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संघ का लाठीधारी देशभक्त, बैंकों में लाठी खाकर जान देने वाला देशद्रोही ?

संघ का लाठीधारी देशभक्त, बैंकों में लाठी खाकर जान देने वाला देशद्रोही ?
मो. हफीज पठान
क्या अजब तमाशा इन दिनों देश में संघ की शाखा में लाठी भांजने वालों ने कर रखा है !
भाई भक्त हो तो ऐसा लाठीबाज जिन्हें आज तक देशवासियों की दुर्दशा का नजारा ही नहीं किया है। खुली आँखों से दिखने वाले नजारे भी भला अब इनकी नजरों से ओझल ही बने हैं।
देश में राष्ट्रीयता देश भक्ति, धर्म, पूजा, देव देवालयों के साथ आस्तिक, नास्तिक नैतिकता पर इन भक्तों ने बेशर्मी से कब्ज़ा कर लिया है।
अंधभक्त अब तक देश में काला धन, आतंकवाद, गरीबी, धारा 370, समान सिविल कोड, दाउद, हाफिज सईद, पकिस्तान की समस्या का पूर्ण समाधान कर चुके हैं।

जुमलेबाजी की भी कोई हद होती है।
राष्ट्र की आजादी के आन्दोलन से दूर रहे ये अंधभक्त राष्ट्रपिता की हत्या करने से लेकर आज तक देश में दंगों के नाम पर गाय माता के नाम पर, धर्म के नाम पर बेकसूर देशवासियों को ही मारते हैं। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से दंगाइयों की भीड़ के न्याय को ये स्वतंत्र भारत में अपना न्याय मानकर इसको संविधानेतर न्याय व्यवस्था पर जबरन थोपना चाहते हैं।
सवाल उठाना लोकतंत्र की आत्मा है उसे भी अंधभक्त हमसे छीन लेना चाहते हैं। आखिर ये देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।
संघ की शाखा में लाठियों भांजने वाले नेकरधारी देश वासियों को बैंक की कतार में खड़े होकर लाठियां खाने एवं जान जाने पर मौन रहने का उपदेश दे रहे हैं।
बैंक की कतार में खड़े देशवासियों का धैर्य आज तक नहीं टूटा है, भले ही साँसों की डोर थम जाए।

संघ की राष्ट्र भक्ति की चाशनी में डूबे सत्ता के पकवान खाने वाले संघियों के द्वारा देश की जनता को परिवार सहित बैंको की लाइन में खड़ा कर दिया गया है।

लोग मर रहे हैं, फिर भी मरने वाले देश के गरीबों की मौत की परवाह छद्म देश भक्तों को नहीं है।
यह कैसा राष्ट्रवाद है जिसमें सरकारी नीतियों के कारण अपने ही पैसे को पाने के लिए जनता बैंक की कतारों में मर रही है, तो कहीं पुलिस की लाठियां खा रही है। शायद इस देश में अब विजय माल्या, अडानी, अम्बानी बंधुओ के साथ संघ के नेकर धारी बाबा रामदेव आन्ध्र प्रदेश के रेड्डी बंधू ही वास्तविक देश भक्त हैं, इनकी ही चिंता देश की सरकार को है।
नोटबंदी के इस बुरे समय में ही विजय माल्या जैसों का कर्जा माफ़ हो रहा है, तो अम्बानी की जियो सिम के साथ उसके पेट्रोल पंप खूब तेल बेच रहे हैं। बाबा राम देव का योग भी अब खूब आटा, चावल, दाल के साथ सत्ता के तड़के का मसाला बेच रहा है। बाबा
रामदेव के साथ इन भक्तों की देशभक्ति भी बड़ी विचित्र है।
संघ के प्रचारक बनने के लिए पत्नी का त्याग करने वाले अपने त्याग को रो-रोकर देशवासियों को सुना रहे हैं।
सचमुच में देश बदल रहा है देश की सीमाएं आज भी आतंक के शैतानों की गोलियों से जख्मी हैं।
देश की जनता बैंक में रो रही है। बेटी की शादी के पैसों के इंतजाम नहीं होने से बूढ़ा बाप दुनिया छोड़ कर जा रहा है।
बेटे के इलाज के लिए कहीं बाप पसे हाथ में लेकर इलाज की भीख मांग रहा है तो कहीं जवान बेटों का ठुकराया बाप पेंशन की चिंता में बैंक में खड़ा गश खाकर बेहोश हो रहा है।

किसानों के पास बीज के लिए पैसे नहीं हैं, पैसे हैं पर वे चलते नहीं हैं।
मजदूर मंदी से छटनी का शिकार बन कर बेरोजगार हो रहा है। सभी की आँखों में आंसू आ रहे हैं ! फर्क इतना है कुछ शर्म लोक लाज के कारण घर के कोने में एकांत में रोते हैं, कुछ टीवी कैमरों के सामने बेशर्मी से राजनीति चमकाने के लिए रो रहे हैं।
सतयुग में श्रवन कुमार बूढ़े माँ बाप को अपने कंधो पर बैठाकर पैदल ले जाकर तीर्थ यात्रा करवाता है। माँ बाप की सेवा कर के उनके उपकारों का प्रतिफल देकर श्रवण कुमार बूढ़े माँ बाप के लिए अपनी जवानी की उर्जा लगा देते हैं। अपनी राजनीति  चमकाने के लिए कलियुग में लोग अपनी माँ को  चार हजार रूपये के लिए बैंक की लाइन में खड़ा कर देते हैं।
इनमें धार्मिक सत्य पुरुष कौन है? धर्म किसके साथ है श्रवण कुमार के या राष्ट्रवाद के पाखण्ड से ग्रसित होकर आंसू बहाने वाले के।
जनता के जीवन की डोर भी बैंक की कतार में टूट रही है।
धन के अभाव में कहीं बेटी का रिश्ता टूट गया है तो कहीं शादी का कार्ड हाथ में लेकर बाप दुनिया छोड़ कर जा रहा है।
मज़बूरी, बेबसी, लाचारी, अपराध बोध से सारी जनता सुबह उठ कर बैंक में जा रही है।
बीमार बेटा, जवान बेटी, बेघर, बेरोजगार जनता के दुखों की सुनने वाले छद्म देश भक्त सत्ता के नशे में मदहोश हो गये हैं।

देश की बिकाऊ पत्रकारिता और अहंकारी सरकार में नापाक गठजोड़ हो गया है।
सरकार के दावे जमीन पर कहीं नही दिखते हैं, इसी प्रकार देश का मीडिया जमीनी हकीकत से कोसों दूर खड़ा सरकारी भोपूं बन गया है।
देशवासियों की आशा, बाप की हसरतें, बेटी की डोली उठाने के अरमान, किसान के खेत की फसलें, शादी समारोह, छात्रों की फ़ीस, बीमार की दवाई, हाथों में पैसे होने उपरान्त पहुँच से दूर हो गयी है।
लगता नहीं है हम लोकतान्त्रिक भारत गणराज्य के स्वतंत्र राष्ट्रवासी हैं।
मैं धारक को एक हजार रूपये अदा करने का वचन देता हूँ। हजार रूपये के नोट पर छपे बैंक के इस वचन को भारतवासियों से भारत की सरकार ने ही छीन लिया है। देश की सीमा पर सैनिक खेत में किसान बैंक में हर कहीं बेगुनाह देशवासी मर रहे हैं।
राष्ट्र भक्त सरकार के लाठी धारियों की संवेदना शून्य हो गयी है।
बाबा रामदेव सरीखे पाखंडी योग के नाम पर भोगी बने देश की जनता को सब कुछ सहने के उपदेश दे रहे हैं।
मोदी की सरकार में इनके भी अच्छे दिन आ गए हैं। संघ व बाबा दोनों ही देश की जनता को धर्म का अफीम पिलाकर उसे चेतना शून्य कर रहे हैं, ताकि देश भर में उनका अनैतिक व्यापार चलता रहे।
बाबा रामदेव की देशभक्ति शहीद भगत सिंह से प्रभावित थी, जो कुछ ही दिनों तक चली थी। देश की जनता को बाबा रामदेव का कांग्रेस शासन में किया आन्दोलन याद है। मुस्लिम संस्कृति के मिलन से देश में आई महिला सलवार से बाबा का गहरा रिश्ता है।
शहीद भगत सिंह को अपना आदर्श मानने वाले बाबा ने आधी रात को दिल्ली में मंच पर योगासन करने के बजाय देशी पुलिस के सामने कूदासन किया था।
बाबा की भगत सिंह बनने की कला फ़िल्मी कहानी की तरह कुछ देर ही चली।
विदेशी बादशाहों की लायी सलवार तब बाबा रामदेव की स्वदेशी धोती पर भारी पढ़ गयी थी।

बाबा ने विदेशी सलवार पहनकर ही तब अपनी जान बचाई थी।
देश भर में सलवार दिवस बाबा के कारण ही देशवासी मनाते हैं। तीर से तलवार से ना गोलियों की बोछार से बाबा बचा है सिर्फ औरतो की सलवार से। लो यह गीत गाकर बाबा ने देश की आधी आबादी महिलाओं का दिल भी जीत लिया है।
सच में बाबा बड़ा होशियार है. अब तो उसे नोट बंदी का विरोध करने वाले देशवासी ही देशद्रोही नजर आ रहे हैं।
इसलिए देशी पुलिस भी अब तो बैंक की लाईन में लगे देशद्रोहियों को संघ की स्वदेशी राष्ट्रवादी लाठियों से पीट रही है।
संघ बाबा पुलिस की मिलीभगत से बैंक की लाइन में लगे देशद्रोहियों का अपराध भी अब तो देश के सामने आ गया है।
देश के गरीब देशद्रोही के कारण ही बाबा, सरकार का साथी देश भक्त विजय माल्या आज देश छोड़ कर चला गया है। उसके काले धन से चुनाव लड़ने वाले बाबा के सत्ताधारी सारे सांसद सरकार होने के बाद भी अब चुनावी चंदे के लिए दुखी हो रहे हैं।
गरीब देशवासी के संगीन जुर्म की सजा ये ही है कि ये रोज बैंक की लाइन में लग कर पिटते रहें। देश में किसान मरे, मजदूर मरे, इनके परिवार शादी के लिए नोटों की भीख मांगे, ये ही उनकी सजा है। हमारे तो आंध्रप्रदेश के देशभक्त रेड्डी बन्धु भाजपा नेता अपनी शादी में पांच सौ करोड़ खर्च करने के बाद भी हमारे शासन में मौज कर रहे हैं।
वैसे भी छदम देशभक्तों की सरकार की नजर में देश के दलित अल्पसंख्यक सैनिक किसान को मौतों की कीमत ही क्या है जो इसकी चिंता की जाए।
अब देश में जय जवान जय किसान का नारा कहीं नहीं लगता है।
देश में रोहित वेमुला नजीब की माँ की सुनने वाला कोई नहीं है।
गोमाता के नाम पर देशवासी मारने वाले शायद इंसानों की लाशों को भी उसी प्रकार अब देश में भूले रहे हैं जैसे वर्ष 2002 के दंगो में मरने वालों को गुजरात राज्य में भूल चुके हैं। 
राष्ट्रवाद के खोखले नारे लगाने वालों की सरकार में हजारों किसान पहले भी तो आत्महत्या कर चुके हैं। कहते हैं दूसरो को दुःख देने वालों का भी सुख चैन चला जाता है, उन्हें नींद नही आती है।
यही कारण है कि हमारे पी.एम. भी एक ही दिन में कई-कई बार आंसू बहा रहे हैं। हम तो इस पर यही कहेंगे कि संत सताए तीन गए धन वैभव और वंश, नहीं करा तो देख ले रवां कोख कंस।
शायद देश में अब भाजपाई भी रावण, कौरव, कंस बनने की राह पर चल पड़े हैं।
देश के हालात एवं भाजपाइयो की मानसिकता से तो यही सन्देश मिल रहे हैं। ।
 

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