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संघ के अनुदारवाद, अ-लोकतांत्रिक हिन्दुत्ववाद का गहरा असर मोदी पर

पिता के प्रति मोदी की घृणा की अभिव्यक्ति !
नरेन्द्र मोदी के भाषण और विचारधारा
जगदीश्वर चतुर्वेदी
यह सच है कि गुजरात के मुख्यमंत्री और आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्रीपद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी खूब बोल रहे हैं। उनका पूरा नाम है नरेन्द्र दामोदरदास मोदी। संभवतः वह पहले नेता हैं जिनके प्रत्येक भाषण का लाइव राष्ट्रीय प्रसारण एक साथ अनेक चैनलों से हो रहा है। मोदी के भाषणों की लाक्षणिक विशेषताएं क्या हैं ?
    मोदी की सभाओं की बड़ी खूबी है उनमें बड़े पैमाने पर युवाओं की खासकर 40 साल से कम उम्र के युवाओं की बहुत बड़ी संख्या हमेशा मौजूद रहती है। इससे यह साफ है कि वे युवाओं को अपनी मीटिंगों में आकर्षित करने में सफल हो रहे हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि मोदी के नाम को दूर-दराज के इलाकोंमें रहने वाले भी जान गए हैं। विगत 8 महीने से मोदी ने आम सभाओं और मीडियाप्रचार के जरिए मोदी के नाम को जनप्रिय बना दिया है और अब लोग अटल-आडवाणी की जगहमोदी को आधार बनाकर बातें कर रहे हैं। अटल-आडवाणी के नाम की जगह आम लोगों में मोदी के नाम का जनप्रिय होना उनके प्रौपेगैण्डा की पहली बड़ी सफलता का संकेत है।
      संघ परिवार की अटल-आडवाणी के विकल्प कीतमाम कोशिशें सफल नजर आ रही हैं और आम भाजपा कार्यकर्ता एक स्वर से मोदी को अपनानेता मान चुका है और मोदी को आम जनता में भाजपा के प्रमुख नेता के रुप में स्वीकृति भी मिल गयी है। दूसरी बड़ी सफलता यह है कि मोदी को अपनी जनसभाओं के लिएपर्याप्त संख्या में जनता सुनने आ रही है।
    मोदी के प्रचार अभियान का पहला निशाना तो वे स्वयं हैं। वे गुजरात में जिस कट्टरवादी हिन्दुत्ववादी अभियान में लगे रहे हैं उसका ही अपने भाषणों के जरिए नकार पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। यानी मोदी का प्रचार विचारधारात्मक तौर पर आत्म-विध्वंसक है। उनके भाषणों का दूसरा पहलू है इतिहास विध्वंसक का।
      यह सच है मोदी को भारतीय कारपोरेट घराने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एक बडा हिस्सा खुलेआम समर्थन दे रहा है। कारपोरेट मीडिया और खासकर इलैक्ट्रोनिक मीडिया खुलेआम उनकी तरफदारी कर रहा है और मोदी के मानसिक ताने-बाने को समझने से परहेज कर रहा है। मोदी के भाषणों के नरेटिव रूप की चर्चा हमबाद में करेंगे, पहले हम यह जान लें कि मोदी की ओरआकर्षण क्यों है ? क्या मोदी के मानसिक ताने –बाने का उनकी राजनीतिक संरचनाओं औरमान्यताओं से कोई संबंध बनता है ? किसी नेता का मानसिक गठन उसकी प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक मूल्यबोध को गंभीरता सेप्रभावित करता है।
    मोदी की मनोसंरचना में एक शत्रु है और वह है कांग्रेस। मोदी का लक्ष्य है कांग्रेस का सफाया करना और खासकर गांधी परिवार के प्रति वे अपनी तमाम किस्म की घृणा व्यक्त करते रहते हैं। वे कई बार चुके हैं किमैं गांधी का सपना साकार करना चाहता हूँ। बतर्ज मोदी आजादी मिलने के बाद गांधी का सपना था कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाय। उल्लेखनीय है इस सपने को साकार करने का बीड़ा इसके पहले भाजपा या उसके पहले जनसंघ ने नहीं उठाया था। मोदी पहले नेता है जो कांग्रेस को खत्म करने के लिए वोट मांग रहे हैं। यानी फासिस्ट नेताओं की तरह उन्होंने अपना पहले शत्रु तय कर लिया है।
    मोदी की मानसिक संरचना में ‘भारत को ताकतवर’ बनाने की फैंटेसी बहुत गहरे बैठी हुई है। अपने समूचे प्रचार अभियान के दौरान वे इस फैंटेसी के साथ हर चीज को जोड़कर रहे हैं। असल में देखें तो भारत आज एक शक्तशाली देश है। लेकिन मोदी को यह तथ्य मान्य नहीं है। वे ‘ताकतवर’ का भिन्न अर्थ मानकर चल रहे हैं। सामान्य तौर पर भारत की एक देश के नाते सभी राष्ट्रों के प्रति, खासकर पड़ोसी राष्ट्रों के प्रति मित्रता बनाए रखने की नीति है। मित्रता के मार्ग से भारत कभी हटना नहीं चाहता। लेकिन मोदी को यह बात पसंद नहीं है। वे लगातार पड़ोसी देशों के प्रति मित्रता की नीति को कमजोरी मानते हैं और फिर इसे कांग्रेसी नेतृत्व की कमजोरी मानते हैं, फिर उसे राष्ट्र की कमजोरी के रुप में फैंटेसाइज करते हैं।
मोदीके मनोशास्त्र का ताना-बाना ‘मैं सही और सब गलत’ की धारणा से संचालित है। मोदी यह मान रहे हैं कि ‘भारत माता’ के लिए बाहरी शत्रुओं (पाकिस्तान-चीन) से खतरा है और वे भारत की कमजोरी का फायदा उठाकर जब इच्छा होती हैहमले कर देते हैं। इसके अलावा देश के अंदर ‘भारतमाता’ के मुख्य शत्रु कांग्रेस और मुसलमान हैं। मोदी के भाषणों में हमेशा शत्रु से राष्ट्र–राज्य को बचाने का आह्वान व्यक्त होता है। भारत पर अंदर और बाहर से शत्रुओं के हमले होते रहते हैं और इससे देश कमजोर हुआ है। देश को ताकतवर बनाना है तो शत्रुओं को परास्त करना, नेस्तनाबूद करना बेहद जरूरी है।
मोदी का मानना है भाजपा के अलावा सभी दल भ्रष्ट, भारत माताको कलंकित करने वाले, अनैतिक और पापाचारी हैं। देश को इन भ्रष्ट और पापाचारियों से बचाना सबसे बड़ी चुनौती है। भ्रष्ट और पापाचारियों के बारे में मोदी की अपनी निजी व्याख्याएं हैं जिनको वे परम पवित्र समाधान के रुप में पेश करते हैं और भाषणों में विपक्षियों के लिए उन तमाम रुपकों का इस्तेमाल करते हैं जो पापियों, दुराचारियों या नरकगामियों के लिए हमारी परंपरा में इस्तेमाल होते हैं।
    मोदी जब भी भाषण देते हैं तो अपने विरोधियों की आलोचना कम और उन पर घृणा की वर्षा ज्यादा करते हैं। विपक्ष को शत्रु मानना और उसके बारे में घृणा का प्रचार करना यह तरीका मूलतः अधिनायकवादी मनोदशा कीअभिव्यंजना है।
‘चाय बेचनेवाला मोदी’ इस बार के चुनाव में बडा मसला है। सवाल यह है इस ‘चाय बेचने वाले मोदी’ के रूपक के बहाने संघ परिवार और स्वयं मोदी किस तरह की मनोदशा को व्यक्त कर रहा है। हम यहां सुविधा के लिए ‘चाय वाला मोदी’ कहेंगे।
‘चाय वाला मोदी’ वह है जिसका अपने परिवार और पिता ने सही ढंग से पालन-पोषण नहीं किया और जिसको बहुत ही खराब परिस्थितियों में जीना पड़ा और धीरे धीरे बड़ा होना पड़ा। ‘चाय वाला मोदी’ बीच-बीच में माँ को याद करता है, माँ के पास जाता है, उसका आशीर्वाद लेता है लेकिन पिता का कभी जिक्र नहीं करता। यह प्रच्छन्नतः पिता के प्रति मोदी की घृणा की अभिव्यक्ति है। पिता और समाज की बचपन में मिली उपेक्षा ने मोदी के मन में समाज के प्रति एकखास किस्म का बदला लेने वाला भाव पैदा किया है। जो बच्चे बचपन में उपेक्षित रहेहों या पिता की उपेक्षा के शिकार रहे हों, उनबच्चों में समाज में कुछ कर गुजरने का सतह पर जो भाव दिखता है वह राजनीति मेंअधिनायकवादी मनोभाव को पैदा करता है। उपेक्षित और पीड़ित में बदले की भावना बहुतगहरे जडें जमाए रहती है। ‘चाय वाला मोदी’ असल में इसी दमित-वंचित मनोभाव से पैदाहुआ अधिनायकवादी नेता है जिसके अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्यताओं के प्रतिगहरी घृणा भरी हुई है। ‘चाय वाला’ बनकर मोदी गरीब होने का झूठा संदेश देना चाहते हैं। मोदी और उनका परिवार कभी गरीब नहीं रहा। निम्नमध्यवर्गीय परिवार में उनका जन्म हुआ और उनके पिता की चाय की दुकान थी, जिस पर वे अपने पिता की मदद करते थे। अपने पिता के काम में हाथ बंटाना कोई गलत काम नहीं है, और न यह गरीबी का द्योतक है। निम्नमध्यवर्गीय परिवार में रहने के बवजूद उनके पिता की ठीक ठाक आमदनी थी और उनको पिता ने औपचारिक शिक्षा की व्यवस्था की और हर संभव मदद की। ‘रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाले तरुण’ का बखान मोदी इस तरह करते हैं, गोया, वे अत्यंत गरीब परिवार में पैदा हुए थे और उनको गरीबी में बचपन गुजारना पड़ा था। मोदी को बचपन से लेकर प्रौढ़ावस्था में कभी निजी जीवन में गरीबी का सामना नहीं करना पड़ा। निम्नमध्यवर्गीय परिवार की समस्याओं से जरूर दो-चार होना पड़ा। उनकी निम्नमध्यवर्गीय बाधाएं और आकांक्षाएं उनको संघ के करीब ले गयीं। उनके समूचे व्यक्तित्व गठन पर संघ के अनुदारवाद और अ-लोकतांत्रिक हिन्दुत्ववाद का गहरा असर है। इसके कारण उनके व्यवहार भेदभाव का शास्त्र भी विकसित हुआ है।    लोकतांत्रिक उदारतावाद से मोदी ने कोई बेहतरमूल्य नहीं लिए। जिस समय वो चाय बेचता था वह कुछ नहीं था लेकिन जब से वह संघ केसंपर्क में आया उसके जीवन में कायाकल्प हो गया। मोदी की जिंदगी में संघ के आने सेपरिवर्तन आया और यही संघ उसके दमित मन की अभिव्यक्तियों को साकार करने लगा।
  मोदी के भाषणों में ‘भारतीय’ की भावुक अपील रहती है और इसी अरील के आधार पर वह युवाओं और दूसरेवर्ग के लोगों को उन्मादित करने की कोसिश करता है। अथवा मोदी के प्रति आकर्षितकरता है। मोदी के उन्माद में भावुकता है, लेकिनसंवेदनशीलता नहीं है। ‘भारतीय’ का भाव है लेकिन बोध नहीं है। वह भावुकता को भड़काकर विपक्ष औरशत्रुओं के खिलाफ उत्तेजना पैदा करने की कोशिश करता है। ज्ञान और विवेक कोभावुकता के जरिए पछाडना चाहता है। मोदी के लिए राजनीतिक ज्ञान से बड़ी राजनीतिकभावुकता। यही वजह है कि वे अपने भाषणों में जान बूझकर इतिहास संबंधी भूलें करतेहैं। अंध समर्थन जुटाते हैं। मोदी आम जनता में ‘शक्ति’ और ‘क्षमता’ के नाम पर जनता की कमजोरियों को उभारकर उन्माद कर रहे हैं। इसी उन्माद के कारण राजनीति में कार्यक्रमों, योजनाओं, घोषणापत्र आदि पर वस्तुगत बहस तो बंद हो गयी है। और अब सिर्फ मोदी के समर्थन में अंधसमर्थकों की भीड़ पैदा हो गयी है।
    मोदी जब भाषण देते हैं तो राजनीतिक बातें नहीं करते, सीधे हमलावर रुख अपनाते हैं। हमलावरभाव एक तरह से अ-लोकतांत्रिक और फासिस्ट भाव है। अभी तक मोदी के जितने भी भाषण हुए हैं उनमें किसी में भी कांग्रेस या यूपीए की नीति पर कोई कड़ी टिप्पणी मोदी ने नहीं की है। वे सीधे सोनिया-राहुल या मनमोहन सिंह पर व्यक्तिगत हमले करते रहे हैं। यही हाल मुलायम, मायावती और नीतीश पर उनके हमलों का है। राजनीति में भावुक निजी हमले फासिज्म का हथकंडा हैं।
मोदी अपने भाषणों में ‘इच्छाशक्ति’ पर बहुत जोर देते हैं। उनका मानना है देश के विकास के लिए ‘इच्छाशक्ति’ का होना ही पर्याप्त है। इच्छाशक्ति के अभाव के कारण देश तरक्की नहीं कर पा रहा है। राजनेता फैसले नहीं ले पा रहे हैं। मोदी के लिए ज्ञान बेमानी है और इच्छाशक्ति महान है। ज्ञान,विवेक और यथार्थ के बिना महजइच्छाशक्ति पर जोर देना ठीक नहीं है। सहजबोध और इच्छाशक्ति के सहारे मोदी उन्मादपैदा कर सकते हैं लेकिन देश का विकास नहीं कर सकते।
    मोदी के कई स्टीरियोटाइप हैं, पहला है ‘कांग्रेस और गांधी परिवार’, दूसरा स्टीरियोटाइप है ‘चाय बेचने वाला मोदी’ ,तीसरा है ‘गुजरात का विकास’ और चौथा है ‘हम जो कहते हैं वह करते हैं।’

About the author

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक प्रगतिशील चिंतक, आलोचक व मीडिया क्रिटिक हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चतुर्वेदी जी आजकल कोलकाता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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