैना (नाट्यकर्मी), राम रहमान (फोटोग्राफर), सोहेल हाशमी, एस इरफ़ान हबीब, पी के शुक्ल, अर्जुन देव (सभी इतिहासकार),  संतोष खरे, बाबूलाल दहिया, देवीशरण ग्रामीण, के एस पार्थसारथी, ज्योति अनंथासुब्बाराव, सत्यानन्द मुकुंद, डॉ. सद्दाना गोवडा पाटिल, मुरली कृष्ण, सुरेन्द्र, अशोक भौमिक, डॉ. बी के कांगो, सुकुमार दामले, राजन बवडेकर, चारुल जोशी, मानसी पिंगले, वीणा हरिहरन, रजत दत्ता, ब्रह्मा प्रकाश, कल्याणी मेनोन सेन, कृष्ण झा, अभिषेक श्रीवास्तव, एस पी शुक्ल, संदीप कुमार, नीलिमा शर्मा, शमसुल इस्लाम (सभी कार्यकर्त्ता).

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