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श्री राम के जीवनकाल की वास्तविक तिथियों की खोज

बहुत कम इतिहासकार ही इतिहास को उसकी समग्रता में देखने का प्रयास करते हैं
तारा चंद्र त्रिपाठी
इतिहासबोध की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह किसी परंपरा या अतीत के घटना चक्र से अध्येता के भी चेतन या उपचेतन लगाव के चलते प्राकृतिक विज्ञानों की तरह पूर्णत: वस्तुगत नहीं हो पाता. कहीं न कहीं अतीत से लगाव या अलगाव अध्येता के आकलन प्रभावित कर ही देता है. फिर छ्द्म इतिहासकारों की क्या कही जाय जो किसी घटना की तिथि या नायक की महानता या उसके प्रतिद्वन्द्वी के खलनायकत्व को बलात सिद्ध करने पर तुले होते हैं. बहुत कम इतिहासकार ही इतिहास को उसकी समग्रता में देखने का प्रयास करते हैं.
यह भी सच है कि हर विजित जाति अतीत के गौरवगान का, भले ही वह अवास्तविक तथ्यों पर ही आधरित क्यों न हो, सहारा लेकर पुनर्जागरित और संगठित होने का प्रयास करती है. यही प्रयास किसी भी जाति या देश को नवोन्मेषित या पुनर्जाग्रत करता है. तो दूसरी ओर इसी गौरवगान के साथ सीमाहीन जुड़ाव अन्ध राष्ट्रवाद और तज्जन्य राजनीतिक और जातीय तनाव और अन्तत: सर्वनाशी महायुद्ध का कारण बनता है.
ऐसे इतिहासकारों की एक और विशेषता यह होती है कि वे अपने देश की किसी प्राचीन घटना को उसके सम्भावित युग से भी पीछे ऐसे अतीत में ले जाने का प्रयास करते हैं जिससे यह सिद्ध कर सकें कि उनके अपने पूर्वजों के अलावा संसार के सारे समाज अर्द्ध जांगल अवस्था में थे. भगवान राम युग के आकलन से जुड़े ऐसे ही एक उदाहरण से इसे स्पष्ट किया जा सकता हैं.
प्रतिष्ठित खगोलशास्त्री श्री कृष्णानन्द सिन्हा, द्वारा अनूदित, श्री पुष्कर भटनागर द्वारा लिखित एवं ’वेदों पर वैज्ञानिक शोध संस्थान’ द्वारा प्रकाशित ’श्री राम के युग का तिथि निर्धारण. (श्री राम के जीवनकाल की वास्तविक तिथियों की खोज) का उल्लेख किया जा सकता है. पुस्तक भव्य है. वाल्मीकि रामायण में अंकित ज्योतिषीय उल्लेखों का तारामंडल सौफ्ट्वेयर की सहायता से
सटीक विश्लेषण करते हुए भगवान राम के जीवन की विभिन्न घटनाओं को तिथि सहित अंकित किया गया है . यथा
भगवान राम का जन्म १० जनवरी ५११४ ई.पू., १२.१० अपराह्न,
राजतिलक की तिथि जो बनवास में बदल गयी ४ जनवरी ५०८९ ई.पू.
सूर्पनखा प्रकरण २२ सितम्बर ५०७७ ई.पू.
खर-दूषण के साथ युद्ध २२ सितम्बर ५०७७ ई.पू.
सीता हरण ०३ जनवरी ५०७६ से पहले हुआ होगा
बालि वध १६ अप्रैल ५०७६ ई.पू.
हनूमान जी की लंकायात्रा की तिथि १२ सितम्बर ५०७६ ई.पू.
वापसी १४ सितम्बर ५०७६ ई.पू.
वापसी पर श्री राम से भेंट १९ सितम्बर ५०७६ ई.पू.
समुद्र लांघने के बाद राम सेना के लंका के किले तक पहुंचने की तिथि और समय १२ अक्टूबर ५०७६ ई.पू. रात्रि
मेघनाद वध २३ नवंबर ५०७६ ई.पू.
रावण वध ०४ दिसम्बर ५०७६ ई.पू.

रामायण की भाषा भी पाणिनि के युग के बाद की है
लेखक ने अथाह परिश्रम किया है पर उसने यह विचार नहीं किया कि वाल्मीकि रामायण के विभिन्न प्रकरणों में दिये गये ज्योतिषीय विवरण प्रक्षिप्त भी हो सकते हैं. परिणामत: वह भगवान राम की अवस्थिति को उस युग में खींच ले गया, जब भारतीय मानव सभ्यता नव पाषाण काल से गुजर रही थी. भीम बैठका और केरल के अडिक्कल में गुफावासी मानव गेरू से चित्र अकित कर रहा था. सिन्धु गंगा के मैदानों में कहीं कहीं कच्ची ईंटों से झोपड़े और आरम्भिक कृषि उपकरण अस्तित्व में आ रहे थे. उसने यह भी ध्यान नहीं दिया कि रामायण की भाषा भी पाणिनि के युग के बाद की है, जिसके आधार पर विद्वानों ने किस्के रचना की तिथि ५वीं शताब्दी ई.पू. से लेकर पहली शताब्दी ई.पू. के बीच की मानी है.

लेखक ने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि वाल्मीकि एक व्यक्ति न हो कर वशिष्ठ, विश्वामित्र, आंगीरस, अत्रि, कण्व की तरह युगान्तरों तक चलने वाली गुरु शिष्य परंपरा या गोत्र भी हो सकती है और इस प्रकार रामायण के रचनाकार वाल्मीकि और राम के युग के वाल्मीकि (यदि वे कभी हुए हों) दो अलग अलग व्यक्ति हो सकते हैं.
उदाहरण के लिए ऋग्वेद के कुछ सूक्तकारों की गुरुशिष्य परंपरा प्रस्तुत कर रहा हूँ
विश्वामित्र
मधुच्छन्दा वैश्वामित्र, विश्वामित्र गाथिनः,ऋषभः वैश्वामित्रः, रेणुः वैश्वामित्रः, कतः वैश्वामित्रः, प्रजापति वैश्वामित्रः, गाथिनः विश्वामित्र, वैश्वामित्रः वाच्यः वा प्रजापतिः, अष्टकः वैश्वामित्रः, पूरणः वैश्वामित्रः, विश्वामित्र जमदग्निः
वशिष्ठः मैत्रावरुणिः
वासिष्ठः इन्द प्रमति, वासिष्ठः वृषगणः, वासिष्ठः मन्युः , वासिष्ठः उपमन्यु, वासिष्ठः व्याघ्रपात, वासिष्ठः शक्ति, वासिष्ठः कर्णश्रुतः, वासिष्ठः मृळीकः, वासिष्ठः वसुक्रः, शक्ति वसिष्ठः, प्रथः वाशिष्ठ, वासिष्ठः इन्द प्रमति, वासिष्ठः वृषगणः
आंगीरस
संर्वतः आंगीरसः, धु्रवः आंगीरस, अभीवर्तः आंगीरस, प्रचेता आंगीरसः, विहव्यः आंगीरसः, पवित्र आंगीरसः, अमहीयुः आंगीरसः, उचथ्यः आंगीरस, भिक्षु आंगीरसः, अयास्यः आंगीरस, वृहन्मति आंगीरसः , रहूगणः आंगीरसः, प्रभुवसुः आंगीरसः, हिरण्यस्तूप आंगीरस, प्रियमेघः आंगीरसः, नृमेघः आंगीरस,
बिन्दु आंगीरस, दिव्य आंगीरसः ,शिशुः आंगीरस, सुकक्ष आंगीरस, कृतयशः आंगीरसः, कृष्णः आंगीरस,: कण्वः आंगीरसः, पुरुहन्मा अंागिरस ,हरिमन्तः आंगीरसः, अमहीयुः आंगीरस, रहूगणः आंगीरस, विरूप आंगीरस, उचथ्यः आंगीरस, अयास्यः आंगीरसः
आत्रेय
प्रतिरथः आत्रेयः, प्रतिभानु आत्रेयः, प्रतिप्रभः आत्रेयः, स्वस्त्यात्रेयः, श्यावाश्वः आत्रेयः, श्रुतवित आत्रेयः, अर्चनाना आत्रेयः, रातहव्यः आत्रेय, यजतः आत्रेयः,
उरुचक्रि आत्रेयः, वहुविक्त्रि आत्र, पौरः आत्रेयः, अवस्युः आत्रेयः, सप्तवध्रि आत्रेयः, सत्यश्रवा आत्रेयः, एवया मरुत आत्रेयः, बुधगविष्ठरौ आत्रेयौः, ऋषिकुमार आत्रेय, वसुश्रुत आत्रेय, इषः आत्रेय, गयः आत्रेयः, सुतंभरः आत्रेयः, पुरुः आत्रेयः, वसूयवः आत्रेयाः
(इस प्रकार से मेरी रचनाओं को भी मेरे गोत्र के संस्थापक गौतम ऋषि की रचना माना जा सकता है )

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