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संघ की गोद में शिक्षा- एचआरडी मंत्रालय के सारे फैसले पीएमओ में हो रहे हैं या फिर नागपुर से

मोदी का मंत्रिमंडल भी अपने किस्म का अजायबघर ही है
महेंद्र मिश्रा
प्रधानमंत्री मोदी का मंत्रिमंडल भी अपने किस्म का अजायबघर ही है। एक मंत्री हैं वी के सिंह। वह कौन विभाग सम्भालते हैं, शायद ही किसी को जानकारी हो, लेकिन चर्चा में हमेशा रहते हैं। विदेशी महकमे का हिस्सा होने के नाते उनसे ज्यादा सभ्य होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन जनरल साहब लोगों की कुत्तों और जानवरों से ही तुलना करते फिरते हैं।
एक दूसरे सज्जन हैं। नाम है महेश शर्मा। पेशे से डाक्टर हैं। लेकिन उसकी सलाहियत उनमें दूर-दूर तक नहीं दिखती। जनाब हैं तो संस्कृति मंत्री, लेकिन अपसंस्कृति फैलाने के मामले में वो दूसरों का भी कान काट लें। सांप्रदायिकता भड़काना उनका शगल है। पुरस्कार विवाद आगे बढ़ा तो साहित्यकारों को उन्होंने न लिखने की ही सलाह दे डाली, क्योंकि शर्मा जी मानते हैं कि लिखने पर पुरस्कार मिलेगा। फिर पुरस्कार मिलने पर साहित्यकार उसे लौटाएंगे, लिहाजा उन्होंने सारे झगड़े की जड़ ही खत्म करने का रास्ता ढूंढ निकाला।
एक तीसरी मंत्री हैं स्मृति ईरानी। उनका तो कोई जवाब ही नहीं हैं। उन्होंने एचआरडी मंत्रालय का मानो भट्टा ही बैठाने का फैसला कर लिया है। वह दर्जा 12 पास हैं। इस पर किसी को क्यों ऐतराज होगा। इस बात से भी ऐतराज नहीं होगा कि ईरानी जी झूठ बोलती हैं और सात दिन की सर्टिफिकेट को डिग्री बताती हैं। भला इस बात से भी ऐतराज क्यों होना चाहिए कि एक दोयम दर्जे का टीवी कलाकार सीधे राजनीति के शीर्ष पर पहुंच गया। ऐतराज इस बात का भी नहीं है कि लोकसभा चुनाव में बुरी हार के बावजूद वह देश की शिक्षा मंत्री बना दी गईं। ऐतराज उनके तुगलक होने पर है। उनकी कलम से रोजाना जन विरोधी फैसले हो रहे हैं। ऐतराज इन फैसलों पर है। लिहाजा अब कोई चुप नहीं रह सकता। यही बात देश के शोध छात्र भी कह रहे हैं।
दरअसल यूजीसी ने गैर नेट फेलोशिप को अचानक समाप्त कर दिया। 7 अक्तूबर को आयोग की बैठक में इस बात का फैसला हुआ। खबर दो हफ्ते बाद आई। जब आयोग की वेबसाइट पर बैठक का सार दिया गया। फिर छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा। फैसले के खिलाफ दिल्ली से लेकर इलाहाबाद और राजस्थान से लेकर उत्तराखंड तक छात्र सड़कों पर उतर आए। अक्यूपाई यूजीसी #occupyugc नारे के साथ छात्र दिल्ली मुख्यालय पर डेरा डाल दिए हैं। पुलिस का बर्बर लाठीचार्ज भी उनकी हिम्मत नहीं तोड़ सका है। हजारों लड़के और लड़कियां सर्दी की रात में अभी भी वहीं डटे हैं, लेकिन इस खात्मे के पीछे सरकार का क्या तर्क है। आधिकारिक तौर पर यह बात सामने नहीं आई और न ही सरकार का कोई नुमाइंदा इस पर कुछ बोलने के लिए तैयार है।
यूजीसी उच्च शिक्षा में विभिन्न छात्रवृत्तियों और फेलोशिप के जरिये छात्रों और शोध छात्रों की मदद करती है। इसमें नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट-जूनियर रिसर्च फेलोशिप (एनईटी-जेआरएफ) और गैर एनईटी फलोशिप प्रमुख हैं। इसके तहत यूजीसी प्रत्येक साल एमफिल और पीएचडी के 3200 छात्रों को नेट-जेआरएफ छात्रवृत्ति देती है। यह शिक्षक के लिए होने वाली नेट परीक्षा में मेरिट के आधार पर होता है। इसके तहत एक जेआरएफ को मासिक तौर पर 25000 रुपये मिलते हैं। इस तरह से देश में जेआरएफ पाने वाले तकरीबन 9000 छात्र हैं। नेट से इतर शोध करने वालों को भी यूजीसी वजीफा देती है। यह कार्यक्रम केवल 50 संस्थाओं तक ही सीमित है। इसके तहत एमफिल के छात्र को 5000 और पीएचडी को 8000 रुपये मिलते हैं। देश में कुल तकरीबन 35000 छात्र इसके लाभार्थी हैं। छात्रों का कहना है कि इससे जो कुछ गरीब छात्रों को मदद मिलती थी, उससे वो वंचित हो जाएंगे। जबकि सरकार से जुड़े लोगों ने रद्द करने के पीछे पारदर्शिता न होने का हवाला दिया है।
हालांकि छात्रों के विरोध के चलते मामले में पीएमओ को दखल देना पड़ा और उसने एचआरडी मंत्रालय से रिपोर्ट भी मांगी है। साथ ही मंत्रालय ने 7 अक्तूबर के आदेश को रद्द करने का यूजीसी को निर्देश जारी किया है। लेकिन इसके साथ ही पांच सदस्यीय एक पैनेल का गठन कर दिया है। जिसकी रिपोर्ट दिसंबर तक आनी है। इसमें आर्थिक और दूसरे मापदंडों के आधार पर पूरी योजना की समीक्षा की बात कही गई है। मौजूदा दौर में कोई वित्तीय और मेरिट संबंधी मानदंड नहीं है। छात्र इसके खिलाफ हैं। लिहाजा उन्होंने आंदोलन को जारी रखने का फैसला लिया है।

शायद शिक्षा की कमर तोड़ने का फैसला कर लिया है ईरानी ने
ईरानी ने शायद शिक्षा की कमर तोड़ने का फैसला कर लिया है। इसकी शुरुआत भी उन्होंने जड़ यानी बच्चों से ही की है। बच्चों के कुल बजट में बेपनाह कटौती हुई है। 2014-15 में इस मद में मिलने वाली 81075.26 करोड़ की राशि को 2015-16 में घटाकर 57918.51 करोड़ कर दिया गया। यानी 4.52 फीसदी से घटकर यह 3.26 हो गई। एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) में एकमुश्त कटौती की गई है। इसके बजट को 18195 करोड़ से घटाकर 8335.77 करोड़ कर दिया गया है यानी आधे से भी कम। एचआरडी मंत्रालय की सबसे लोकप्रिय और चर्चित योजना सर्वशिक्षा अभियान को भी नहीं बख्शा गया। रास्ते में ही इसे लंगड़ी मार दी गई है। सरकार ने इसके बजट को 27758 करोड़ से घटाकर 22000 हजार करोड़ कर दिया। बच्चों के मुंह से निवाला तक छीन लिया गया। सबसे ज्यादा छात्रों को स्कूल की दहलीज तक ले जाने वाले मध्यान्ह भोजन की राशि को 13215 करोड़ से घटाकर 9236 करोड़ कर दिया। शिक्षा के कुल बजट में 17 फीसदी की कटौती की गई है। उच्च शिक्षा से एकमुश्त 800 करोड़ रुपये कम कर दिए गए। बिहार चुनाव और गाय की गहमागहमी का फायदा इसी मंत्रालय ने उठाया। चंद दिनों पहले इसने एनआईटी की फीस में 300 गुना की बढ़ोत्तरी का ऐलान कर दिया। यानी 70 हजार रुपये फीस को एक फैसले से बढ़ाकर 2 लाख 10 हजार कर दिया गया। इस मसले पर किसी ने एक बयान देने तक की जहमत नहीं उठाई।
किसी क्षेत्र में ईरानी भले ना सफल हों लेकिन एक मामले में 100 फीसदी खरी उतरी हैं। वह है संघ के प्रति समर्पण। उन्होंने अपने पूरे मंत्रालय को संघ को गोद दे दिया है। लिहाजा मंत्रालय संबंधी सभी फैसले नागपुर से लिए जा रहे हैं या फिर उससे जुड़े लोग ले रहे हैं। आरएसएस के ‘युगपुरुष’ दीना नाथ बत्रा मंत्रालय के नये भाग्य विधाता बन गए हैं। वह मंत्रालय के पथ प्रदर्शन का काम कर रहे हैं। विषयों के पाठ्यक्रम का मसला हो या फिर इतिहास में कोई बदलाव। हर जगह उनका दखल रहता है। भारतीय इतिहास अनुसंधान संस्थान (आईसीएचआर) से लेकर नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) तक में अपने लोगों को बैठाया जा रहा है। वाई एस राव को आईसीएचआर का अध्यक्ष बनाया गया है। उनका किसी ने नाम तक नहीं सुना था। उपलब्धियों के नाम पर उनके पास अपना ब्लाग है, जिसमें उन्होंने जाति व्यवस्था की तारीफ में कसीदे पढ़े हैं। इतिहास को नये सिरे से लिखने की तैयारी चल रही है। इसमें तमाम पुरानी किंवदंत्तियों, वेद, पुराण और श्रुतियों को अब ऐतिहासिक तथ्य माना जाएगा। जल्द ही उन्हें इतिहास का हिस्सा बना दिया जाएगा। सरकार इस पर मुहर लगवाने की कवायद में जुट गई है। इसके जरिये संघ अपनी सालों की दमित इच्छाओं और मनगढंत झूठ को लागू करना चाहता है। जगह-जगह पाठ्यक्रमों में धार्मिक आधार पर बदलाव का अभियान छेड़ दिया गया है। हरियाणा से लेकर राजस्थान तक सरस्वती पूजा को अनिवार्य कर दिया गया है।

आईसीएसई बोर्ड खत्म करने की साजिश
ईरानी के तुगलकी फरमान से जुड़ी एक और खबर आई है। मंत्रालय ने आईसीएसई बोर्ड से पूछा है कि आपको क्यों न खत्म कर दिया जाए? आपकी प्रासंगिकता क्या है? इस सिलसिले में उसे रिमांइडर पर रिमाइंडर भेजे जा रहे हैं। बोर्ड के गठन से जुड़ी फाइलों को खंगाला जा रहा है। इसके लिए मंत्रालय के नौकरशाहों की नांक में दम कर दिया गया है। पढ़ाई के लिहाज से आईसीएसई देश में सबसे बेहतर बोर्ड माना जाता है। लेकिन ये ईरानी और उनके आकाओं की आंख में इसलिए गड़ रहा है। क्योंकि इसमें आने वाले ज्यादातर स्कूल ईसाई मिशनरियों के हैं। धार्मिक और सांप्रदायिक आधार के ये फैसले बताते हैं कि हम कहां पहुंच गए हैं। यह सब हो रहा है उस मंत्रालय में जिसे सबसे ज्यादा तटस्थ रहना था। सरकार ने यूजीसी तक को खत्म करने का मन बना लिया है। लेकिन दबाव में यह फैसला रुका हुआ है।
12 पास ईरानी विश्वविद्यालयों के तमाम नामचीन कुलपतियों की बैठक की सदारत करेंगी। यह कल्पना कर पाना भी मुश्किल है लेकिन अब हकीकत बन चुकी है। बच्चों को बड़ों को डांटने का बड़ा शौक होता है। शैक्षिक बचपना कहिए या फिर अपने पद का अहंकार ईरानी ने भी इस शगल को पाल लिया है। किसी दिन किसी विश्वविद्यालय के कुलपति की बारी होती है या फिर मंत्रालय से जुड़ी संस्थाओं के चेयरमैन या कोई नुमाइंदा। दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश सिंह के खिलाफ तो उन्होंने अभियान ही छेड़ दिया। उन्होंने रवींद्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन को भी नहीं बख्शा। विश्वभारती के कुलपति कोर्ट तक में घसीट लिया। ईरानी एएमयू के कुलपति से आए दिन स्पष्टीकरण मांगती रहती हैं। स्वायत्तता नाम की चिड़िया भी कोई होती है। इसकी जानकारी ही उन्हें नहीं है।
दरअसल शिक्षा से जुड़ी सारी संस्थाए पूरी तरह से स्वायत्त हैं। उनमें मंत्रालय की सीधे दखल बिल्कुल न्यूनतम रही है। किसी आपातकालीन या फिर बहुत जरूरी स्थिति या फिर कहें मजबूरी बश मंत्रालय ऐसा करता रहा है। लेकिन अब तस्वीर बिल्कुल उल्टी है। आईआईएम और आईआईटी जैसी देश की हमरौशन संस्थाओं की स्वायत्तता बिल्कुल खत्म की जा रही है। उन्हें मंत्रालय सीधे अपने हाथ में लेना चाहता है। हालांकि इन संस्थाओं में इसका जबर्दस्त विरोध है।

मंत्रालय के सारे फैसले पीएमओ में हो रहे हैं या फिर नागपुर से।
ईरानी के एचआरडी मंत्री बनने पर लोग अचरज में थे। हर कोई औचित्य को समझने की कोशिश कर रहा था। लेकिन मोदी का यह फैसला बिल्कुल सोची समझी रणनीति का हिस्सा था। किसी काम को बेहतर तरीके से कराने की दो शर्तें हैं। पहला उस काम को सबसे जानकार और माहिर आदमी को सौंप दिया जाए। फिर किसी दखल की जरूरत ही ना पड़े। दूसरा उसे ऐसे आदमी के हवाले कर दिया जाए जिसकी उसे जानकारी ही न हो। ऐसे में दूसरों की मदद लेना उसकी जरूरत बन जाएगी। पहले में खतरा इस बात का है कि वह अपनी बुद्धि से फैसले लेगा और उस पर नियंत्रण मुश्किल है। अगर किसी मामले में निचले स्तर पर उतरना होगा तो वह शायद उसके लिए भी तैयार ना हो। ऐसे में मोदी-संघ को दूसरा विकल्प सबसे बेहतर दिखा। इस मामले में ईरानी उन्हें सबसे उपयुक्त दिखीं। इस दूरदर्शिता का लाभ भी दोनों को मिल रहा है। मंत्रालय के सारे फैसले पीएमओ में हो रहे हैं या फिर नागपुर से।

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महेंद्र मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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