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संघ परिवार, जेएनयू मार्का संस्कृति और गुजरात …………………..

अभिषेक श्रीवास्तव
संघ परिवार सत्‍ता में रहते हुए या उससे बाहर रहते हुए सबसे ज्‍यादा संस्‍कृति के सवाल पर ज़ोर क्‍यों देता है?
इसका एक जवाब मुझे गुजरात में मिला।
स्‍वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्‍या पर ”आज़ादी कूच” जब ऊना पहुंचा, तो शाम सात बजे तक करीब हज़ार लोग राठौड़ हॉल के परिसर में इकट्ठा हो चुके थे। आयोजकों में एक शमशाद भाई ने बताया कि एक सांस्‍कृतिक संध्‍या होनी है, उसके बाद भोजन होगा और फिर लोगों की जैसी मर्जी।

सांस्‍कृतिक संध्‍या हुई। कैसी हुई?
अगर आप आंख मूंद कर वहां खड़े रहते तो आपको लगता कि शायद आप दिल्‍ली के जंतर-मंतर पर खड़े हैं या जेएनयू में हैं या फिर दिल्‍ली-मुंबई के किसी जनवादी जलसे में हैं।
गदर की नकलमार शैली में एक लड़के ने गाया ”ये बीजेपी का राज है, होय” और हुंकारी भरने वाले वही प्रगतिशील संगठनों के छात्र-युवा थे जो दिल्‍ली से मुंबई तक हफ्ते में साढ़े आठ बार इस गीत को गाते-सुनते हैं।
ऐसे दो गीतों के बाद अचानक संकट आन पड़ा। संचालिका को आवाहन करना पड़ा कि कोई आवे और गावे।

फिर जेएनयू की एक छात्रा ने गाना शुरू किया, ”गुलमिया अब हम नाहीं बजइबो”।
दिल्‍ली से गए जेएनयू के पांच छात्रों ने इस पर कोरस गाया। शुरुआत में जो सघन गोला बना था, वह धीरे-धीरे छंट गया। गीत और श्रोताओं के अभाव में प्रोग्राम खत्‍म हो गया। गुजराती जनता बिना कुछ समझे अपने-अपने कोने में सिमट गई।
इस दौरान जिग्‍नेश नेता कहां थे?
वे लगातार दो घंटे तक एक कोने में अपना शूट करवा रहे थे। आनंद पटवर्धन अपनी आगामी संभावित फिल्‍म के लिए उन्‍हें एक सीढ़ी पर बैठाकर इंटरव्‍यू कर रहे थे और जनता गोला बनाए सब देख रही थी।
इस दौरान मेरा परिचय गुजराती की एक संस्‍कृतिकर्मी से करवाया गया जो अहमदाबाद से आई थीं।

मैंने पूछा, ”आप गुजराती में एकाध गीत क्‍यों नहीं गा देतीं?”
उन्‍होंने जवाब दिया कि उनकी संस्‍था भले ही संस्‍कृति पर काम करती है लेकिन वे डॉक्‍युमेंटेशन का काम करती हैं।
अहमदाबाद से आए कुछ गुजरातियों से मैंने जब गीत गाने को कहा, तो वे हंस कर निकल लिए।
(गुजरात रिटर्न-1)

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